
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने मंगलवार को भारत के लिए बेहद सकारात्मक खबर दी और इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था का दर्जा दिया। ताजा पूर्वानुमान में आइएमएफ ने भारत की विकास दर मजबूत यानी 7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो यूएस व चीन सहित उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में देखी जा रही 1.8 प्रतिशत की सुस्त औसत वृद्धि के बिल्कुल विपरीत है। हालांकि विकसित देशों को पीछे छोड़ते हुए भारत के आर्थिक पथ की यह पुष्टि एक स्वागत योग्य खबर है, लेकिन यह उन आंतरिक और बाहरी चुनौतियों को भी उजागर करती है, जिनसे इस गति को बनाए रखने के लिए नई दिल्ली को पार पाना होगा।
बाहरी वातावरण को शायद ही कभी किसी एक राष्ट्र की इच्छा के अनुसार पूरी तरह से झुकाया जा सकता है, अंतरराष्ट्रीय संबंध कठोर भू-राजनीतिक लक्ष्मण रेखाओं से बंधे होते हैं। भारत ने लगातार इन घर्षण बिंदुओं को संवाद और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने की कोशिश की है- जो विवाद समाधान के अंतिम साधन हैं। फिर भी, इसकी संरचनात्मक सीमाएं हैं कि कोई भी राष्ट्र अपने एजेंडे को कितनी दूर तक आगे बढ़ा सकता है। यहां तक कि यूएस, जो दशकों से एक निर्विवाद महाशक्ति रहा है, अब खुद को एक खंडित होती वैश्विक व्यवस्था के कारण सीमित पा रहा है। आइएमएफ रिपोर्ट भारत के असाधारण आर्थिक लचीलेपन पर रोशनी डालती है। वैश्विक युद्ध के गंभीर झटकों के बावजूद, भारत की विकास गाथा बेजोड़ बनी हुई है, जिससे यह विकसित दुनिया के लिए ईष्र्या का विषय बन गई है। पिछले दिनों जारी 'तनाव के साये में लचीलापन, तत्काल विकल्प' शीर्षक वाली नवीनतम विश्व आर्थिक आउटलुक रिपोर्ट में, आइएमएफ ने भारत के 2026 के विकास अनुमान को बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया, जो जुलाई में अनुमानित 6.4 प्रतिशत से अधिक है।
आइएमएफ ने उम्मीद से अधिक मजबूत गति, लचीली घरेलू मांग व मजबूत सेवा गतिविधियों का हवाला दिया, जिन्होंने सामूहिक रूप से उच्च तेल कीमतों के दबाव को कम कर दिया है। समष्टि अर्थशास्त्र के संदर्भ में यह अपग्रेड दो गहरे संदेश देता है। पहला- झटके कुशलता से सोखे जाते हैं: भारत का आर्थिक पथ न केवल वैश्विक उतार-चढ़ाव का सामना करता है, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय विपरीत परिस्थितियों से आगे निकलने की विशिष्ट क्षमता भी बनी हुई है। दूसरा- राजनीतिक स्थिरता लाभांश देती है: यह डेटा देश की राजनीतिक स्थिरता का ठोस प्रमाण है।ये आंकड़े किसी काल्पनिक आशावाद के बजाय वास्तविक दुनिया की अचूक गति को दर्शाते हैं। इसके साथ ही, यह डेटा उन घरेलू निराशावादियों के आख्यान को चुनौती देता है, जो नियमित रूप से तर्क देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था गिरावट की ओर है। आलोचक अक्सर गिरावट की एक झूठी कहानी गढऩे के लिए अलग-अलग आंकड़ों को हथियार बनाते हैं। दिल्ली और अन्य जगहों पर होने वाले स्थानीय सड़क विरोध प्रदर्शनों के पीछे के असली इरादों को समझने की स्पष्ट आवश्यकता है, जो अक्सर देश की छवि को खराब करने और विदेशी पूंजी को डराने के समय के अनुसार तय किए जाते हैं।
हालांकि, वैश्विक संस्थागत निवेशकों के परिष्कृत अनुसंधान और विकास विंग इन बाधाओं को आसानी से समझ लेते हैं। निवेशक संरचनात्मक अवसरों व लाभप्रदता को प्राथमिकता देते हैं। वर्तमान में उन्हें भारत जैसा स्थिर, बड़ा और अनुकूल कोई दूसरा बाजार नहीं दिखता। आइएमएफ ने उन संरचनात्मक जोखिमों का विवरण दिया है, जिनका सामना भारत को बढ़ते वैश्विक तनाव के कारण करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि मध्य पूर्व में लंबे समय तक गतिरोध या तनाव में और अधिक वृद्धि होने से ऊर्जा और खाद्य कीमतें ऊंची और अस्थिर रह सकती हैं, मुद्रास्फीति का दबाव फिर से बढ़ सकता है। ये चिंताएं मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण हैं। जैसे-जैसे अधिक अंतरराष्ट्रीय ताकतें इसमें हस्तक्षेप कर रही हैं, बड़े पैमाने पर बढ़ते तनाव का जोखिम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं समुद्री रसद, तेल की कीमतों और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। भारत इन आर्थिक झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकता। भारत को घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को तेजी से बढ़ाना होगा। 'मेक इन इंडिया' के दृष्टिकोण को एक प्रमुख वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलना अब केवल एक नीतिगत लक्ष्य नहीं रह गया है- यह एक व्यापक आर्थिक आवश्यकता है। इसे हासिल करने के लिए देश को अपने आंतरिक संदेहों को छोडऩा होगा और उद्योग-अनुकूल परिवेश बनाए रखना होगा। भारत के पास बेजोड़ बुनियादी फायदे हैं- यह अत्यधिक अनुकूल युवा जनसांख्यिकी के साथ दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यदि इस जनसांख्यिकीय लाभांश को उच्च मूल्य वाले विनिर्माण और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लगा दिया जाता है, तो भारत न केवल वर्तमान वैश्विक तनाव से उबर जाएगा बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को भी फिर से परिभाषित करेगा।
अरुण जोशी,(दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार)