सुधार: अनुमान है कि पंजीकृत वाहनों में से आधे बिना बीमा के ही चल रहे हैं
मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अनुसार मोटर वाहनों का तृतीय पक्ष बीमा (थर्ड पार्टी इंश्योरेंस) अनिवार्य है। इस अनिवार्यता की वजह क्या है? असल में वाहन दुर्घटनाओं में आमजन को जान-माल की हानि का अंदेशा बना रहता है। इसकी भरपाई दोषी वाहन चालक तथा मालिक की जिम्मेदारी है। विधि द्धारा निर्धारित मुआवजे के भुगतान के लिए ये आर्थिक रूप से सक्षम हों, यह जरूरी नहीं है। कई मामलों में सक्षम लोगों द्वारा भी भुगतान से बचने के हर संभव प्रयास के कारण उनसे वसूली बेहद मुश्किल होती है। इसी पृष्ठभूमि में थर्ड पार्टी इंश्योरेंस को कानूनन आवश्यक बनाया गया।
बीमा कंपनियां बीमा के जरिये वाहन मालिक तथा चालक की दुर्घटना पीडि़तों के प्रति विधिक देयता का जिम्मा लेती हैं। इसलिए वे सामान्यतया निर्धारित मुआवजे का भुगतान आसानी से कर देती हैं। इससे पीडि़तों को राहत सुनिश्चित हो जाती है। इरडा द्वारा गठित इंश्योरेंस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की 'अनइंश्योर्ड व्हीकल रिपोर्ट, 2019' के अनुसार देश में करीब 57 फीसदी वाहनों का बीमा नहीं था। लोकसभा में गत वर्ष पेश रिपोर्ट के अनुसार 54 फीसदी से अधिक वाहन बिना बीमा के थे।
अनुमान है कि आज भी लगभग 38.21 करोड़ पंजीकृत वाहनों में आधे बीमित नहीं हैं। बिना बीमा वाहन चलाने पर प्रथम उल्लंघन पर 2000 तथा बाद के उल्लंघनों पर 4000 रुपए के दंड तथा/अथवा तीन माह तक की सजा के प्रावधान के बावजूद यह स्थिति है। जानकारी का अभाव, वाहन मालिकों की कानून की आदतन अवहेलना के अलावा सरकारी प्रवर्तन तंत्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। इनकी मिलीजुली लापरवाही सभी हितधारकों पर भारी पड़ती है। बिना बीमा वाले वाहन से दुर्घटनाग्रस्त होने पर पीडि़तों को न्यायोचित मुआवजा मिलने की संभावना क्षीण हो जाती है। दोषी चालक/मालिक की आर्थिक अक्षमता के चलते हो सकता है कि पीडि़तों को मुआवजा न मिले या उसके लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़े। अपने वाहनों का बीमा करवाने वाले लोग बीमा रहित वाहनों का बोझ प्रीमियम की ऊंची दरों के रूप में उठाते हैं। यदि सभी वाहनों का बीमा हो तो जोखिम का फैलाव लगभग दोगुने लोगों में होने से बीमा प्रीमियम की दरें काफी कम हो सकती हैं।
बिना बीमा वाले वाहन से हुई दुर्घटना के कई मामलों में धोखाधड़ी तथा मिलीभगत से किसी बीमित वाहन को दुर्घटना में लिप्त बता दिया जाता है। इससे बीमा पूल पर दावों का बोझ पडऩे से दरों में गैरजरूरी वृद्धि की मार भी इन पर पड़ती है। बीमा योग्य बड़े समूह के बीमा रहित रहने से सरकार को भी कर-राजस्व का बड़ा नुकसान होता है। इससे बीमा कंपनियों के व्यवसाय पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बिना बीमा वाले वाहनों के मालिक तथा चालक भी ऐसे वाहन से दुर्घटना होने पर बड़ी मुश्किल में फंस सकते हैं। यदि वे निर्धारित मुआवजा न चुका पाएं तो जेल जाने तक की नौबत भी आ सकती है। वाहन बीमा पॉलिसी सामान्यतया एक वर्ष के लिए जारी की जाती है, जिसका प्रति वर्ष नवीनीकरण आवश्यक है। नवीनीकरण सीधे बीमा कंपनियों अथवा इनके या बीमा मध्यस्थों के ऑनलाइन प्लेटफार्म पर किया जा सकता है। जान-बूझकर बीमा नहीं करवाने वालों की तादाद बहुत अधिक है। प्रशासन को इनसे निपटने की अधिक आवश्यकता है।
बीमा रहित वाहनों को बीमा नेटवर्क में लाने के लिए सघन व सतत अभियान की आवश्यकता है। न केवल ट्रैफिक सिग्नल बिन्दुओं पर बल्कि पेट्रोल पंपों, बड़े सार्वजनिक स्थलों यथा रेलवे स्टेशन, बस स्टेंड, अस्पताल, कार्यालय, मॉल, पार्क, हाउसिंग सोसाइटी आदि के पार्किंग स्थलों पर ऐसा अभियान चलाया जाना चाहिए। इन अभियानों में बीमा रहित वाहनों का न केवल चालान कर जुर्माना वसूलने बल्कि वहीं पर वाहन का बीमा करने की व्यवस्था भी हो। बीमा कंपनियां ऐसी व्यवस्था सहर्ष करेंगी। ऐसे अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में भी चलाए जाने चाहिए। दुर्घटना पीडि़तों सहित सभी हितधारकों के हित में प्रवर्तन तंत्र यह सुनिश्चित करने का ईमानदार प्रयास करे कि बिना थर्ड पार्टी बीमा के कोई वाहन सड़क पर आ ही न सके।
— आर. के. विजय