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सेहत का ऑडिट: जब कैलेंडर बदले तो नजरिया भी बदले

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा कोई भी व्यक्ति अपनी अंतिम घडिय़ों में अपने बैंक बैलेंस, पद या प्रतिष्ठा को याद नहीं करता, वह केवल अपने परिवार के साथ बिताए प्रेम पूर्ण पलों को याद करता है। इसलिए, 'आत्म-देखभाल' (सेल्फ केयर) को कभी भी स्वार्थ न समझें।

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Jan 01, 2026

-डॉ. सुरेश कुमार पाण्डेय, वरिष्ठ चिकित्सक एवं लेखक

समय की रेत हमारी मुट्ठी से जिस तेजी से फिसल रही है, उसका वास्तविक आभास हमें अक्सर तब होता है जब दीवार पर टंगा कैलेंडर बदलने का वक्त आता है और हम एक नए वर्ष की दहलीज पर खड़े होते हैं। नूतन वर्ष 2026 का आगमन केवल एक तारीख बदलने की औपचारिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना को झकझोरने वाला एक ऐसा पड़ाव है जहां हमें रुककर पीछे मुड़कर देखना होगा और आगे की राह तय करनी होगी। नववर्ष के आगमन पर हमें रस्मी वादों और खोखले संकल्पों से आगे बढ़कर, जीवन जीने के अपने तौर-तरीकों का एक ईमानदार और कठोर 'ऑडिट' करना होगा। आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तकनीक के माध्यम से हम पूरी दुनिया से तो 24 घंटे जुड़े हैं, लेकिन खुद से, अपने शरीर के संकेतों से और अपने ही परिवार से पूरी तरह कट गए हैं।

नववर्ष 2026 में हमारा सबसे बड़ा संघर्ष किसी बाहरी वायरस, जीवाणु या महामारी से नहीं है, बल्कि हमारी उस जीवनशैली से है, जिसने हमें हाड़-मांस के संवेदनशील इंसान से एक 'मशीन' में तब्दील कर दिया है। इस मशीनीकरण के खिलाफ सबसे पहली और अनिवार्य क्रांति हमारी रसोई और हमारी थाली से शुरू होनी चाहिए। हमें अपने खानपान में 'घर वापसी' करनी होगी। पिछले कुछ दशकों में वैश्वीकरण की चकाचौंध में हमारी थाली से पोषण गायब हो गया और केवल स्वाद हावी हो गया। नववर्ष में आइए हम अपनी जड़ों की ओर लौटें और अपनी भारतीय परंपरा में 'मिलेट्स' यानी श्री अन्न (बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो) का जो सम्मानजनक स्थान था, उसे पुन: स्थापित करें। आज के समय में दूषित भोजन से भी ज्यादा खतरनाक वह 'डिजिटल भोजन' है जो हम अनजाने में अपनी आंखों और दिमाग को हर पल खिला रहे हैं। आज का इंसान और विशेषकर हमारी युवा पीढ़ी, अनिद्रा, गंभीर मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन की जिस अदृश्य महामारी से जूझ रही है, उसका सीधा और गहरा संबंध हमारी हथेलियों में रखे मोबाइल फोन से है। रात का सन्नाटा, जो कभी गहरी नींद, शरीर की मरम्मत और मानसिक शांति के लिए बना था, अब मोबाइल की नीली रोशनी (ब्लू लाइट) और सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन की 'टिंग-टिंग' ने छीन लिया है।

हम बिस्तर पर लेटने के बाद भी सोने की बजाय, एक के बाद एक 'रील्स' या 'शॉट्र्स' सरकाते रहते हैं। यह लत हमारे दिमाग में डोपामाइन का ऐसा चक्रव्यूह रचती है जो मस्तिष्क को लगातार उत्तेजित रखता है, जिससे हमें वह गहरी नींद (डीप स्लीप) नहीं मिल पाती, जो हमारे स्वास्थ्य का आधार स्तंभ है। हमें यह कठोर व्रत लेना होगा कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले हम इस डिजिटल दुनिया का द्वार बंद कर देंगे और अपने दिमाग को शांत होने का मौका देंगे। अब वक्त आ गया है कि हम 'डिजिटल फास्टिंग' की नई अवधारणा को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। अब मानसिक शांति के लिए तकनीक का त्याग अनिवार्य हो गया है। सप्ताह में कम से कम एक दिन या दिन में कुछ घंटे ऐसे जरूर हों जब हम पूरी तरह 'ऑफलाइन' हों। यह वह समय हो जब हम किसी स्क्रीन को नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्यों की आंखों में देखकर बात करें, बच्चों के साथ खेलें या बस खामोश बैठकर अपनी सांसों को महसूस करें। यह डिजिटल डिटॉक्स आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम साबित नहीं होगा और रिश्तों में आई दूरी को पाटने का काम करेगा। हमारी जिम्मेदारियां केवल खुद तक सीमित नहीं हैं, हमारी आने वाली पीढ़ी यानी हमारे बच्चे भी इस कृत्रिम दुनिया के कैदी बनते जा रहे हैं, जो एक चिंताजनक विषय है। हमें अपने बच्चों को 'वाई-फाई' जोन से जबरदस्ती निकालकर 'नेचर' जोन में ले जाना होगा। बच्चों का प्रकृति के सानिध्य में खेलना, मिट्टी में हाथ सानना, साइकिल चलाना और खुले आसमान के नीचे सूर्य के प्रकाश में व्यायाम करना, यह केवल खेल नहीं है, बल्कि उनके समग्र शारीरिक और मानसिक विकास की अनिवार्यता है। प्रकृति के पास वह जादू है, जो तनाव को सोख लेता है और आंखों की रोशनी से लेकर मन की एकाग्रता तक, सब कुछ संवार देता है। यह याद रखें कि काम केवल आजीविका का साधन है, जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं।

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा कोई भी व्यक्ति अपनी अंतिम घडिय़ों में अपने बैंक बैलेंस, पद या प्रतिष्ठा को याद नहीं करता, वह केवल अपने परिवार के साथ बिताए प्रेम पूर्ण पलों को याद करता है। इसलिए 'आत्म-देखभाल' (सेल्फ केयर) को कभी भी स्वार्थ न समझें। जब आप स्वयं स्वस्थ और खुश रहेंगे, तभी आप अपने परिवार और समाज में खुशियां बिखेर पाएंगे। नए साल का उगता हुआ सूरज हमें समय रूपी एक कोरा कागज दे रहा है। यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम उस पर तनाव, बीमारी और अकेलेपन की कहानी लिखते हैं, या फिर स्वास्थ्य, संतोष, सादगी और सार्थक रिश्तों की इबारत। नए साल में यांत्रिक जीवन नहीं, भावनाओं से भरे जीवंत इंसानों की तरह जिएं। अपने मन का मौन ढूंढ़ें।

Updated on:
01 Jan 2026 04:05 pm
Published on:
01 Jan 2026 01:53 pm
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