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घरेलू कार्य कोई निष्क्रियता नहीं, बल्कि आर्थिक योगदान है

महिलाएं औसतन पांच घंटे से अधिक समय घरेलू और देखभाल कार्य में लगाती हैं, जबकि पुरुषों का समय लगभग डेढ़ घंटे के आस-पास है। यह अंतर केवल सांख्यिकीय विषमता नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानता का संकेत है। राजस्थान के शुष्क ग्रामीण क्षेत्रों में यह असमानता विशेष रूप से दिखाई देती है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 15, 2026

उमा व्यास - स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार,

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल में स्पष्ट किया कि किसी गृहिणी को केवल इसलिए निष्क्रिय या बेकार नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह वेतनभोगी रोजगार में नहीं है। न्यायाधीश स्वर्णकांता शर्मा की यह टिप्पणी भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में आई, पर इसका महत्व उससे कहीं व्यापक है। यह उस सोच को चुनौती देती है जो घरेलू श्रम को आर्थिक योगदान के बजाय निजी दायित्व मानती रही है। भारत में महिला श्रम भागीदारी के नवीनतम आंकड़े इस पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हैं। आवधिक श्रम बल सर्वे 2024-25 के अनुसार महिला श्रम बल भागीदारी दर लगभग 34 से 35 प्रतिशत के बीच है। कुछ वर्ष पूर्व यह लगभग 23 प्रतिशत के आस-पास थी। यह वृद्धि महत्वपूर्ण अवश्य है, परंतु विश्लेषण बताता है कि इसका बड़ा हिस्सा ग्रामीण एवं स्व-रोजगार श्रेणी में केंद्रित है। शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी रोजगार में महिलाओं की भागीदारी अब भी सीमित है। इसका सीधा अर्थ है कि बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू दायित्वों के कारण औपचारिक श्रम बाजार से बाहर हैं।

राष्ट्रीय समय उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार महिलाएं प्रतिदिन पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय अवैतनिक घरेलू कार्य और देखभाल में व्यतीत करती हैं। महिलाएं औसतन पांच घंटे से अधिक समय घरेलू और देखभाल कार्य में लगाती हैं, जबकि पुरुषों का समय लगभग डेढ़ घंटे के आस-पास है। यह अंतर केवल सांख्यिकीय विषमता नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानता का संकेत है। राजस्थान के शुष्क ग्रामीण क्षेत्रों में यह असमानता विशेष रूप से दिखाई देती है। अनेक गांवों में महिलाएं दूरस्थ स्रोतों से पानी लाती हैं, ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करती हैं, पशुपालन तथा बुवाई-कटाई जैसे कृषि कार्यों में योगदान देती हैं। यह समय-साध्य और श्रमसाध्य है, परंतु औपचारिक आर्थिक गणना में परिलक्षित नहीं होता। जल और ईंधन की उपलब्धता यहां केवल संसाधन का प्रश्न नहीं, बल्कि लैंगिक श्रम विभाजन का भी विषय है।

शहरी क्षेत्रों में स्वरूप भिन्न है, पर दायित्व कमोबेश बने रहते हैं। शहरों में महिलाएं घरेलू प्रबंधन, बच्चों की शिक्षा, वृद्धों की देखभाल और अनेक मामलों में बाहरी रोजगार की दोहरी जिम्मेदारी निभाती हैं। कार्यस्थल पर औपचारिक श्रम के बाद भी घर के अधिकांश देखभाल कार्यों की जिम्मेदारी उन्हीं पर केंद्रित रहती है। इस प्रकार ग्रामीण और शहरी दोनों संदर्भों में घरेलू और देखभाल श्रम का मुख्य भार महिलाओं पर ही रहता है। अर्थशास्त्र में घरेलू और देखभाल कार्य को पुनरुत्पादक श्रम कहा जाता है। महिलाएं केवल बच्चों का पालन-पोषण कर भविष्य की मानव पूंजी का निर्माण ही नहीं करतीं, बल्कि कार्यशील आयु वर्ग को भोजन और देखभाल उपलब्ध कराकर उन्हें अर्थव्यवस्था में सक्रिय रहने में सक्षम बनाती हैं। वे बाल पीढ़ी, कार्यशील जनसंख्या और वरिष्ठ नागरिकों के बीच जीवन चक्र को जोडऩे वाली कड़ी हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि घरेलू उत्तरदायित्व को निष्क्रियता नहीं कहा जा सकता। घर का प्रबंधन सामाजिक और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से सक्रिय भूमिका है। जब तक घरेलू श्रम को औपचारिक मान्यता और नीति समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक लैंगिक समानता अधूरी रहेगी। अब आवश्यकता है कि समाज और शासन उस संकेत को ठोस संरचनात्मक परिवर्तन में रूपांतरित करें।