भावुकता ही संबंधों का असली आधार है। भावुक लोग रिश्तों को संभालते हैं, क्योंकि उनके हृदय में करुणा और समझ होती है। वे त्याग करने को तैयार रहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के।
अविनाश जोशी, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
जीवन के इस भागदौड़ भरे दौर में संबंधों का महत्व किसी से छिपा नहीं है। आज लोग लाभ-हानि के चश्मे से रिश्तों को तौलते हैं, जो अंतत: खोखले साबित होते हैं। सच्चे संबंध भावनाओं, विश्वास और निस्वार्थता पर टिके होते हैं, न कि स्वार्थी गणित पर। संबंधों की नींव जब लाभ की सोच पर रखी जाती है, तो वह कभी मजबूत नहीं बन पाती। प्राचीनकाल से ही भारतीय दर्शन में कहा गया है कि 'अतिथि देवो भव' यह भावना लाभ की अपेक्षा के बिना सेवा और प्रेम पर आधारित है। आधुनिक समय में लोग अक्सर सोचते हैं कि यह संबंध कितना फायदा देगा, कितना नुकसान पहुंचाएगा। ऐसा सोचना मानवीय कमजोरी को दर्शाता है।
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि स्वार्थी रिश्ते तनाव और अकेलापन बढ़ाते हैं, जबकि निस्वार्थ बंधन खुशी और संतुष्टि प्रदान करते हैं। जब हम किसी से मिलते हैं, तो पहले उसकी उपयोगिता देखते हैं क्या यह नौकरी दिलवा सकता है, क्या व्यापार बढ़ा सकता है? यह सोच रिश्तों को व्यापार बना देती है। सच्चाई यह है कि जीवन में सच्चे साथी वही हैं जो विपत्ति में काम आएं, न कि केवल सुख में। भावुकता ही संबंधों का असली आधार है। भावुक लोग रिश्तों को संभालते हैं, क्योंकि उनके हृदय में करुणा और समझ होती है। वे त्याग करने को तैयार रहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के। उदाहरणस्वरूप, मां-बच्चे का रिश्ता, मां कभी यह नहीं सोचती कि बच्चा बड़ा होकर क्या देगा। वह केवल प्रेम से पालती है। इसी प्रकार, सच्चे मित्र वे हैं जो आपकी कमजोरियों को जानकर भी साथ न छोड़ें। प्रोफेशनल लोग अक्सर फायदा देखकर संबंध बनाते हैं, जो ठीक है व्यापारिक क्षेत्र में। लेकिन व्यक्तिगत जीवन में यह घातक है। भारतीय संस्कृति में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का सिद्धांत है, जहां सारा विश्व परिवार है। लाभ की सोच इस महान विचार को कुचल देती है।
अध्ययनों से ज्ञात होता है कि निस्वार्थ संबंधों वाले लोग लंबे समय तक स्वस्थ और सुखी रहते हैं। इसलिए, प्रभाव देखकर मत बनाइए, रिश्ते बनाइए तो दिल से। रिश्ते बनाने से पहले स्वयं को समझिए। यदि कोई रिश्ता आपको कमजोर करे, तो उसे बनाए रखने की जिद न करें। लेकिन लाभ के लिए भी न बनाएं। सच्चा रिश्ता वही है जो आपको बेहतर इंसान बनाए। सोशल मीडिया पर लोग फॉलोअर्स के लिए रिश्ते बनाते हैं, लाइक्स के लिए दोस्ती निभाते हैं। नतीजा नकली रिश्ते। कैसे बदलें यह सोच? पहला, आत्म-चिंतन करें। रोज रिश्तों की समीक्षा करें क्या मैं लाभ देख रहा हूं? दूसरा, छोटे कदम उठाएं बिना अपेक्षा के मदद करें। तीसरा, आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ें। चौथा, 'ना' कहना सीखें, जहां जरूरी हो। इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा। पांचवां, परिवार से शुरू करें बिना शर्त प्रेम दें। इससे धीरे-धीरे समाज बदलेगा।