
Gulab Kothari Articles : स्पंदन : स्वयं के लिए जीना ही नकारात्मकता : मेरा दूसरों से अलग होना ही नकारात्मकता है। स्वयं के लिए जीना ही नकारात्मकता है। नदी की तरह सहज रूप से बहते जाना देने का भाव है। पेड़ की तरह सब पथिकों को छाया देना, बिना अपेक्षा भाव के, यही तो वात्सल्य है। मातृत्व भाव का यही तो महत्त्व है। देने का भाव ही दूसरों के लिए जीना है। लेने, मांगने, लूटने का भाव आसुरी वृत्ति कहलाती है।
Published on:
02 Apr 2026 03:36 pm
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