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संपादकीय: उच्च शिक्षा व अनुसंधान के लिए बजट की न हो कमी

भारत का कोई भी उच्च शिक्षण या तकनीकी संस्थान दुनिया के शीर्ष 100 संस्थानों में शुमार नहीं है। आइआइटी दिल्ली 123वें, बॉम्बे 129वें और आइआइटी मद्रास 180वें नंबर पर हैं।

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वैश्विक उच्च शिक्षा परिदृश्य में हाल ही जो बदलाव आया है, वह चौंकाने वाला है। दशकों तक अकादमिक उत्कृष्टता और वैश्विक रिसर्च नेतृत्व का डंका बजाने वाली अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का शीर्ष स्थान से फिसल कर तीसरे स्थान पर लुढ़क जाना बड़ी बात है। हालांकि इसके आसार डॉनल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमरीका का राष्ट्रपति चुनकर आने और यूनिवर्सिटी को मिलने वाले अनुदान पर टेढ़ी नजर दिखाने के बाद से नजर आने लगे थे। अब ये आसार वास्तविक रूप में दुनिया के सामने है।

जबकि चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी का टॉप पर पहुंचना, कडिय़ों को जोड़ते जाएंगे तो अनपेक्षित नहीं लगेगा। यह उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान पर उसके लगातार गहन फोकस का नतीजा है। रिसर्च आधारित ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में झेजियांग यूनिवर्सिटी को उसके प्रकाशित शोधों, वैज्ञानिक लेखों की संख्या और उन पर मिलने वाले साइटेशन के आधार पर शीर्ष यूनिवर्सिटी के तमगे से नवाजा गया है। चीन ऐसा कैसे कर पाया, यह भी सबके सामने है। उसकी मेहनत, योजना, दूरदृष्टि और लक्ष्य हमेशा स्पष्ट रहे। राह से कहीं भी विचलन व भटकाव न आए, इसके लिए उसने धन की बिल्कुल भी कमी नहीं आने दी। रैंकिंग में इसे भी इंगित किया गया है कि चीन ने इस दौरान उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए काफी बड़े निवेश निरंतर किए। यह एक पहलू है, जिस पर भारत को भी सोचना चाहिए। भारत का कोई भी उच्च शिक्षण या तकनीकी संस्थान दुनिया के शीर्ष 100 संस्थानों में शुमार नहीं है। आइआइटी दिल्ली 123वें, बॉम्बे 129वें और आइआइटी मद्रास 180वें नंबर पर हैं। जब विश्व के तमाम देश उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए बजट बढ़ा रहे हैं, तब भारत में इस मद का बजट जीडीपी के 0.82 प्रतिशत से घटकर 0.64 फीसदी हो चुका है। साल 2020 से 2024 के बीच ही 1500 करोड़ रुपए की कटौती हुई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बजट पर भी बड़ी मार पड़ी है। बजट की कमी से सिर्फ तात्कालिक तौर पर संभव होने वाले अनुसंधान ही बाधित नहीं होते, इससे भविष्य में सामने आने वाली प्रतिभाओं का मोहभंग भी होता है।

लोग इस क्षेत्र में आने से कतराते हैं। देश के बड़े-बड़े शिक्षाविद् इस ओर ध्यान आकर्षित कर चुके हैं। कई उच्च शिक्षण संस्थाओं के क्लास रूम्स और प्रयोगशालाओं तक की स्थिति दयनीय है। इनके सहारे किसी को टक्कर दे पाना संभव नहीं है। दुनिया के शीर्ष देशों और उनके संस्थानों के समक्ष ठहर पाने और उनके साथ प्रतिस्पद्र्धा के योग्य बनने के लिए इन सभी पहलुओं पर गहन और गंभीर विचार विमर्श कर कदम उठाए जाने की जरूरत है। देश ने नई शिक्षा नीति में इस बाबत कुछ प्रावधान किए हैं। हालांकि इनकी संख्या और गति दोनों बढ़ाने होंगे। उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समुचित बजट आवंटन से रिसर्च के साथ-साथ प्रतिभाओं को भी आगे बढऩे का अवसर मिलेगा।