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प्रारंभिक कक्षाओं से ही मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य विषय बनाएं

इस संकट से निपटने के लिए सभी नागरिकों, पुलिस, चिकित्सा विभाग एवं अन्य संस्थाओं को अपनी भूमिकाओं पर सजगता से पुनर्विचार करने की जरूरत है। ऐसे में शिक्षकों और शिक्षण संस्थाओं का भी दायित्व है कि वे विद्यार्थियों के साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करें।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 10, 2026

डॉ. ज्योति सिडाना - समाजशास्त्री,

आज केवल हमारा देश ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के समाज मानसिक अस्वस्थता के परिणामों को झेल रहे हैं और उनके नागरिकों विशेष रूप से युवाओं के सामने अस्तित्व का संकट उभरकर आया है। यह भी एक तथ्य है कि इससे हर आयु, वर्ग, जाति, धर्म और जेंडर का व्यक्ति प्रभावित हो रहा है या हुआ है। दिन-प्रतिदिन इस तरह के समाचार या घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें पुत्र ने पिता की, पत्नी ने पति या पति ने पत्नी की हत्या कर दी या किसी विद्यार्थी ने विफल होने/पेपर बिगडऩे पर आत्महत्या कर ली, किसी से राह चलते झगड़ा हो गया तो हत्या कर दी और तो और छोटे छोटे बच्चे भी अब इस तरह की आपराधिक घटनाओं में शामिल होने लगे हैं। संभवत: इन घटनाओं के पीछे एक कारण मानसिक अस्वस्थता है, जो धीरे-धीरे महामारी का रूप लेता जा रहा है। इन हालातों को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि अब मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय को गंभीरता से लिया जाए।

हाल ही इसरो के सेवानिवृत वैज्ञानिक ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी कि मेरे मरने के बाद इसकी देखभाल कौन करेगा क्योंकि उनकी इकलौती बेटी अमरीका में बसी थी, जिससे उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। इसी तरह मुंबई के एक पॉश इलाके में एक बुजुर्ग दम्पती की सड़ी हुई लाशें उनके आलीशान बंगले में मिली, जिनके दोनों बेटे विदेश में बसने के कारण अपने बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल करने में असमर्थ थे, जिनके पास अकूत धन दौलत थी, लेकिन समय नहीं था। एक तीसरी घटना में लखनऊ में एक पुत्र ने अपने पिता की हत्या कर दी क्योंकि उनमें शिक्षा-रोजगार को लेकर मतभेद थे। तीनों ही घटनाओं में परिवार हर दृष्टि से समृद्ध और सम्पन्न थे लेकिन परिवार के सदस्यों में भावनात्मक लगाव और संवादहीनता की स्थिति थी। भौतिक सम्पन्नता और तकनीकी विकास किस काम का जब देश के युवा और किशोर पीढ़ी का अस्तित्व ही संकट में है। यह कैसा विरोधाभास है, जिसमें एक तरफ समाज का डिजिटलीकरण कर आभासी समाज व आभासी संबंधों का निर्माण किया जा रहा है और दूसरी ओर वास्तविक समाज एवं मनुष्य के मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को हाशिए पर धकेलकर उनके अस्तित्व को ही चुनौती दी जा रही है। 

सवाल यह है कि आखिर हम सब वास्तविक समाज को छोड़कर आभासी समाज की ओर कदम क्यों बढ़ा रहे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि औपचारिक एवं अनौपचारिक संबंधों और संस्थाओं में आए बदलावों के कारण ही युवाओं-किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य विकराल स्थिति में पहुंच चुका है। इस संकट से निपटने के लिए सभी नागरिकों, पुलिस, चिकित्सा विभाग एवं अन्य संस्थाओं को अपनी भूमिकाओं पर सजगता से पुनर्विचार करने की जरूरत है। ऐसे में शिक्षकों और शिक्षण संस्थाओं का भी दायित्व है कि वे विद्यार्थियों के साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करें। विशेषज्ञों की सहायता से समय-समय पर कार्यशालाओं का आयोजन किया जाए ताकि उनकी मानसिक स्थिति को संतुलित बनाए रखा जा सके। युवाओं को एक बार फिर से डार्विन के उत्तरजीविता का सिद्धांत को याद करना होगा यानी जीवन के संघर्ष में वही व्यक्ति जीवित रहेंगे या जीतेंगे जो अपने को स्वस्थ बनाए रखेंगे और हर तरह के परिवेश के साथ सामंजस्य बनाना सीख लेंगे। अब आवश्यक है कि प्रारंभिक कक्षाओं से ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से संबंधित पाठ्यक्रम को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।