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हिंद और प्रशांत महासागर के बीच भविष्य के शक्ति-संतुलन के स्तंभ

हिंद महासागर और प्रशांत के मध्य यदि भविष्य का शक्ति-संतुलन निर्मित होना है, तो दिल्ली और जकार्ता उसके दो ऐसे स्तंभ होंगे जिनके बिना उस संरचना की कल्पना अधूरी रहेगी।
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Jul 10, 2026
IndiaIndonesiaRelations
India and Indonesia Enter a New Indo-Pacific Phase

विनय कौड़ा
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

जब इतिहास अपनी पुरानी लिपियों को समकालीन भू-राजनीति की स्याही से पुन: अंकित करता है, तब कूटनीतिक यात्राएं बदलते शक्ति-संतुलन की उद्घोषणा बन जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया यात्रा भी इसी व्यापक परिवर्तन का संकेत है। भारत और इंडोनेशिया का संबंध आज ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां इतिहास, भूगोल और रणनीति एक-दूसरे से जुडकऱ नई संभावनाओं का निर्माण कर रहे हैं।
इंडोनेशिया को यदि केवल दक्षिण-पूर्व एशिया का एक विशाल द्वीपीय राष्ट्र मान लिया जाए तो यह उसकी वास्तविक सामरिक भूमिका का अत्यधिक सरलीकरण होगा। लगभग सत्रह हजार द्वीपों से निर्मित यह राष्ट्र हिंद और प्रशांत महासागरों के संगम पर स्थित वह सेतु है, जिसके निकट से मलक्का जलडमरूमध्य होकर विश्व व्यापार का एक बड़ा भाग प्रवाहित होता है। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं और नौसैनिक आवागमन की धडकऩें इस समुद्री भूगोल से संचालित होती हैं। भारत के अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और इंडोनेशिया के आचेह प्रांत के बीच की अल्प समुद्री दूरी इस तथ्य को और भी स्पष्ट करती है कि इंडोनेशिया, भारत के लिए केवल एक मित्र राष्ट्र नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा का प्रत्यक्ष पड़ोसी है।

आसियान की केंद्रीय भूमिका का प्रमुख समर्थक भारत
जब उपनिवेशवाद के विरुद्ध एशिया की चेतना आकार ग्रहण कर रही थी, तब भारत उन प्रथम देशों में था जिसने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके पक्ष में स्वर उठाया। नेहरू और सुकर्णो ने जिस एशियाई स्वाभिमान का स्वप्न देखा, उसका प्रत्यक्ष रूप 1955 के बांडुंग सम्मेलन में दिखाई दिया। वही विचारधारा आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आत्मा बनी। समय के साथ इस साझेदारी का स्वरूप भावनात्मक इतिहास से आगे बढकऱ कठोर यथार्थवाद में रूपांतरित हुआ है। इंडोनेशिया आज दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तथा आसियान की केंद्रीय भूमिका का प्रमुख समर्थक है। भारत भी ऐसी ही विश्व व्यवस्था का पक्षधर है जहां शक्ति-संतुलन किसी एक ध्रुव की इच्छा से नहीं, बल्कि अनेक स्वतंत्र राष्ट्रों की सामूहिक भागीदारी से निर्मित हो।

इस्लामी आस्था और सांस्कृतिक बहुलता के बीच संतुलन
इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है, किंतु उसकी राष्ट्रीय चेतना संकीर्ण धार्मिक पहचान से संचालित नहीं होती। वहां इस्लाम भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के साथ संवाद करते हुए विकसित हुआ है। आज भी रामायण और महाभारत उसके सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं तथा भारतीय सभ्यता के प्रतीक सार्वजनिक जीवन में सहज स्वीकार्यता रखते हैं। यही उसे पाकिस्तान से अलग करता है। जहां पाकिस्तान का राष्ट्र-निर्माण धार्मिक कट्टरता और अपनी प्राचीन सभ्यतागत विरासत से दूरी के साथ आगे बढ़ा, वहीं इंडोनेशिया ने इस्लामी आस्था और सांस्कृतिक बहुलता के बीच संतुलन बनाए रखा। इसलिए भारत और इंडोनेशिया का संबंध साझा सभ्यतागत स्मृति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का भी संबंध है।

दोनों देश बन रहे समुद्री साझेदार
जकार्ता में संपन्न यह शिखर वार्ता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि हिंद महासागर की सुरक्षा और प्रशांत की स्थिरता अब एक-दूसरे से अविभाज्य रणनीतिक प्रश्न बन चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम रक्षा सहयोग रहा। इंडोनेशिया द्वारा ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली खरीदने का निर्णय भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विश्वास का प्रमाण है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस की प्रभावशीलता ने उसे सामरिक विश्वसनीयता का प्रतीक बना दिया। फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया का इस श्रेणी में सम्मिलित होना दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की रक्षा कूटनीति के विस्तार का संकेत है। इसी प्रकार एस्ट्रा एमके-1 वायु-से-वायु मिसाइल प्रणाली का इंडोनेशियाई वायुसेना में समावेश यह दर्शाता है कि भारत एक सुरक्षा प्रदाता के रूप में भी अपनी भूमिका स्थापित कर रहा है।
समुद्री सहयोग इस संबंध का दूसरा निर्णायक आयाम है। सबांग बंदरगाह का संयुक्त विकास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सुमात्रा के उत्तरी सिरे पर स्थित यह बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित है। भारत के प्रस्तावित ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट परियोजना और सबांग के बीच संभावित सामरिक समन्वय हिंद महासागर में नई समुद्री संरचना का निर्माण कर सकता है। सूचना साझाकरण, तटरक्षक सहयोग, समुद्री क्षेत्र जागरूकता और खोज एवं बचाव अभियानों में बढ़ती सहभागिता दोनों देशों को समुद्री साझेदार भी बना रही है।

भारत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का भी साझेदार
यदि बीसवीं शताब्दी का भू-राजनीतिक संघर्ष तेल के इर्द-गिर्द घूमता था, तो इक्कीसवीं सदी प्रतिस्पर्धा दुर्लभ खनिजों और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रही है। इंडोनेशिया विश्व के सबसे बड़े निकेल भंडारों का स्वामी है। विद्युत वाहनों, बैटरियों और हरित ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए यह संसाधन भविष्य की औद्योगिक शक्ति का आधार है। भारत द्वारा इंडोनेशिया में इस्पात, निकेल और रेयर अर्थ मैग्नेट निर्माण में निवेश का निर्णय चीन-केंद्रित आपूर्ति शृृंखलाओं के विकल्प का निर्माण है। राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल अनुसंधान एवं विकास केंद्र की स्थापना इसी व्यापक रणनीति का अंग है। इस यात्रा का एक कम चर्चित किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष भारत की डिजिटल कूटनीति है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआइ) का इंडोनेशियाई भुगतान प्रणाली से एकीकरण, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स के सहयोग, दूरसंचार, अनुसंधान तथा नवाचार संबंधी समझौते यह स्पष्ट करते हैं कि भारत अब डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का भी साझेदार बन रहा है। सिंगहसारी विशेष आर्थिक क्षेत्र में भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलूरु का विदेशी परिसर स्थापित करने का निर्णय भारत की शैक्षिक कूटनीति को भी नई दिशा देता है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली के विकास में सहयोग लोकतांत्रिक संस्थानों के बीच विश्वास की नई परत जोड़ता है।

समझौते उनके क्रियान्वयन से जीवित रहते हैं
सांस्कृतिक आयाम इस पूरे संबंध को सभ्यतागत ऊष्मा प्रदान करते हैं। योग्यकर्ता के प्रम्बानन मंदिर परिसर के संरक्षण में भारत की भागीदारी तथा रवींद्रनाथ ठाकुर और हजर देवंतरा की स्मृति में सांस्कृतिक एवं शैक्षिक वर्ष मनाने का निर्णय इस तथ्य का स्मरण कराता है कि समुद्र व्यापारिक मार्गों के अलावा विचारों और विश्वासों के भी सेतु होते हैं। फिर भी, इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि समझौते अपने हस्ताक्षरों से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन से जीवित रहते हैं। सबांग परियोजना वर्षों से विचाराधीन रही है। महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में चीन की गहरी औद्योगिक उपस्थिति भारत के लिए चुनौती बनी रहेगी। रक्षा समझौतों को भी अंतिम खरीद अनुबंधों और उत्पादन सहयोग तक पहुंचाना होगा। किंतु एक तथ्य निर्विवाद है। भारत और इंडोनेशिया का संबंध अतीत की सांस्कृतिक स्मृतियों से निकलकर अर्थव्यवस्था की आवश्यकता और शक्ति-संतुलन की राजनीति से संचालित एक परिपक्व सामरिक साझेदारी में परिवर्तित हो चुका है। हिंद महासागर और प्रशांत के मध्य यदि भविष्य का शक्ति-संतुलन निर्मित होना है, तो दिल्ली और जकार्ता उसके दो ऐसे स्तंभ होंगे जिनके बिना उस संरचना की कल्पना अधूरी रहेगी।

Updated on:
10 Jul 2026 07:30 pm
Published on:
10 Jul 2026 07:27 pm