
- कोनसम हिमालय सिंह, पूर्व सैन्य अधिकारी
हाल ही में मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों से अफस्पा को हटा दिया गया है, जिसका पूर्वोत्तर में आम तौर पर स्वागत हुआ है। इन इलाकों की जमीनी सचाई यह है कि पिछले कुछ वर्षों में सशस्त्र गुटों की गतिविधि में भारी कमी आई है। गैरकानूनी रूप से टैक्स वसूलने और नए लोगों की भर्ती करने का काम लगभग थम चुका है। हिंसक घटनाएं भी कभी-कभार ही होती हैं। सशस्त्र गतिविधियां फिर से सिर उठा सकती हैं, यह आशंका बहुत ही सीमित है। आइएसआइ तथा अन्य बाहरी आतंकी संगठनों की संलिप्तता में भी कमी दर्ज की गई है।
प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 22 मई 1958 को सशस्त्र बल (असम तथा मणिपुर) विशेष शक्तियां अध्यादेश, 1958 जारी किया था। इसकी पृष्ठभूमि थी तत्कालीन असम के नगा हिल्स जिले में नगा विद्रोहियों द्वारा भारत से अलग होने की मांग। 11 सितंबर 1958 को संसद से पारित हो कर इसने अधिनियम का रूप ले लिया। बाद में इसका अधिकार क्षेत्र पूर्वोत्तर के सातों राज्यों तक बढ़ा दिया गया। अब यह अधिनियम सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, 1958 कहलाता है, जिससे इसका संक्षिप्त नाम अफस्पा बना है।
जिन हिस्सों में अभी भी अफस्पा लागू है, वे हैं नगालैंड, असम, मणिपुर (इम्फाल के सात विधान सभा क्षेत्रों को छोड़ कर) और अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाके। इन्हें अफस्पा की धारा 03 के तहत ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया गया था। इनमें नगा भूमिगत गुट जैसे नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (आइजक-मुइवाह), एनएससीएन (खपलांग), यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, यूनाइटेड नेशंस फ्रंट ऑफ मणिपुर, पीपल्स लिबरेशन आर्मी और बहुत-से अन्य कबीला-आधारित समूह अभी भी पैसा वसूली, स्थानीय लोगों की भर्ती, अंतर-गुटीय प्रतिद्वंद्विता, स्थानीय लोगों पर गैरकानूनी तरीके से टैक्स लगाना आदि आतंकी-आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं। ये सभी भारत से स्वतंत्रता या अपने राज्य के भीतर स्वायत्तता की मांग करते हैं। कई समूह समानांतर सरकारें चला रहे हैं। इसलिए यहां अफस्पा की जरूरत बनी हुई है, सरकार की यह मान्यता है।
ऐसी रिपोर्ट है कि आइएसआइ तथा अन्य भारत-विरोधी संगठन इस अंचल में व्यवस्थित तरीके से उपद्रव पैदा कर रहे हैं। नगालैंड, मणिपुर और असम के विभिन्न मिलिटंट समूहों का म्यांमार के समान समूहों के साथ नजदीकी संबंध है। इन मिलिटंट समूहों के पास इतनी शक्ति और विशेषज्ञता है कि वे जब चाहें किसी भी अंचल में हड़ताल या बंद करा सकते हैं। मणिपुर में नृजातीय तनाव जारी है। सरकार से जिनकी बातचीत चल रही है, उन समूहों द्वारा संघर्ष विराम की शर्तों का उल्लंघन आम बात है।
मणिपुर के बहुत-से लोग अफस्पा को हटाने की मांग करते रहे हैं। इरोम शर्मिला इन्हीं में एक थीं। सरकारी अधिकारियों द्वारा कानून के दुरुपयोग की खबरें भी आती रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में निराधार एनकाउंटर की कई घटनाओं पर सख्त टिप्पणी की है। वर्तमान परिस्थितियों के समग्र आकलन से यही निष्कर्ष निकलता है कि पूर्वोत्तर के बाकी क्षेत्रों से भी अफस्पा को वापस ले लिया जाना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में अफस्पा जैसे असाधारण कानूनों की कोई जरूरत नहीं पड़ती। फिलहाल, पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों में सैकड़ों उच्चाधिकारी अपनी हिफाजत के लिए सशस्त्र बलों का उपयोग कर रहे हैं। सुरक्षा कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी दफ्तरों, संयंत्रों और प्रतिष्ठानों की पहरेदारी कर रहा है।
मिलिटंट समूहों को उनके द्वारा लादे गए टैक्सों की अदायगी कई इलाकों में जीवनशैली का अंग बन चुकी है। यह सही है कि लोगों को अपने भविष्य के बारे में निर्णय का अधिकार होना चाहिए, पर वातावरण को सामान्य बनाए बिना यह कैसे संभव है? इस मामले में सशस्त्र सेनाओं की भी निर्णायक भूमिका है। वे राज्य की शक्तिशाली भुजा हैं। उनका काम भारत के संविधान के अनुसार काम करना और सरकार की मदद करना है। सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम जैसे कानून इसीलिए हैं ताकि व्यवस्था को विधि-सम्मत तरीके से चलाया जा सके। वे भारत की एकता को खंडित होने से रोकने का आखिरी औजार हैं।
सशस्त्र बलों के लिए भी ध्यान रखना जरूरी है कि कानून के क्रियान्वयन पर दाग न लगे। यदि वे दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। बेशक कानून को अपना काम करना चाहिए, इसमें कमजोरी दिखाना आत्मघाती होगा। साथ ही, सशस्त्र बलों और सरकार के अन्य अंगों का यह नैतिक कर्तव्य भी है कि वे एक तरफ तो कानून का पालन करें और करवाएं और दूसरी तरफ स्थानीय लोगों के अधिकारों की अवहेलना न हो, वे सुरक्षित अनुभव करें तथा जन कल्याण की योजनाओं से उन्हें सचमुच लाभ पहुंचे। समुचित, प्रभावशाली और जनोन्मुख प्रशासन तथा विवाद प्रबंधन की दिशा में उपयुक्त कदम से ऐसा वातावरण जल्द ही बन सकता है, जब पूर्वोत्तर के लोगों की आशा-आकांक्षाओं को आकार मिले और इस पूरे अंचल में अफस्पा की जरूरत ही न रह जाए।