कहा जाता है जहां जंगल है, वहीं आदिवासी है, वहीं माइनिंग है और वहीं माओवादी हैं। अब माओवादी तो नहीं रहेंगे पर बाकी तीन रहेंगे और यह देखने योग्य होगा कि अगले 25 साल में सरकार का इन तीनों से कैसा संबंध रहेगा।
शुभ्रांशु चौधरी, आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता
31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य गठन का एक उद्देश्य पूरा हो रहा है। जब वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ का गठन हुआ तब किसी को कोई समझ नहीं थी कि ऐसा क्यों किया गया। उस समय राज्य की मांग करते हुए झारखंड, उत्तराखंड, गोरखालैंड, विदर्भ जैसे तमाम आंदोलन थे, जिसमें कुछ सफल हुए कुछ विफल। छत्तीसगढ़ के बारे में लोग मजाक में कहते थे छत्तीस लोग तो सड़क में उतरे नहीं और छत्तीसगढ़ बन गया। किसी के पास इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं है, लेकिन आम समझ यही है कि इस राज्य की स्थापना आर्थिक कारणों से की गई थी। 1990 के बाद भारत में आर्थिक उदारवाद की शुरुआत हुई और इस गाड़ी को आगे तेजी देने के लिए ईंधन छत्तीसगढ़ जैसी जगहों से ही मिल सकता है, जो उस समय माओवाद की गंभीर गिरफ्त में थे और यह समझ बन रही थी कि बेहतर प्रबंधन के लिए छोटे राज्य बनाने जरूरी होंगे।
दिल्ली से भेजे पहले पांच राज्यपालों पर नजर डालें तो यह सोच समझ में आ जाती है। वे सभी पुलिस और आंतरिक सुरक्षा के बैकग्राउंड से थे, जिन्होंने कांकेर में जंगल वारफेयर कॉलेज जैसे संस्थानों की स्थापना करवाई, जिसने इस पहले उद्देश्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि इसमें 25 साल का समय लग गया। राज्य बनाने के पहले केंद्र से सलवा जुडुम जैसे रणनीतिक प्रयास शुरू किए गए थे, लेकिन वे सफल नहीं हुए थे। सलवा जुडुम नाम बाद में दिया गया, पर इस पर काम अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ 1997 में शुरू हो गया था। छोटे राज्य के साथ छोटे-छोटे जिले बने। हाल में सरेंडर किए एक माओवादी ने कहा कि वर्ष 2000 के पहले हमारे बस्तर में सरकार नाम की कोई चीज नहीं थी। तत्कालीन राजधानी भोपाल से हमारा भोपालपटनम वैसे तो हजार से कम किलोमीटर दूर था, पर उनके बीच कोई संबंध ही नहीं था जैसे वे दो अलग दुनिया हों। अखबार कई दिन बाद पहुंचते थे। इस कमी को दूर करने के लिए पहले राष्ट्रीय अखबार के रूप में पत्रिका ने घाटे का सौदा करते हुए जगदलपुर से अपना एडिशन शुरू किया था, जिसने भी इस दूरी के अहसास को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जंगल वारफेयर कॉलेज के पहले प्रमुख ब्रिगेडियर पोनवार कहा करते थे 'जनता सेंटर ऑफ ग्रेविटी है और जनता जिसके साथ होती है युद्ध में जीत उसी की होती है।' सलवा जुडुम के विफल प्रयोग के बाद सेंटर ऑफ ग्रेविटी धीरे धीरे माओवादियों से दूर होती गई और अंतत: सरकार की जीत हुई, लेकिन उसमें भी दस साल का वक्त लगा। बड़े काम छोटे समय में नहीं होते, लेकिन अब जब मूल उद्देश्य पर काम और तेजी से शुरू होगा तब भी सेंटर ऑफ ग्रेविटी का ध्यान रखना होगा। कहा जाता है जहां जंगल है, वहीं आदिवासी है, वहीं माइनिंग है और वहीं माओवादी हैं। अब माओवादी तो नहीं रहेंगे पर बाकी तीन रहेंगे और यह देखने योग्य होगा कि अगले 25 साल में सरकार का इन तीनों से कैसा संबंध रहेगा। छत्तीसगढ में इस साल माइनिंग के सौ साल पूरे हो रहे हैं और जनता का माइनिंग के साथ अनुभव अच्छा नहीं रहा है। छत्तीसगढ में 1926 में पहली कमर्शियल कोयले की खदान झगड़ाखांड में खुली थी और आज भी वह सबसे बड़े झगड़े की जड़ है। झगड़ा यह है कि इस कोयले पर किसका कितना अधिकार है?
आजादी के पहले अंग्रेजों ने कहा जंगल पर राज्य का मालिकाना है और लोगों का उस पर कोई अधिकार नहीं है। इसके विरोध में आदिवासियों ने कई विद्रोह किए जैसे हलबा विद्रोह और भूमकाल विद्रोह आदि, लेकिन माओवादी विद्रोह की तरह ही वे भी सफल नहीं हुए थे। यद्यपि माओवादी यह कहते थे कि आदिवासियों ने जो किया वह विद्रोह था, पर वे जो कर रहे थे वह क्रांतिकारी आंदोलन था, जो विद्रोह के विज्ञान पर आधारित है, लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। जंगल पर अब भी सरकारी जंगल विभाग की जमींदारी कायम है। इस बीच लोकतांत्रिक आंदोलनों के कारण जंगल के कानून बदले और 2005 के बाद आदिवासियों को वन भूमि का अधिकार मिलना शुरू हुआ है, लेकिन जंगल के नीचे के माइनिंग पर मालिकाने पर कानून बदलने का काम शुरू होना अभी बाकी है। अगले 25 सालों में सेंटर ऑफ ग्रेविटी सरकार के पास रहेगी या फिर दूर जाएगी यह मूलत: माइनिंग के मुनाफे की हिस्सेदारी पर निर्भर होगा। अभी माइनिंग का सारा मुनाफा सरकार और कंपनी ले जाती है अगले 25 सालों में यह ध्यान देना होगा कि उससे स्थानीय लोगों का भी विकास हो।
जंगल आधारित सहकारिता मॉडल के उद्योगों के प्रयोग भी करने होंगे, जिससे उन उद्योगों का लाभ भी लोगों तक पहुंचे। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के जंगलों में महुआ बहुत होता है, लेकिन महुआ की शराब बनाने की बड़ी फैक्टरी की बजाय यदि गुजरात के अमूल मॉडल में अबूझमाड़ महुआ यूनियन लिमिटेड जैसे प्रयोग किए जाएं तो सरकार को इन उद्योगों की अपने ही लोगों से सुरक्षा के लिए करोड़ों खर्च नहीं करने पड़ेंगे। अबूझमाड़ माओवादियों की अघोषित राजधानी रही है। वहां पूरे इलाके में जल्द तिरंगा फहरेगा, लेकिन समय यह भी समझने का है कि आखिर अबूझमाड़ अबूझ कैसे रहा? अबूझमाड़ के लोग अबूझमाडिय़ा बोली में बात करते हैं और माओवादियों की तरह सरकार ने इस भाषा को सीखने का प्रयास नहीं किया। अब अबूझमाडिय़ा बोली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रेडियो बनाने का समय है, जहां अबूझमाडिय़ा अपनी बोली में अपनी बात कह सकें और सरकार उसे मशीन ट्रांसलेशन टूल की मदद से समझकर उन समस्याओं का समाधान कर सके। अगले 25 साल वाली जीत इन सब औजारों से हासिल होगी।