
paper leak
प्रो. अशोक कुमार,(पूर्व कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय)
किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी युवा पीढ़ी की प्रतिभा, ऊर्जा और ईमानदारी पर निर्भर करती है। भारत जैसे देश में जहां युवाओं की बड़ी आबादी अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं को एकमात्र सीढ़ी मानती है, वहां परीक्षा प्रणाली की शुचिता सर्वोपरि है। किंतु वर्तमान में भारतीय परीक्षा प्रणाली अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है। नीट और नेट जैसी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने, सीबीएसई जैसी प्रतिष्ठित बोर्ड परीक्षाओं में मूल्यांकन की गंभीर लापरवाहियों और हाल ही में कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (यूजी) 2026 परीक्षा में बड़े पैमाने पर आए तकनीकी फॉल्ट व घंटों की देरी ने करोड़ों ईमानदार छात्रों के आत्मविश्वास को झकझोर कर रख दिया है। यह संकट हमारी संपूर्ण शैक्षणिक, तकनीकी और नैतिक साख पर गंभीर आघात है। भारतीय परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली में सेंधमारी या तकनीकी लापरवाही कोई अचानक उपजी समस्या नहीं है, बल्कि यह दशकों से संचित हो रही व्यवस्थागत कमियों का परिणाम है। जब लाखों छात्र कुछ हजार सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो परीक्षा का दबाव अमानवीय स्तर तक बढ़ जाता है। इस दबाव ने अनैतिक और समानांतर 'कोचिंग-माफिया बाजार' को जन्म दिया है।
नीट के संदर्भ में यह कड़वी हकीकत सामने आई कि प्रश्नपत्रों की सुरक्षा बाहरी ताकतों से ज्यादा आंतरिक तंत्र की विफलता के कारण ध्वस्त हुई। इसमें पेपर सेंटर्स, विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाले ट्रांसलेटर्स और प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों की मिलीभगत पाई गई है। कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं के लिए जिन निजी केंद्रों को अनुबंधित किया जाता है, वहां सुरक्षा के कड़े मानकों और सुदृढ़ आइटी इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव होता है। हाल ही आयोजित कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (यूजी) 2026 परीक्षा में सामने आया संकट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां केंद्रीय सर्वर और सॉफ्टवेयर कंपोनेंट्स में तकनीकी खराबी के कारण पहली शिफ्ट की परीक्षा कई केंद्रों पर 2 से 4 घंटे तक देरी से शुरू हुई।
परीक्षा वेंडर के केंद्रीय सिस्टम में खराबी आना दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर की बड़ी परीक्षाओं को संभालने के लिए हमारा वर्तमान डिजिटल ढांचा अभी भी पूरी तरह से फॉल्ट-टोलरेंट नहीं है। सीबीएसई पर यह गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने उत्तर पुस्तिकाओं की प्रॉपर स्कैनिंग किए बिना ही उनका डिजिटल मूल्यांकन कर दिया। पुनर्मूल्यांकन के बाद विद्यार्थियों के अंकों में 20 से 30 नंबर तक की भारी बढ़ोतरी होना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि स्कैनिंग और चेकिंग के स्तर पर घोर प्रशासनिक और तकनीकी लापरवाही बरती जा रही है। मानवीय लालच और व्यवस्था की कमियां दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों में भी मौजूद हैं, किंतु उनके निपटने के तरीके और सजा के प्रावधान हमसे भिन्न हैं। चीन में होने वाली दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा 'गाओकाओ' का पेपर कभी लीक नहीं होता। यहां मिलिट्री-ग्रेड सुरक्षा प्रदान की जाती है और धांधली करने पर सात साल तक की जेल का प्रावधान है। भारत में भी इसी तरह इस गहरे संकट से उबरने के लिए आमूलचूल और क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है। यह समाधान तीन स्तरों पर काम करेगा। ब्लॉकचेन आधारित प्रश्न बैंक का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इसके भीतर दर्ज डेटा को बदला या मिटाया नहीं जा सकता। यदि सभी संभावित प्रश्नों को ब्लॉकचेन नेटवर्क पर सुरक्षित कर दिया जाए, तो किसी भी केंद्रीय डेटाबेस को हैक करना लगभग असंभव होगा।
पेपर सेंटर्स द्वारा तैयार प्रश्नपत्र को एन्क्रिप्टेड सुरक्षा प्रणाली के साथ लॉक किया जाना चाहिए। कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट जैसी बड़ी ऑनलाइन परीक्षाओं में सर्वर क्रैश या लॉजिस्टिक विफलता को रोकने के लिए हाइब्रिड क्लाउड आर्किटेक्चर और मल्टीपल बैकअप सर्वर का उपयोग होना चाहिए। यदि मुख्य सर्वर पर लोड बढ़ता है या कोई कंपोनेंट फेल होता है, तो ऑटो-स्केलिंग के जरिए बैकअप सिस्टम को तुरंत लाइव हो जाना चाहिए ताकि परीक्षा में एक मिनट की भी देरी न हो। सीबीएसई जैसी बोर्ड परीक्षाओं में स्कैनिंग की त्रुटियों को रोकने के लिए स्मार्ट ओसीआर और एआइ-संचालित स्कैनिंग का उपयोग होना चाहिए। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी, सीबीएसई और निजी वेंडर्स का कड़ा ऑडिट होना चाहिए। परीक्षा और मूल्यांकन का संचालन करने वाली संस्थाओं के लिए निजी वेंडर्स या अन्य तकनीकी प्रदाताओं की कार्यप्रणाली का थर्ड-पार्टी टेक्निकल और क्वालिटी ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए और गड़बड़ी होने पर भारी जुर्माने व ब्लैकलिस्टिंग का प्रावधान हो।
पेपर लीक करने वाले संगठित अपराधियों या मूल्यांकन और तकनीकी प्रबंधन में घोर लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ न्यूनतम 10 वर्ष की जेल, जुर्माना और उनकी संपत्तियों की कुर्की का प्रावधान होना चाहिए। किसी छात्र के पूरे जीवन का फैसला केवल एक दिन की तीन घंटे की परीक्षा से नहीं होना चाहिए। हमें एक संचयी मूल्यांकन प्रणाली की ओर बढऩा होगा, जहां बोर्ड अंक, एप्टीट्यूड टेस्ट और मुख्य परीक्षा के अंकों को मिलाकर एक 'एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स' तैयार किया जाए। इससे एक परीक्षा का मानसिक और तकनीकी दबाव कम होगा। परीक्षा और मूल्यांकन प्रणालियों की शुचिता को बहाल करना केवल छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करना नहीं है, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
Published on:
04 Jun 2026 06:38 pm
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