ओपिनियन

होली की परंपराएं: रंगों के पीछे छिपे अनगिनत रंग

धुलंडी के दिन हर गली में पानी से बड़े-बड़े टब अथवा ड्रम भरकर रखे जाते हैं। गांवों में कुंवारी लड़कियां इन टबों में पानी भरती हैं, जिन्हें इसके लिए 'नेग' के रूप में कुछ राशि दी जाती है। पुरुष महिलाओं पर पानी डालते हैं और महिलाएं उन पर कोड़े बरसाती हैं।

4 min read
Mar 04, 2026

योगेश कुमार गोयल - वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार,

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि यह विविध परंपराओं और सांस्कृतिक रंगों से सजा हुआ पर्व है। भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को मनाने के अनूठे और विचित्र तौर-तरीके देखने को मिलते हैं। प्रत्येक राज्य की अपनी विशेष होली परंपरा होती है, जो भारतीय संस्कृति की समृद्धि को दर्शाती है।

उत्तर प्रदेश की लठमार होली : उत्तर प्रदेश में ब्रज की बरसाने की 'लठमार होली' अपने आप में अनोखी और विश्व प्रसिद्ध है, जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। होली खेलने के लिए यहां रंगों के स्थान पर लाठियों व लोहे तथा चमड़े की ढ़ालों का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं लाठियों से पुरुषों को पीटने का प्रयास करती हैं जबकि पुरुष ढ़ालों की आड़ में स्वयं को लाठियों के प्रहारों से बचाते हैं। लठमार होली के आयोजन ब्रज मंडल में करीब डेढ़ माह तक चलते हैं लेकिन विशेष आयोजन के रूप में खेली जाने वाली लठमार होली के लिए विभिन्न दिन एवं स्थान निश्चित हैं। ब्रज मंडल में नंदगांव, बरसाना, मथुरा, गोकुल, लोहबन तथा बल्देव की लठमार होली विशेष रूप से प्रसिद्ध व दर्शनीय है। बरसाने की होली में नंदगांव के पुरुष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं जबकि नंदगांव की होली में पुरुष बरसाने के होते हैं और महिलाएं नंदगांव की।

हरियाणा की 'धमाल' और पंजाब की 'जोशीली' होली : हरियाणा में होली के इंद्रधनुषी रंगों की छटा देखते ही बनती है। होली के दिन महिलाएं व्रत रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए समूहों में होलिका दहन के लिए जाती हैं और पूजा अर्चना करती हैं तथा होलिका दहन के पश्चात् व्रत खोलती हैं। यहां होली की आग में गेहूं तथा चने की बालें भूनकर खाना शुभ माना जाता है। धुलंडी के दिन हर गली में पानी से बड़े-बड़े टब अथवा ड्रम भरकर रखे जाते हैं। गांवों में कुंवारी लड़कियां इन टबों में पानी भरती हैं, जिन्हें इसके लिए 'नेग' के रूप में कुछ राशि दी जाती है। पुरुष महिलाओं पर पानी डालते हैं और महिलाएं उन पर कोड़े बरसाती हैं। शाम को गांवों में कबड्डी व कुश्ती प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं। महिलाएं शाम के समय अपने लोक देवता की पूजा के लिए मंदिरों में जाती हैं और प्रसाद बांटती हैं। पंजाब में भी हरियाणा की ही भांति होली पर खूब धूमधाम और मस्ती देखी जाती है। महिलाएं होली के दिन अपने घर के दरवाजे पर 'स्वास्तिक' चिह्न बनाती हैं। शाम को कुश्ती के दंगल और शारीरिक सौष्ठव के आयोजन होते हैं।

गुजरात की 'हुलासनी' होली : गुजरात में होली का पर्व 'हुलासनी' के नाम से मनाया जाता है। होलिका का पुतला बनाकर उसका जुलूस निकाला जाता है और होलिका के पुतले को केंद्रित कर लोग तरह-तरह के हंसी-मजाक भी करते हैं। उसके बाद पुतले को जला दिया जाता है और होलिका दहन के बाद बची राख से कुंवारी लड़कियां 'अम्बा' देवी की प्रतिमाएं बनाकर गुलाब तथा अन्य रंग-बिरंगे फूलों से उसकी पूजा अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से लड़कियों को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

पश्चिम बंगाल की 'डोलीजागा' होली : पश्चिम बंगाल में होली का आयोजन तीन दिन तक चलता है, जिसे 'डोलीजागा' नाम से जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों के आसपास कागज, कपड़े व बांस से मनुष्य की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और छोटी-छोटी पर्णकुटियों का भी निर्माण किया जाता है। शाम के समय मनुष्य की प्रतिमाओं के समक्ष वैदिक रीति से यज्ञ किए जाते हैं और यज्ञ कुंड में मनुष्य की प्रतिमाएं जला दी जाती हैं। उसके बाद लोग हाथों में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं लेकर यज्ञ कुंड की सात बार परिक्रमा करते हैं। अगले दिन प्रात: भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को एक झूले पर सजाया जाता है और पुरोहित मंत्रोच्चार के साथ उसे झूला झुलाता है। इस दौरान वहां उपस्थित लोग भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। पूजा के बाद पुरोहित उस अबीर-गुलाल से ही लोगों के मस्तक पर टीका लगाते हैं।

उड़ीसा की होली परंपराएं : जिस प्रकार पश्चिम बंगाल में मनुष्य की प्रतिमा जलाई जाती है, उसी प्रकार उड़ीसा में होली के अवसर पर जीवित भेड़ को जलाने की प्रथा रही है किंतु अब इस प्रथा के स्वरूप में परिवर्तन आया है और बहुत से स्थानों पर भेड़ को प्रज्जवलित ज्वाला के पास ले जाकर रस्म अदायगी कर छोड़ दिया जाता है जबकि उड़ीसा के कुछ स्थानों पर लोग कागज और कपड़े से भेड़ की आकृति बनाकर जलाते हैं। उड़ीसा में होली का त्यौहार 'तिग्या' के नाम से जाना जाता है और इस अवसर पर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विशाल जुलूस निकालने की परंपरा भी देखी जाती है।

बिहार की पारंपरिक होली : बिहार में कुछ स्थानों पर रात के समय होली जलाने की प्रथा है। लोग होलिका दहन के समय इसके चारों ओर एकत्रित होते हैं और गेहूं व चने की बालें भूनकर खाते हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों में युवक अपने-अपने गांव की सीमा के बाहर मशाल जलाकर रास्ता रोशन करते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि ऐसा करके वे अपने गांव से दुर्भाग्य और संकटों को दूर भगा रहे हैं।

हिमाचल-महाराष्ट्र की होली परंपराएं : हिमाचल प्रदेश में होलिका दहन के पश्चात् बची राख को 'जादू की शक्ति' माना जाता है और यह सोचकर इसे खेत-खलिहानों में डाला जाता है कि इससे यहां किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आएगी और फसल अच्छी होगी। होली खेलते समय महिलाएं पुरुषों पर लाठियों से प्रहार करती हैं और पुरुष स्वयं को ढ़ालों इत्यादि से बचाते हैं। महाराष्ट्र में होली का त्यौहार 'शिमगा' नाम से मनाया जाता है। यहां इस दिन घरों में झाड़ू का पूजन करना शुभ माना गया है। पूजन के बाद झाड़ू जला दी जाती है।

Published on:
04 Mar 2026 04:57 pm
Also Read
View All

अगली खबर