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हादसे के बाद शोर, फिर खामोशी, जिम्मेदार कौन?

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि बच्चा बोरवेल में कैसे गिरा, बल्कि यह है कि खुला और अनुपयोगी बोरवेल वहां था ही क्यों? यदि नियमों के अनुसार उसे समय रहते बंद कर दिया जाता, सुरक्षा घेरा लगाया जाता और स्थानीय प्रशासन नियमित निगरानी करता, तो ऐसी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था। दुर्भाग्य से हमारे यहां रोकथाम की बजाय हादसे के बाद बड़े रेस्क्यू अभियान पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि थोड़ी-सी सतर्कता कई मासूम जिंदगियां बचा सकती हैं।
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Jul 13, 2026
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योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार
देश के विभिन्न हिस्सों में खुले बोरवेल में बच्चों के गिरने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। हर बार तस्वीर लगभग एक जैसी होती है। खेलते-खेलते कोई मासूम गहरे बोरवेल में गिर जाता है, फिर पुलिस, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, प्रशासन और बचाव दल कई घंटों या दिनों तक रेस्क्यू अभियान चलाते हैं। पूरा देश बच्चे की सलामती की दुआ करता है, लेकिन कई मामलों में अंत दुखद होता है। हाल ही हरियाणा के अंबाला में चार वर्षीय निरवैर सिंह की 220 फीट गहरे खुले बोरवेल में गिरने से मौत हो गई, जबकि इससे पहले पंजाब के होशियारपुर में एक बच्चे को नौ घंटे के रेस्क्यू के बाद सुरक्षित निकाल लिया गया। ऐसी घटनाएं अब केवल हादसे नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक गैर-जिम्मेदारी का प्रतीक बन चुकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि बच्चा बोरवेल में कैसे गिरा, बल्कि यह है कि खुला और अनुपयोगी बोरवेल वहां था ही क्यों? यदि नियमों के अनुसार उसे समय रहते बंद कर दिया जाता, सुरक्षा घेरा लगाया जाता और स्थानीय प्रशासन नियमित निगरानी करता, तो ऐसी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था। दुर्भाग्य से हमारे यहां रोकथाम की बजाय हादसे के बाद बड़े रेस्क्यू अभियान पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि थोड़ी-सी सतर्कता कई मासूम जिंदगियां बचा सकती हैं।

अधिकांश शिकार 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे
देश में अनुमानत: 2.7 करोड़ से अधिक बोरवेल हैं। चिंता की बात यह है कि आज तक यह स्पष्ट राष्ट्रीय रेकॉर्ड उपलब्ध नहीं है कि कितने बोरवेल सक्रिय हैं, कितने बंद हो चुके हैं और कितने खुले पड़े हैं। ऐसे में दुर्घटनाओं की रोकथाम की प्रभावी योजना बनाना कठिन हो जाता है। गिरते भूजल स्तर के कारण किसान लगातार नए बोरवेल खुदवा रहे हैं। कई बार पानी नहीं मिलने या सूख जाने पर इन्हें बिना सुरक्षित तरीके से बंद किए छोड़ दिया जाता है। कुछ स्थानों पर मिट्टी, बोरी या लकड़ी से मुंह ढक दिया जाता है, जो कभी भी धंस सकता है। यह लापरवाही मानव जीवन को खतरे में डालती है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि बोरवेल हादसों के अधिकांश शिकार 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। जिज्ञासावश वे खुले गड्ढों के पास चले जाते हैं। ऐसे में जिम्मेदार बच्चे नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो खुले बोरवेलों को यों ही छोड़ देती है। एनडीआरएफ के अनुभव बताते हैं कि ऐसे मामलों में सफल रेस्क्यू की संभावना सीमित होती है। गहराई, ऑक्सीजन की कमी और संकरी जगह के कारण बचाव अभियान अक्सर घंटों या कई बार दो-दो दिन तक चलता है, फिर भी परिणाम दुखद रहता है। इसलिए सबसे प्रभावी उपाय पहले से रोकथाम है। इसी उद्देश्य से 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि बोरवेल की खुदाई की सूचना प्रशासन को दी जाए, चेतावनी बोर्ड और सुरक्षा घेरा लगाया जाए तथा अनुपयोगी बोरवेल को पूरी तरह भरकर स्थायी रूप से बंद किया जाए। बावजूद इसके इन निर्देशों का पालन आज भी कई जगह प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है।

पालना कौन सुनिश्चित करेगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं, तो उनकी पालना कौन सुनिश्चित करेगा? क्या खुले और अनुपयोगी बोरवेलों का नियमित सर्वेक्षण होता है? क्या नियमों का उल्लंंघन करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई की जाती है? ऐसे हादसों की जिम्मेदारी केवल खेत मालिक की नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की भी है। अंबाला हादसे में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया, जो सकारात्मक कदम है। लेकिन जब तक खुले बोरवेल छोडऩे जैसी लापरवाही पर कड़ी और प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे रुकना मुश्किल है। जरूरत नए कानूनों से अधिक, मौजूदा नियमों के सख्ती से पालन की है। बोरवेल हादसों की रोकथाम के लिए हर जिले में सभी बोरवेलों का डिजिटल पंजीकरण किया जाना चाहिए। सक्रिय, निष्क्रिय और परित्यक्त बोरवेलों का अलग-अलग रेकॉर्ड तैयार हो तथा नियमित सर्वेक्षण के जरिए खुले बोरवेलों को बंद कराया जाए। साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त आर्थिक दंड लगाया जाए। क्यूआर कोड, जीपीएस लोकेशन और मोबाइल ऐप जैसी तकनीकों का उपयोग निगरानी को अधिक प्रभावी बना सकता है। वास्तव में खुले बोरवेल केवल खेतों में मौजूद गहरे गड्ढे नहीं बल्कि हमारी प्रशासनिक उदासीनता, सामाजिक असावधानी और कानून के कमजोर क्रियान्वयन की गहरी खाई का प्रतीक हैं।

स्थायी विराम लगाने का समय
यदि अब भी सरकारें, स्थानीय प्रशासन, पंचायतें और समाज नहीं चेते तो आने वाले समय में फिर किसी गांव से किसी निरवैर, भागीरथ या किसी अन्य मासूम की दर्दनाक चीख सुनाई देगी और हम फिर वही प्रश्न पूछेंगे कि आखिर यह हादसा कैसे हुआ? अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह कि खुला बोरवेल वहां रहने ही क्यों दिया गया? जिस दिन इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोज लिया जाएगा, उसी दिन शायद किसी मासूम की जिंदगी बोरवेल की अंधेरी गहराई में नहीं बल्कि सुरक्षित भविष्य की रोशनी में आगे बढ़ सकेगी। मासूमों की कब्र बनते खुले बोरवेलों पर स्थायी विराम लगाने का समय अब आ चुका है, यदि अब भी नहीं चेते तो इतिहास हमारी संवेदनहीनता को कभी क्षमा नहीं करेगा।

Updated on:
13 Jul 2026 05:05 pm
Published on:
13 Jul 2026 04:43 pm