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संपादकीय: ट्रंप की ‘शांति परिषद’ और भारत के नए खतरे

शांति परिषद में शामिल होने का मतलब उस ट्रंप को हमेशा के लिए अपना चौधरी मानना है, जो अपने हितों के लिए किसी भी नियम को मानने की नैतिकता नहीं रखते।

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अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उस उदारवादी विश्व व्यवस्था को धता बता दिया है, जिसका अघोषित नेतृत्व अब तक अमरीका ही कर रहा था। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) पर राष्ट्रपति ट्रंप ने एक तरह से खुद ही इसकी घोषणा कर दी। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की वैश्विक संस्थाओं-व्यवस्थाओं पर लानत बरसाते हुए अपने सहयोगियों को 'मुफ्तखोर' बताकर 'टैरिफ-वॉर' तेज करने का संकल्प जताया। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कॉर्नी ने अमरीका का नाम लिए बिना, वैश्विक दृष्टिकोण में आई दरार का जिक्र करते हुए उस क्रूर हकीकत की शुरुआत बताया जिसमें ताकतवर देशों की भू-राजनीति किसी बाध्यता को नहीं मानती। इसके एक दिन पहले, अमरीकी वाणिज्य मंत्री हॉर्वर्ड लुटनिक ने साफ कहा, 'वैश्वीकरण ने पश्चिम और अमरीका को विफल कर दिया है और 'विश्व व्यापार प्रणाली' जिसकी डिजाइन अमरीका ने ही बनाई थी, अब इतिहास है।' ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था को सीधी चुनौती देते हुए नई शांति परिषद (बोर्ड ऑफ पीस) का गठन भी कर दिया। भारत व चीन ही नहीं, ज्यादातर यूरोपीय देशों को भी यह विचार हजम नहीं हो रहा है। पाकिस्तान सहित करीब 19 देश इसमें शामिल हो गए हैं।

दावोस से जो सामने आ रहा है उसके पर्याप्त संकेत हैं कि दुनिया की व्यवस्थाएं नया आकार लेंगी। भारत के लिए न सिर्फ आर्थिक, बल्कि सामरिक नजरिये से भी चौकस होने का समय है। कथित शांति परिषद में शामिल होने का मतलब उस ट्रंप को हमेशा के लिए अपना चौधरी मानना है, जो अपने हितों के लिए किसी भी नियम को मानने की नैतिकता नहीं रखते। ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी दे-देकर ट्रंप ने कथित रूप से नाटो को इस बात के लिए राजी कर ही लिया कि 'बर्फ के इस टुकड़े' पर अमरीका का असीमित हस्तक्षेप होने दिया जाए। बकौल ट्रंप, ब्रसेल्स में हुई डील के अनुसार, ग्रीनलैंड में स्थाई तौर पर अमरीकी सेना की संपूर्ण पहुंच सुनिश्चित हो गई है। यदि यह सच है तो इसका मतलब यह हुआ कि दावोस में आर्थिक मंच पर ट्रंप को खुल्लमखुल्ला खरी-खोटी सुनाने के बाद यूरोपीय नेताओं ने ग्रीनलैंड को बलपूर्वक हथियाने के बदले सम्मानपूर्वक हासिल करने का रास्ता देने पर सहमति जता दी है।

ट्रंप की संस्थापक अध्यक्षता वाली शांति परिषद एक 'पॉकेट ऑर्गेनाइजेशन' जैसी है। हमारे लिए चिंता की बात अमरीका का पाकिस्तान की ओर झुकाव है। यह कश्मीर के मसले पर परेशानी का कारण बन सकता है। 'शांति परिषद' के दस्तावेजों में 'संघर्ष से प्रभावित और खतरे में पड़े क्षेत्रों' में स्थिरता को बढ़ावा देने, 'विश्वसनीय' और 'वैध शासन' बहाल करने और 'स्थाई शांति सुनिश्चित करने' का प्रयास करने का जिक्र है। यह 'विफल हो चुके दृष्टिकोणों और संस्थानों से अलग होने के साहस' पर भी जोर देता है। भारत के लिए इसके मद्देनजर अपनी पोजिशन दुरुस्त करने का समय है।