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आइआइटी के विद्यार्थियों की इसरो में भी भागीदारी बढ़े

यदि भारत वास्तव में एक वैज्ञानिक महाशक्ति बनना चाहता है, तो केवल अंतरिक्ष मिशनों की सफलता पर्याप्त नहीं होगी। देश को अपने वैज्ञानिक मानव संसाधन तंत्र में व्यापक सुधार करने होंगे। इसरो के वैज्ञानिकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी वेतन, आधुनिक अनुसंधान सुविधाएं, निजी क्षेत्र के साथ सहयोग और प्रतिभाशाली युवाओं के लिए आकर्षक कॅरियर मार्ग विकसित करने होंगे।

4 min read
Jun 01, 2026
IIT- ISRo

डॉ. डी.पी. शर्मा, यूनाइटेड नेशंस से जुड़े डिजिटल डिप्लोमेट

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आज विश्व में सम्मान और गौरव का विषय बन चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत कम बजट में चंद्रयान, मंगलयान तथा सौर मिशनों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भारत वैज्ञानिक क्षमता के मामले में किसी भी विकसित राष्ट्र से कम नहीं है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न भी छिपा हुआ है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों, अर्थात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) के छात्रों और शोधकर्ताओं का योगदान इसरो में अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देता है।
विभिन्न रिपोट्र्स और आरटीआइ से प्राप्त जानकारियों के अनुसार इसरो में आइआइटी पृष्ठभूमि से आने वाले इंजीनियरों की संख्या बहुत सीमित है। यह स्थिति केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक, शैक्षिक और नीतिगत संरचना की एक महत्त्वपूर्ण चुनौती को भी उजागर करती है। जिस देश के आइआइटी स्नातक विश्व की अग्रणी तकनीकी कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों और सिलिकॉन वैली की कंपनियों में नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा रहे हों, उसी देश की सर्वोच्च अंतरिक्ष संस्था उन्हें बड़े पैमाने पर आकर्षित क्यों नहीं कर पा रही, यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है।

वेतन, अवसर और कॅरियर संरचना का असंतुलन
इस स्थिति का सबसे प्रमुख कारण वेतन, अवसर और कॅरियर संरचना का असंतुलन है। आज आइआइटी से निकलने वाला एक प्रतिभाशाली छात्र निजी क्षेत्र में करोड़ों रुपए के पैकेज, वैश्विक अवसर, अत्याधुनिक तकनीक तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम की ओर आकर्षित होता है। इसके विपरीत सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों में अपेक्षाकृत सीमित वेतन, धीमी पदोन्नति प्रक्रिया और प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।
हालांकि कारण केवल आर्थिक नहीं हैं। यह भी विचारणीय है कि राष्ट्रीय दायित्व और राष्ट्र निर्माण की भावना को तकनीकी शिक्षा के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए। सरकार आइआइटी छात्रों की शिक्षा पर बड़ी मात्रा में सार्वजनिक संसाधन खर्च करती है, इसलिए यह बहस समय-समय पर उठती रही है कि क्या इन संस्थानों के स्नातकों को किसी न किसी रूप में देश की वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति में प्रत्यक्ष योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

प्रतिभा केवल आइआइटी तक सीमित नहीं
यह भी समझना आवश्यक है कि प्रतिभा केवल आइआइटी तक सीमित नहीं है। देश के अनेक अन्य इंजीनियरिंग संस्थानों से निकलने वाले छात्र भी उत्कृष्ट वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ बने हैं। स्वयं इसरो की अधिकांश ऐतिहासिक सफलताएं ऐसे ही वैज्ञानिकों के समर्पण और प्रतिभा का परिणाम हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल आइआइटी के छात्र ही राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रगति के वाहक हैं। फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि आइआइटी और इसरो के बीच एक मजबूत वैज्ञानिक पाइपलाइन क्यों विकसित नहीं हो पाई। इसरो जैसे संस्थानों में कार्य का गौरव अवश्य है, लेकिन आधुनिक युवा केवल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि शोध की स्वतंत्रता, वित्तीय प्रगति, नवाचार के अवसर और पेशेवर लचीलापन भी चाहता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में आइआइटी स्नातक बहुराष्ट्रीय कंपनियों, वित्तीय संस्थानों, स्टार्टअप्स अथवा विदेशी विश्वविद्यालयों की ओर रुख करते हैं।

सशक्त प्रतिभा-संपर्क तंत्र विकसित नहीं
पूर्व इसरो प्रमुख भी कई अवसरों पर स्वीकार कर चुके हैं कि उच्च प्रतिभाओं को आकर्षित करने में वेतन संरचना एक बड़ी चुनौती है। इसके अतिरिक्त भारत की शिक्षा नीति और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच अपेक्षित स्तर का समन्वय भी दिखाई नहीं देता। आइआइटी को राष्ट्रीय विकास, अनुसंधान और नवाचार को गति देने के उद्देश्य से विकसित किया गया था, लेकिन समय के साथ उनकी संरचना काफी हद तक रोजगार-केंद्रित होती चली गई। आज अधिकांश छात्र वैज्ञानिक बनने के बजाय कॉर्पोरेट कॅरियर की तैयारी करते हैं। शिक्षा का उद्देश्य कई बार नवाचार से अधिक रोजगार प्राप्त करने तक सीमित हो जाता है। दूसरी ओर, इसरो अभी भी मुख्यत: पारंपरिक सरकारी अनुसंधान मॉडल पर आधारित है, जहां प्रशासनिक नियंत्रण अपेक्षाकृत अधिक और संस्थागत लचीलापन सीमित है। परिणामस्वरूप आइआइटी और इसरो के बीच एक सशक्त प्रतिभा-संपर्क तंत्र विकसित नहीं हो सका।

प्रतिभा केवल आइआइटी परिसरों तक सीमित नहीं
हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल आइआइटियन ही देश की वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसरो की ऐतिहासिक सफलताओं में देश के अनेक सामान्य इंजीनियरिंग कॉलेजों और क्षेत्रीय संस्थानों से आए वैज्ञानिकों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की प्रतिभा केवल आइआइटी परिसरों तक सीमित नहीं है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थानों और राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थाओं के बीच मजबूत संबंध विकसित नहीं हो पाते। यदि श्रेष्ठ तकनीकी प्रतिभाएं राष्ट्रीय शोध संस्थानों से लगातार दूर जा रही हैं, तो यह भविष्य के नवाचार तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत सरकार इस स्थिति को बदलने के लिए अधिक प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाती। इसका पहला कारण नौकरशाही ढांचा है। इसरो पूरी तरह सरकारी नियमों और प्रशासनिक प्रकियाओं के भीतर कार्य करता है, जहां वेतन, नियुक्ति, पदोन्नति और शोध स्वतंत्रता पर अनेक सीमाएं होती हैं। सरकार निजी क्षेत्र जैसी लचीली व्यवस्था आसानी से लागू नहीं कर पाती।

शोध और नवाचार को अपेक्षाकृत कम महत्त्व
दूसरा कारण यह है कि इसरो की "कम लागत में बड़ी सफलता" वाली छवि को राष्ट्रीय स्तर पर अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। यह निश्चित रूप से गर्व का विषय है, लेकिन इसके साथ वैज्ञानिक मानव संसाधनों में अधिक निवेश की आवश्यकता कई बार पीछे छूट जाती है। देश रॉकेट और अंतरिक्ष मिशनों की सफलता का उत्सव तो मनाता है, लेकिन उन वैज्ञानिकों के वेतन, शोध सुविधाओं और करियर विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं देता जो इन उपलब्धियों के वास्तविक निर्माता हैं। तीसरा बड़ा कारण प्रतिभा पलायन को लेकर दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति का अभाव है। दशकों से भारत के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी छात्र विदेशों और निजी क्षेत्र की ओर जा रहे हैं, लेकिन अभी तक ऐसा व्यापक ढांचा विकसित नहीं किया जा सका है जो शीर्ष प्रतिभाओं को राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों की ओर आकर्षित कर सके। चौथा कारण भारत में शोध संस्कृति की सामाजिक कमजोरी भी है। यहां अब भी उच्च वेतन को सफलता का प्रमुख मानक माना जाता है, जबकि दीर्घकालिक वैज्ञानिक अनुसंधान को अपेक्षित सामाजिक सम्मान और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। माता-पिता, शिक्षा संस्थान और समाज कॉर्पोरेट पैकेज का उत्सव मनाते हैं, जबकि शोध और नवाचार को अपेक्षाकृत कम महत्त्व दिया जाता है।


वैज्ञानिक मानव संसाधन तंत्र में व्यापक सुधार करने की जरूरत
यदि भारत वास्तव में एक वैज्ञानिक महाशक्ति बनना चाहता है, तो केवल अंतरिक्ष मिशनों की सफलता पर्याप्त नहीं होगी। देश को अपने वैज्ञानिक मानव संसाधन तंत्र में व्यापक सुधार करने होंगे। इसरो के वैज्ञानिकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी वेतन, आधुनिक अनुसंधान सुविधाएं, निजी क्षेत्र के साथ सहयोग और प्रतिभाशाली युवाओं के लिए आकर्षक कॅरियर मार्ग विकसित करने होंगे। भारत के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी केवल ऐसी दूरदर्शी नीति की है, जो इन प्रतिभाओं को राष्ट्रीय अनुसंधान और नवाचार से प्रभावी रूप से जोड़ सके। अन्यथा स्थिति यही बनी रहेगी कि भारत विश्वस्तरीय इंजीनियर तैयार करेगा, लेकिन उनका सर्वोत्तम योगदान विदेशी कंपनियों और बाहरी अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त होगा, जबकि देश की अपनी वैज्ञानिक संस्थाएं सीमित संसाधनों और प्रतिभा पलायन के बीच संघर्ष करती रहेंगी।

Published on:
01 Jun 2026 07:24 pm
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