लखनऊ के राजपुर गांव में कंपोजिट स्कूल के शिक्षक मोहनलाल सुमन ने महज तीन हजार रुपए में लकड़ी की एक ह्यूमनॉइड एआइ शिक्षिका 'मैडम सुमन' को विकसित किया है। मैडम सुमन विद्यार्थियों के सवालों के जवाब देती है। इसे देसी एलेक्सा भी कहा जा सकता है।
डॉ. सचिन बत्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं तकनीकी विशेषज्ञ
वर्ष 2010 में तमिल फिल्म निर्देशक एस शंकर ने एक वैज्ञानिक कल्पना को पहले 'एंथिरन' और उसके बाद सुपरस्टार रजनीकांत पर 'रोबोट' को रूपहले पर्दे पर पेश कर दर्शकों को रोमांचित कर दिया था। तब किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया था कि हम एक दिन ह्यूमनॉइड रोबोट के दौर में जा पहुंचेंगे। आज संपूर्ण विश्व में एआइ से लेस मानव सृजित और इंसानी खूबियों से भरपूर रोबोट यानी ह्यूमनॉइड विकसित करने की होड़ ने हर अंदाजे की हद को हरा दिया है। ऐसा इसलिए कि एक तकनीक से प्रशिक्षित ह्यूमनॉइड रोबोट अधिक सटीक, उत्पादक और समयबद्ध कार्य करने में सक्षम होता है। मजेदार बात तो यह है कि कंपनियों को एक बार खर्च करने के बाद इंसान के मुकाबले उसकी लागत कम आती है। यही नहीं न ही उसे वेतन देना होगा और न ही अवकाश। यानी कि सिर्फ चार्ज करना है और समय-समय पर अपडेट करना ही पर्याप्त होगा। हालांकि अब ऊर्जा किफायती ह्यूमनॉइड रोबोट पर भी अनुसंधान किया जा रहा है, जिन्हें सौर ऊर्जा सहित अन्य वैकल्पिक उपायों से चार्ज किया जा सके।
चीन और अमरीका तो बहुत तेजी से एआइ पावर्ड ह्यूमनॉइड रोबोट के बहुउद्देशीय मॉडल ईजाद कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें वैश्विक बाजार में इसकी मांग और मुनाफा ही नहीं, अपने देश की बुनियादी जरूरतों का एक उत्पादक समाधान सुनिश्चित लग रहा है। कारण यह भी है कि कम जनसंख्या वाले देशों सहित इंडस्ट्री में गुणात्मक उत्पादकता के लिए एआइ से लैस ह्यूमनॉइड हाथों-हाथ बिकने वाले ऐसे विकल्प हैं, जिन्हें मनुष्यों की तरह प्रशिक्षित करने में लगने वाला समय और उन पर किए जाने वाले कंपनी के खर्च सहित काम के घंटे से जुड़े मानवाधिकार या मुआवजे की जरूरत नहीं होगी। हमारे देश की बात की जाए तो लखनऊ के राजपुर गांव में कंपोजिट स्कूल के शिक्षक मोहनलाल सुमन ने महज तीन हजार रुपए में लकड़ी की एक ह्यूमनॉइड एआइ शिक्षिका 'मैडम सुमन' को विकसित किया है। मैडम सुमन विद्यार्थियों के सवालों के जवाब देती है। इसे देसी एलेक्सा भी कहा जा सकता है। इसी प्रकार हांगकांग की रोबोटिक्स कंपनी मगडैंग टेक्नोलॉजी का एआइ संचालित सांता रोबोट 'हेसांता' लोगों को हंसाता है और कहानियां उनका मनोरंजन ही नहीं पढ़ाई भी कराता है।
2017 में इन्वेंटो रोबोटिक्स ने एक सेमी ह्यूमनॉइड 'मित्रा' विकसित किया था। बेन एंड कंपनी का तर्क है कि बीते दो साल में मल्टीटास्किंग रोबोट्स यानी ह्यूमनॉइड्स की कीमत 40 प्रतिशत घटी है। पहले इसकी औसत कीमत 85 लाख थी, जो कि वर्ष 2032 तक 17 लाख ही रह जाएगी। कॉग्निेटिव मार्केट रिसर्च का अनुमान है कि भारत में 2030 तक ह्यूमनॉइड का बाजार 1280 करोड़ तक पहुंच सकता है। ह्यूमनॉइड का हर क्षेत्र में हरफन मौला होना, इंडस्ट्री से लेकर आम आदमी की जरूरत बनने वाला है। दिक्कत यह है कि ह्यूमनॉइड न जाने कितने लोगों का रोजगार खा जाएगा या निजता भंग कर सताएगा। कुल मिलाकर संभावनाओं और आशंकाओं के बीच ह्यूमनॉइड की होड़ का नैतिक व संयमित तोड़ अभी ही निकालना होगा। इसके लिए भारत सरकार को नेशनल ह्यूमनॉइड अडप्टिंग पॉलिसी बनानी होगी।