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मंशा पर सवाल

केन्द्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड से कहा है कि वह दिल्ली में तीन मूर्ति प्रांगण में स्थित अपना कार्यालय खाली कर दे
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Sep 27, 2018
Govt Stand on Nehru Memorial
मंशा पर सवाल

केन्द्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड से कहा है कि वह दिल्ली में तीन मूर्ति प्रांगण में स्थित अपना कार्यालय खाली कर दे क्योंकि वह वहां पर अनधिकृत रूप से काबिज है। इस आदेश को लेकर केंद्र पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह राजनीतिक द्वेष से काम कर रही है। तीन मूर्ति भवन 16 वर्ष तक देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का उनके निधन तक निवास रहा। बाद में इसे नेहरू की याद में राष्ट्रीय विरासत के रूप में सहेजा गया। यहां कला और संस्कृति मंत्रालय के तहत चलने वाली संस्था नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी का मुख्यालय है। देश में चल रहे चार नेहरू तारामंडलों में से एक तारामंडल 'प्लेनेटेरियसÓ भी यहीं है। इसी कॉम्प्लेक्स में विवादित जवाहर लाल मेमोरियल फंड का कार्यालय भी है जो 1964 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में स्थापित हुआ था।


इस संस्था की मुख्य गतिविधियां अध्येताओं और अनुसंधान-कर्ताओं को स्कॉलरशिप और फैलोशिप प्रदान करना और प्रतिवर्ष नेहरू की जन्मतिथि की पूर्व संध्या पर स्मृति व्याख्यान का आयोजन करना है। यह सब अकादमिक गतिविधियां हैं जिस पर किसी को क्या ऐतराज हो सकता है। मगर आवास और शहरी मंत्रालय ने 11 सितंबर को इसे एक नोटिस भेज कर तीन मूर्ति प्रांगण से 20 सितंबर तक जगह खाली कर देने का कह दिया। इसके लिए यह तकनीकी दलील दी गयी है कि इस संस्था के पास यहां रहने की इजाजत का कोई सरकारी कागज नहीं है और वह यहां पिछले 50 वर्षों से अवैध रूप से काबिज है। पांच दशकों बाद शासन को यह भान होना कि एक संस्था अनधिकृत रूप से एक ऐसी सरकारी संपत्ति के एक हिस्से पर काबिज है जो राष्ट्रीय स्मारक है, किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता है। केंद्र में कई गैर कांग्रेसी सरकारें जिनमें भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार शामिल है, सत्ता में रही हैं मगर कभी इस अनधिकृत कब्जे की बात नहीं आई। सरकार के इस कदम को लोग राजनीतिक दृष्टि से इसलिए देखते हैं क्योंकि इस फंड की मौजूदा अध्यक्ष कांग्रेस नेता सोनिया गांधी हैं और इस संस्था के साथ जवाहरलाल नेहरू का नाम जुड़ा है।

बहुतों को यह लगता है कि नेहरू की वैचारिक दृष्टि अव्यावहारिक और रूमानियत भरी रही जिसके कारण ही बंटवारे के साथ मिली आजादी में देश की मुश्किलें हल न हो सकीं। इसीलिए भाजपा के राजनेता और वैचारिक आधार देने वाले लोग नेहरू के दौर को मिटा देना चाहते हैं। नेहरू मेमोरियल फंड को जगह खाली करने का आदेश देना यदि इस प्रयास का हिस्सा है तो इससे ऐसा करने वालों का कद छोटा ही होगा। यह सही है कि इस संस्था की गतिविधियांकांग्रेस विचारधारा के निकट होती हैं जो सत्तारूढ़ दल के विचारों से मेल नहीं खाते। परन्तु क्या इसी आधार पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए? वैचारिक भिन्नताएं लोकतंत्र को खूबसूरती देती हैं और यह लोकतंत्र की मर्यादा होती है कि उसमें विमत को भी पूरी जगह मिले। इसलिए शासन को ऐसे कदमों से बचना चाहिए।

Updated on:
27 Sept 2018 09:39 am
Published on:
27 Sept 2018 09:39 am