संस्कृत में एक प्रसिद्ध उक्ति कहती है कि दर्जन भर गुणहीन बच्चों की तुलना में एक गुणी बच्चे का परिवार में होना अधिक महत्वपूर्ण है।
- अतुल कनक, वरिष्ठ टिप्पणीकार
आधुनिक परिवेश में बदलते पारिवारिक मूल्यों के बीच परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रेम, सौहार्द और संस्कारों की भाषा सिखाना। गुणी संतान न हो तो अभिभावकों का भविष्य अंधकारमय ही माना जाता है।
मानव सभ्यता पर हुए हुए विभिन्न प्रयोगों से यह साबित होता है कि ‘क्वांटिटी’ अर्थात् संख्याबल की तुलना में क्वालिटी अर्थात् गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण होती है। संस्कृत में एक प्रसिद्ध उक्ति कहती है कि दर्जन भर गुणहीन बच्चों की तुलना में एक गुणी बच्चे का परिवार में होना अधिक महत्वपूर्ण है। आधुनिक परिवेश में बदलते पारिवारिक मूल्यों के बीच परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ाने से कहीं अधिक महत्वपणर््ूा है उन्हें प्रेम, सौहार्द और संस्कारों की भाषा सिखाना। गुणी संतान न हो तो अभिभावकों का भविष्य अंधकारयमय ही माना जाता है।
पिछले दिनों एक बड़े औद्योगिक कारखाने के संस्थापक को उसी के बेटे द्वारा घर से निकाल दिए जाने की खबरें संचार माध्यमों में काफी चर्चित रही थीं। सवाल यह है कि फिर नकारात्मक शक्तियों का संचय किसलिए? सम्राट अशोक को इतिहास में इसलिए याद नहीं रखा जाता क्योंकि उसने कई युद्ध जीते अथवा फिर सिंहासन पर अधिकार स्थापित करने के लिए अपने ही भाइयों की नृशंस हत्याएं की। उसे आज भी अशोक महान् कहकर इसलिए स्मरण किया जाता है क्योंकि इस पाशविक व्यवहार को त्याग कर उसने मानव सेवा के पथ को अंगीकार किया और लोककल्याण का मार्ग चुना।
उनके द्वारा किए जनहित के कार्यों ने ही उन्हें आम नागरिक के हृदय का सम्राट बनाया और इतिहास में सर्वकालिक महान् का दर्जा दिलाया। जरूरत इस बात है कि अभिभावक अपनी संतति को समाज और राष्ट्र के लिए आदर्श बनने के लिए प्रशिक्षित करें, उन्हें प्रेरित करें। इससे न सिर्फ उनका बल्कि देश का भविष्य भी सुखद होगा। यह स्वाभाविक ही है कि संतति के यश के लिए संख्याबल से अधिक आवश्यक होती है सद् के संस्कारों की। आज के अर्थप्रधान युग में अभिभावक अपनी संतति को सुख-सुविधाएं तो खूब दे रहे हैं लेकिन संस्कार की ओर से आंखें मूंदे हुए हैं। यह तय तो हमें ही करना है कि अपनी संतति को भीड़ का हिस्सा बनाना चाहते हैं या फिर कालजयी यश के संस्कार देना चाहते हैं।