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अपरिहार्य युद्ध भी नैतिक मर्यादाओं में रहकर लड़ा जाए

आज नीतिगत बहसों पर रणनीतिक हितों और भू-राजनीतिक समीकरणों का कब्जा है। जिस क्षेत्र ने जरथुस्त्र की शिक्षाओं को जन्म दिया, वहां अब सैन्य प्रतिरोध और प्रतिबंधों की बातें होती हैं। धर्म की दार्शनिक भूमि को आर्थिक या रणनीतिक विश्लेषण तक सीमित कर दिया गया है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 15, 2026

प्रो. पंकज जैन - निदेशक (इंडिया सेंटर, फ्लेम यूनिवर्सिटी),

ईरान की जिस भूमि को आज हम भू-राजनीतिक टकराव के अखाड़े के रूप में देख रहे हैं, वह कभी मानवता की शुरुआती 'नैतिक परंपराओं का पालना' रही है। आधुनिक राष्ट्र-राज्यों और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के उदय से बहुत पहले, प्राचीन फारस ने सत्य और उत्तरदायित्व पर आधारित एक सशक्त नैतिक दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा था। यह पैगंबर जरथुस्त्र की शिक्षाओं से उपजा, जो पारसी धर्म का आधार बना। इस धर्म का गहरा, किंतु सरल केंद्रीय विचार है- ब्रह्मांड सत्य और असत्य, व्यवस्था और अराजकता के बीच एक निरंतर नैतिक संघर्ष है। इस वैश्विक नाटक में मनुष्य केवल मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय भागीदार है, जिसके चयन एवं निर्णय संसार का स्वरूप तय करते हैं।

पारसी नैतिकता का त्रिपक्षीय सिद्धांत- 'हुमत, हुख्त और हुवश्र्त' (नेक विचार, शब्द और कर्म)- प्रसिद्ध है। ये सिद्धांत सामाजिक समरसता और ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखते हैं। यहां न्याय और नैतिक आचरण वैकल्पिक आदर्श नहीं, बल्कि सभ्यता की अनिवार्य आधारशिला हैं। प्राचीन फारस ने इन मूल्यों को संस्थागत रूप दिया। हखामनी साम्राज्य के शासकों के शिलालेखों में न्याय और अपनी विविध प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व पर जोर दिया गया है। 'साइरस सिलेंडर' धार्मिक सहिष्णुता व नैतिक शासन की प्राचीनतम अभिव्यक्ति माना जाता है।

प्राचीन फारस और भारत एक व्यापक 'भारत-ईरानी संस्कृति' का हिस्सा थे। दोनों क्षेत्रों के भाषाई, पौराणिक और दार्शनिक संबंध सर्वविदित हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों और 'अवेस्ता' के बीच अद्भुत वैचारिक समानताएं एक साझा बौद्धिक विरासत का संकेत देती हैं। भारत में यही नैतिक चेतना 'धर्म' के रूप में विकसित हुई। 'धर्म' में कर्तव्य, नैतिक व्यवस्था और ब्रह्मांड को धारण करने वाले सिद्धांत समाहित हैं। व्यक्ति, शासक और समाज- सभी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आचरण को इस नैतिक ढांचे के अनुरूप रखें। भारतीय परंपराओं ने युद्ध की समस्या पर भी गहन मंथन किया। हमारे महाकाव्य संघर्ष की अनदेखी नहीं करते, बल्कि उस पर नैतिक सीमाएं लगाते हैं। 'धर्म-युद्ध' का विचार जोर देता है कि अपरिहार्य युद्ध भी नैतिक मर्यादाओं में लड़ा जाए। जन-साधारण की सुरक्षा और सम्मान के नियमों का पालन अनिवार्य था। समय के साथ जैन धर्म ने अहिंसा को केंद्र में रखा, वहीं बौद्ध धर्म ने करुणा और दु:ख-निवारण को शासकीय आचरण का मार्गदर्शक बनाया। सभ्यताओं से उभरे दार्शनिक ढांचे इस बात पर अडिग थे कि सत्ता और शक्ति को नैतिक चिंतन के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

विडंबना यह है कि आधुनिक विश्व में युद्ध की चर्चाओं से नैतिकता की भाषा गायब है। आज नीतिगत बहसों पर रणनीतिक हितों और भू-राजनीतिक समीकरणों का कब्जा है। जिस क्षेत्र ने जरथुस्त्र की शिक्षाओं को जन्म दिया, वहां अब सैन्य प्रतिरोध और प्रतिबंधों की बातें होती हैं। धर्म की दार्शनिक भूमि को आर्थिक या रणनीतिक विश्लेषण तक सीमित कर दिया गया है। ड्रोन और मिसाइलों के इस युग में, हिंसा की सीमाओं और नेतृत्व के दायित्वों से जुड़े प्रश्न आज भी उतने ही जरूरी हैं। जरथुस्त्र की धरती ने सिखाया था कि सत्य, न्याय व संयम सभ्यता के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं। ये सबक आज भी प्रासंगिक हैं, बशर्ते हम शक्ति व उत्तरदायित्व के उन मूल सिद्धांतों को पुन: याद करें।