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संपादकीय: मालदा घटना पर राजनीति नहीं, सख्त कार्रवाई हो

मालदा की यह घटना साफ बताती है कि भीड़तंत्र को हावी होने से रोकने के ईमानदारी से प्रयास ही नहीं किए गए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा बताया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआइआर) के काम में लगे न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा नौ घंटे तक बंधक बनाने व उन पर हमले की वारदात को रोकने में विफल रहने के लिए पश्चिम बंगाल के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के एक गांव में हुई इस घटना को कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोडऩे और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को चुनौती देने का दुस्साहसी प्रयास बताया है। घटना को रोकने में नाकामी को सुप्रीम कोर्ट ने 'आपराधिक विफलता' की संज्ञा देते हुए चुनाव आयोग को यह भी कहा है कि जहां भी न्यायिक अधिकारी एसआइआर के मामलों की सुनवाई कर रहे हों, वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात किया जाए।

पश्चिम बंगाल में इसी माह दो चरणों में राज्य विधानसभा के लिए मतदान होना है। चुनावों के मौके पर सियासी बयानबाजी का दौर तो स्वाभाविक है। लेकिन चुनाव प्रकिया का हिस्सा बनने वाली मशीनरी पर इस तरह के हमले को शर्मनाक और न्यायापालिका की गरिमा को चोट पहुंचाने वाला ही कहा जाएगा। मालदा की यह घटना साफ बताती है कि भीड़तंत्र को हावी होने से रोकने के ईमानदारी से प्रयास ही नहीं किए गए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा बताया है। सवाल सिर्फ पश्चिम बंगाल का ही नहीं, देशभर में कहीं भी इस तरह की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। एसआइआर के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल में हो रही राजनीति भी जगजाहिर है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग व केंद्र सरकार पर हमलावर रही है। लेकिन यह दुर्भाग्यजनक है कि इस शर्मनाक घटना पर भी वहां राजनीति होने लगी है। अपनी मांग रखने व विरोध प्रदर्शन का हक लोकतंत्र में सबको है। बड़े-बड़े आंदोलनों के भी शांतिपूर्वक समाधान के रास्ते निकलते आए हैं। एसआइआर में मतदाता सूची से नाम कटने की सुनवाई की भी व्यवस्था बनाई गई है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए हैं, जो मतदाता सूचियों से नाम हटाने या जोडऩे से जुड़ी अपीलों की सुनवाई कर रहे हैं। इसके बावजूद इस व्यवस्था को ही चुनौती देने के प्रयास होने लगें तो इसे लोकतंत्र के हित में कतई नहीं कहा जा सकता।

बंगाल में ही नहीं, प्रशासनिक मशीनरी की कहीं भी विफलता होती है तो सवाल नौकरशाही की जवाबदेही का उठता है। मतदान के दौरान ऐसा दुस्साहस होता दिखे तो निष्पक्ष मतदान पर भी सवाल उठने लगते हैं। आज आवश्यकता है कि ऐसी घटनाओं पर कठोर कार्रवाई हो, जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराया जाए। चुनावों के मौकों पर यह जवाबदेही और भी ज्यादा जरूरी है। लोकतंत्र की खूबसूरती विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की मजबूती से ही संभव है। आरोप-प्रत्यारोप के बजाय लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए।