
कभी-कभी किसी शिखर सम्मेलन की अहमियत उसके एजेंडे से कम और उस मोड़ से अधिक तय होती है जिस पर वह आयोजित हो रहा होता है। नई दिल्ली में इस सप्ताह होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कुछ ऐसे ही मोड़ पर है। दुनिया एक साथ कई संक्रमणों से गुजर रही है- शक्ति का पश्चिम से पूर्व की ओर सरकना, वैश्वीकरण का विखंडन, युद्धों की वापसी, आपूर्ति-शृंखलाओं की असुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ऐसी छलांग कि इसके नियम अभी लिखे ही जा रहे हैं। इसी उथल-पुथल के बीच भारत एक साल से ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स के दिल्ली घोषणापत्र में किस भाषा पर सर्वसम्मति कैसे बनेगी, बड़ा सवाल यह है कि ब्रिक्स के परिवर्तनशील लंबे सफर में भारत की इस अध्यक्षता की क्या अमिट छाप बनेगी।
सबसे पहले तो ब्रिक्स अब वह सीमित क्लब नहीं रहा जिसकी कल्पना मूलत: इस शताब्दी की शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने की थी। ब्रिक्स के विस्तार ने उसके भूगोल और आर्थिक वजन के साथ-साथ अंतर्विरोध को भी बढ़ा दिया है। इसमें ऐसी अर्थव्यवस्थाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं हैं, जिनकी प्राथमिकताएं एक-दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खातीं। एक ओर चीन और रूस हैं, जो पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की मुखर आकांक्षा रखते हैं। दूसरी ओर भारत है, जो बहुध्रुवीयता चाहता है और अपने को किसी एक खेमे में आत्मसात नहीं करना चाहता। यहीं से दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है।
भारत ने लगातार ब्रिक्स को 'पश्चिम के विरुद्ध' मंच बनाने के बजाय 'ग्लोबल साउथ के लिए मंच' बनाने की प्रस्तावना की है। भारत के लिए ब्रिक्स की उपयोगिता तभी बढ़ सकती है जब वह विकासशील देशों की उन समस्याओं पर कुछ कर सके जो उनकी रोजमर्रा की आर्थिक असुरक्षा से जुड़ी है- ऊर्जा, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, वित्त, तकनीकी असमानता और अस्थिर आपूर्ति-शृंखलाएं। इसलिए भारत की अध्यक्षता का घोषित मंत्र- लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता- दरअसल ब्रिक्स को भू-राजनीतिक घोषणाओं से कहीं आगे ले जाने का प्रयास है। इस मंत्र में भारत की अपनी विदेश नीति का मौलिक सूत्र-'रणनीतिक स्वायत्तता, लेकिन रणनीतिक अलगाव नहीं'- भी साफ दिखाई देता है। भारत अमरीका और सभी दूसरे साथी देशों के साथ साझेदारी करता है पर रूस से भी प्रगाढ़ संबंध बनाए रखता है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों करता है। ऐसा करके भारत ब्रिक्स को किसी नए शीतयुद्ध का औजार नहीं बनने से बचाना चाहता है। इसलिए भारत की ग्लोबल साउथ में स्वीकार्यता लगातार भी बढ़ी है।
पर भारत के इस सबसे मेलजोल रखने का यह अर्थ नहीं कि भारत वैश्विक शासन-व्यवस्था में बदलाव नहीं चाहता। उल्टे, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर वैश्विक वित्तीय संस्थाओं तक अधिक प्रतिनिधित्व और अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की उसकी मांग ब्रिक्स के राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। भारत का तर्क यह है कि बहुध्रुवीय दुनिया का अर्थ एक पश्चिमी प्रभुत्व की जगह किसी दूसरे प्रभुत्व को स्थापित करना नहीं, बल्कि अधिक सामरिक विकल्प पैदा करना है। यही वह बिंदु है, जहां भारतीय ब्रिक्स दृष्टि, चीनी या रूसी दृष्टि से अलग दिखाई देती है। भारत की दूसरी बड़ी कोशिश ब्रिक्स को ऐसी संस्था बनाना है, जो केवल घोषणाएं न करे, बल्कि काम करने वाले तंत्र भी बनाए। यही कारण है कि उसकी इस साल की ब्रिक्स अध्यक्षता में आपूर्ति शृंखलाएं डिजिटल भुगतान, स्थानीय मुद्राएं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, न्वोद्यम और हरित ऊर्जा जैसे अपेक्षाकृत व्यावहारिक मुद्दे प्रमुख रहे हैं। यह सब ब्रिक्स को समावेशन और विकास का सार्वजनिक मंच बनाने में सहायक हो सकते है।
इसी तरह वित्तीय सहयोग में भी भारत की चुनौतियां दिलचस्प है। ब्रिक्स के भीतर राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को जोडऩे की चर्चा होती रही है। लेकिन भारत ने किसी 'ब्रिक्स मुद्रा' को जल्दबाजी में बाजार में उतारने को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया है। वह अधिक व्यावहारिक, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को पहले लागू करने पर जोर देता है। यूपीआइ का अनुभव भारत ब्रिक्स के मंच से ग्लोबल साउथ के सामने रख सकता है। आने वाले वर्षों में असली शक्ति केवल इसमें नहीं होगी कि तकनीक किसके पास है, बल्कि इस बात से भी कि इसके नियम कौन लिखता है, डेटा किसके पास है और विकासशील देशों को उपभोक्ता के बजाय भागीदार कौन बनाता है। दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कहानी जितनी आशावादी है, उतनी सरल नहीं है। ब्रिक्स के विस्तार ने उसकी शक्ति को बढ़ाया हैं मगर सर्वसम्मति बनाना कठिन कर दिया है। पश्चिम एशिया, यूक्रेन, अमरीकी प्रतिबंधों और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के हित और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। मई में नई दिल्ली में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त घोषणा-पत्र बैठक के अध्यक्ष के व्यक्तव्य तक सीमित रह जाना इस कठिनाई का संकेत था। चीन इस समूह की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसके बिना ब्रिक्स की आर्थिक क्षमता की कल्पना अधूरी होगी। लेकिन भारत नहीं चाहता कि ब्रिक्स धीरे-धीरे चीन की आर्थिक शक्ति और रूस की पश्चिम-विरोधी राजनीति का तंत्र बन जाए। इसलिए शायद भारतीय रणनीति संतुलन की कला है। चीन के साथ सहयोग, लेकिन चीन-केंद्रितता नहीं, रूस के साथ संवाद लेकिन रूस-केंद्रित एजेंडा नहीं, ग्लोबल साउथ का नेतृत्व, लेकिन उसके नाम पर वर्चस्व का दावा नहीं। भारत के सामने अवसर है कि वह विस्तारित ब्रिक्स में बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच मध्यम और छोटे देशों को भी जगह दिला सके। यही भारत की अध्यक्षता की उपलब्धि होगी।
भारत ब्रिक्स को पश्चिम का विकल्प बनाने की कोशिश नहीं कर रहा। वह उसे विकल्पों की दुनिया का मंच बनाने की कोशिश कर रहा है। यह अंतर उसकी पूरी कूटनीतिक दृष्टि को समझने की कुंजी है। ग्लोबल साउथ को आज किसी नए खेमे की नहीं, विकल्पों की जरूरत है। यदि भारत इस गुंजाइश को संस्थागत रूप दे पाता है, तो ब्रिक्स की अगली कहानी शायद यह नहीं होगी कि कौन दुनिया का नेतृत्व करेगा। असली कहानी यह होगी कि दुनिया को कितने विकल्प संभव और सुदृढ़ हैं। भारत की कोशिश यही है कि उन विकल्पों में भारत की आवाज स्पष्ट सुनाई दे और ग्लोबल साउथ की आवाज केवल सुनी ही नहीं जाए, बल्कि प्रभावशाली भी बने।
(पूर्व प्रोफेसर, अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान,जेएनयू, नई दिल्ली)