ओपिनियन

संपादकीय: विवाह पंजीयन प्रक्रिया के संशोधन में बुनियादी कमी

गुजरात सरकार द्वारा विवाह पंजीयन प्रक्रिया में प्रस्तावित संशोधन, जो बालिगों के विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता को सूचित करने की बाध्यता लाता है, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के खिलाफ है। यह कदम बालिगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है और पंजीकरण प्रक्रिया को जटिल बना सकता है। राज्य सरकार को इस संशोधन में बुनियादी खामियों को सुधारने की आवश्यकता है।

2 min read
Feb 23, 2026
राज्य सरकार को इस संशोधन में बुनियादी खामियों को सुधारने की आवश्यकता है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें केंद्र और राज्यों के अपने-अपने अधिकार व सीमाएं होती हैं। सभी को इस संघीय ढांचे के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली का संचालन करना होता है। इसमें एक-दूसरे के प्रति आदर व सम्मान के साथ सामंजस्य का भाव भी बनाए रखना होता है। किसी को भी कोई ऐसा निर्णय नहीं लेना चाहिए, जो दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर विवाद और टकराव की स्थिति निर्मित करने का कारण बन जाए। इसका जिक्र करने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि हाल ही में गुजरात सरकार ने विवाह पंजीयन प्रक्रिया में संशोधन का वह विषय हाथ में लिया है, जो है तो हर राज्य का अलग-अलग, लेकिन इसका संचालन केंद्र की भावना के अनुरूप होता है।

इस मामले में तो आपत्तिजनक यह भी है कि प्रस्तावित संशोधन सुप्रीम कोर्ट तक की गाइडलाइन को दरकिनार करने वाला है। उदाहरण के तौर पर इस संशोधन का प्रमुख बिंदु यह है कि गुजरात में अब से जोड़ों को विवाह पंजीयन के लिए माता-पिता को सूचित करना जरूरी होगा। देश में जब दो बालिग व्यक्तियों को विवाह के लिए किसी की अनुमति लेने या सूचित करने की जरूरत नहीं है, तो उस विवाह के पंजीयन के लिए उन पर अभिभावकों को सूचित करने की बाध्यता कैसे लागू की जा सकती है? यह बालिगों के सहमति से जिंदगी बसर करने के संवैधानिक अधिकारों का हनन और उन्हें अनावश्यक औपचारिकताओं व जटिलताओं में उलझाने वाला कदम होगा। देश में वैवाहिक पंजीयन की मौजूदा प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की ही गाइडलाइन से संचालित व निर्धारित है।

सुप्रीम कोर्ट की वर्ष 2006 की गाइडलाइन साफ कहती है कि विवाह पंजीयन के लिए केवल दो गवाहों की मौजूदगी पर्याप्त है। कोई भी सरकार इससे अलग कैसे जा सकती है? इस परिदृश्य में यह सवाल बनता है कि गुजरात सरकार यह नियम लाना क्यों चाहती है? वह उस रास्ते पर क्यों जाना चाह रही है, जहां आगे जाकर टकराव होगा ही? सरकार की ओर से इस बारे में कारण गिनाए गए हैं कि बड़ी संख्या में लोगों ने विवाह पंजीकरण की प्रक्रियात्मक खामियों के दुरुपयोग की शिकायतें करते हुए इन्हें रोकने का आग्रह किया था। यह कारण चिंताजनक जरूर है और दूर होना भी चाहिए, लेकिन बालिगों के संवैधानिक अधिकार को दरकिनार कर यह समाधान निकालना गलत है। यह बुनियादी कमी कही जाएगी।

लोकतांत्रिक देश में सिर्फ मंशा अच्छी होना पर्याप्त नहीं है। मंशा का क्रियान्वयन सबके सर्वाधिकारों और सम्मान का पालन करते हुए होना भी जरूरी है। ऐसा करना असंभव नहीं है। गुजरात सरकार को इस बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए और विवाह पंजीयन प्रक्रिया के संशोधन की बुनियादी कमी को दूर करना चाहिए। अन्य राज्यों से भी बात की जा सकती है कि वे क्या और कैसे कर रहे हैं।

Published on:
23 Feb 2026 01:30 pm
Also Read
View All

अगली खबर