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सूचनाओं पर व्यक्तिगत-सामूहिक स्वामित्व खतरे में!

विवाद के मूल में 2023 में डीपीडीपीए की ओर से आरटीआइ कानून में किया गया संशोधन है। इस संशोधन के बाद, समस्त 'व्यक्तिगत सूचना' को 'निजी सूचना' मानकर सार्वजनिक करने से प्रतिबंधित किया है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 10, 2026

अरुणा रॉय, निखिल डे - मजदूर किसान शक्ति संगठन और सूचना का जन अधिकार राष्ट्रीय आंदोलन के संस्थापक सदस्य

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका स्वीकार करते हुए उस पर नोटिस जारी किया है और समाचारों के अनुसार इसे बड़ी पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है। यह याचिका नेशनल कैंपेन फॉर द पीपुल्स राइट टू इंर्फोमेशन (एनसीपीआरआइ), द रिपोर्टर्स कलेक्टिव और एक आरटीआइ कार्यकर्ता की ओर से दायर की गई है। इसमें सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून की धारा 8(1)(जे) में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। यही वह प्रावधान था जो सुनिश्चित करता था कि आरटीआइ का उपयोग किसी व्यक्ति की निजता का अतिक्रमण न करे और साथ ही जनहित से जुड़ी सूचनाएं उपलब्ध कराई जा सकें। सूचना का अधिकार और निजता का अधिकार दोनों ही संविधान द्वारा संरक्षित मूलभूत अधिकार हैं। इनके बीच संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है। ऐसा संतुलन, जिसमें नागरिकों की सूचनाओं पर उनका व्यक्तिगत और सामूहिक स्वामित्व सुरक्षित रहे और साथ ही निजता तथा जनहित दोनों की रक्षा हो सके। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (डीपीडीपीए) ने इसी प्रावधान को संशोधित कर, इस बहुत ही महत्वपूर्ण संतुलन को तोड़ दिया है। विवाद के मूल में 2023 में डीपीडीपीए की ओर से आरटीआइ कानून में किया गया संशोधन है। इस संशोधन के बाद, समस्त 'व्यक्तिगत सूचना' को 'निजी सूचना' मानकर सार्वजनिक करने से प्रतिबंधित किया है। आरटीआइ के तहत मांगने पर सूचना मिलेगी नहीं व डीपीडीपीए के तहत बिना सहमति लिए किसी व्यक्ति से जुड़ी सूचना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। यह परिवर्तन केवल भाषा का बदलाव नहीं है, यह सूचना व्यवस्था की संरचना और उसके दार्शनिक आधार को प्रभावित करता है। यदि हर व्यक्तिगत सूचना को निजी मान लिया जाए और उस पर व्यापक रोक लगा दी जाए, तो जनहित से जुड़ी अनेक सूचनाएं स्वत: प्रतिबंधित हो जाएंगी।

पिछले दो वर्षों से जब से डीपीडीपीए पारित हुआ है, इस पर सार्वजनिक बहस जारी है। किंतु इसे वह व्यापक गंभीरता नहीं मिली, जिसकी आवश्यकता थी। यह कानून 14 नवंबर 2025 से लागू किया गया। अनेक नागरिक समूहों, पत्रकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी चिंताएं व्यक्त कीं, परंतु उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। आज स्थिति यह है कि भारत में पारदर्शिता और निजता की अवधारणा दोनों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। डीपीडीपीए को एक 'अधिकार-आधारित' कानून के रूप में प्रस्तुत किया गया। कहा गया कि यह नागरिकों को बड़ी डेटा कंपनियों और संस्थाओं के सामने सशक्त बनाएगा, वे संस्थाएं, जो डिजिटल माध्यमों से लोगों की जानकारी एकत्र कर उससे आर्थिक लाभ अर्जित करती हैं। इसका घोषित उद्देश्य था डिजिटल डेटा के उपयोग को विनियमित करना, नागरिकों को अपने डेटा पर स्वामित्व देना और उनकी निजता की रक्षा सुनिश्चित करना। दूसरी ओर, आरटीआइ कानून ने सूचना को व्यापक रूप से परिभाषित किया और सरकार को स्वप्रेरणा से सूचना सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया।

डीपीडीपीए ने 'निजता' की कोई परिभाषा नहीं दी, जबकि 'व्यक्तिगत डेटा', 'डिजिटल डेटा', 'सहमति', 'डेटा फिड्युशियरी' और 'डेटा उल्लंघन' जैसे शब्दों को व्यापक रूप में परिभाषित किया और कठोर दंड का प्रावधान जोड़ा। धारा 44(3) के माध्यम से आरटीआइ में किया गया संशोधन इस संतुलन को कमजोर करता है। जहां पहले एक विवेकपूर्ण अपवाद था, वहां अब लगभग पूर्ण प्रतिबंध की आशंका उत्पन्न हो जाती है। संशोधन के बाद 'व्यक्तिगत सूचना' के प्रकटीकरण पर सीधा और व्यापक प्रतिबंध लागू हो सकता है। इससे सूचना का अधिकार व्यवहार में सूचना न देने के अधिकार में बदल सकता है। डीपीडीपीए में 'निजता' को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया, इसलिए 'व्यक्तिगत सूचना' को उस व्यक्ति की स्पष्ट सहमति के बिना प्रोसेस करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इससे पत्रकारिता, शोध और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्य प्रभावित हो सकते हैं। खोजी पत्रकारिता पर गंभीर असर पड़ सकता है। यदि हर खुलासे से पहले संबंधित व्यक्ति से अनुमति लेनी पड़े, तो सार्वजनिक हित में सूचना का प्रकाशन जटिल और असंभव हो जाएगा। साथ ही भारी आर्थिक दंड का प्रावधान भय का वातावरण बना सकता है, जिससे स्वतंत्र अभिव्यक्ति और स्रोतों की गोपनीयता दोनों पर दबाव पड़ेगा।

आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां यह तय करना आवश्यक है कि सूचना का वास्तविक स्वामी कौन है। नागरिक अपनी सूचना के व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में स्वामी हैं। यही सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार का संवैधानिक आधार है। जो सूचना सार्वजनिक कार्य और जनहित से संबंधित है, उसमें पारदर्शिता अनिवार्य है और जो सूचना किसी व्यक्ति के निजी जीवन तक सीमित है, उसकी सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

'व्यक्तिगत' और 'निजी' को एक समान मानकर व्यापक प्रतिबंध लगाने से इस कानून की उपयोगिता सीमित हो जाएगी। यदि नागरिकों की पहुंच सूचनाओं तक घटती है, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही भी कमजोर होगी। आरटीआइ में किए गए संशोधन का कोई औचित्य सामने नहीं आया। इस संशोधन को रद्द किया जाना चाहिए। साथ ही, डीपीडीपीए के अंतर्गत नागरिकों को अपनी सूचना पर वास्तविक, प्रभावी और स्पष्ट स्वामित्व सुनिश्चित किया जाए। अन्यथा डिजिटल युग में सूचना की शक्ति सरकारों और कंपनियों के हाथों में केंद्रित होकर रह जाएगी और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ सकती हैं।