
आईना: आइए, हिसाब दीजिए (फोटो-एआई)
-विजय चौधरी
शहरों की जीत से उत्साहित सियासत अब गांवों की पगडंडियों पर उतर चुकी है। पंचायत चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के बड़े चेहरे भी मैदान में हैं। हौसले बुलंद हैं, दावे बड़े हैं और गांवों में अपनी ताकत दिखाने की तैयारी भी। मगर हुजूर, गांव की चौपाल पर सिर्फ स्वागत नहीं होगा, सवाल भी होंगे। सड़क कब बनेगी, पानी कब आएगा, ढाणी तक विकास कब पहुंचेगा? शहरों में जीत का जश्न मनाना और गांवों में भरोसा जीतना दो अलग बातें हैं। इसलिए गांव की ओर कदम बढ़ाइए जरूर, लेकिन इस बार सिर्फ वोट मांगने नहीं, पुराने वादों का हिसाब देने भी आइए।
चुनाव आते ही गांवों की फिजा बदलने लगती है। गलियों में गाड़ियों की आवाजाही बढ़ती है, चौपालों पर बैठकें होने लगती हैं और चाय की दुकानों पर सियासी चर्चाएं गरमाने लगती हैं। जो नेता महीनों नजर नहीं आए, वे अब सुख-दुख में शरीक होते दिखाई देंगे। किसी की ढाणी में बैठकर हालचाल पूछेंगे, किसी के घर चाय पीएंगे, तो किसी रूठे कार्यकर्ता को मनाने निकल पड़ेंगे। गांव वाले भी खातिरदारी में कसर नहीं छोड़ेंगे। आखिर चुनावी मेहमान आएं तो चाय के साथ सवाल भी परोसे जा सकते हैं!
शहरों के नतीजों ने दोनों दलों का उत्साह बढ़ाया है। अब जीत का श्रेय लेने और अपनी ताकत दिखाने की होड़ गांवों तक पहुंचेगी। मगर पंचायत चुनाव का गणित शहरों के नतीजों से नहीं समझा जा सकता। यहां पार्टी के झंडे के साथ जातीय समीकरण, रिश्तेदारी, स्थानीय नाराजगी और उम्मीदवार की साख भी मायने रखती है। कई बार बरसों पुराना रिश्ता पार्टी के निशान पर भारी पड़ता है, तो कहीं गांव का कोई मुद्दा बड़े नेताओं की गणना बिगाड़ देता है।
गांवों के सवाल सीधे हैं। कहीं सड़क अधूरी है, कहीं टंकी बनी है, लेकिन नलों में पानी नहीं आता। किसी ढाणी को पक्की सड़क का इंतजार है, तो कहीं स्कूल में शिक्षक और अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। युवाओं को रोजगार चाहिए और किसानों को सिंचाई के पानी से लेकर उपज के उचित दाम तक की चिंता है। ऐसे में चौपाल पर पहुंचे नेता से पूछा जा सकता है कि पिछली बार किए वादों का क्या हुआ? मतदाता की याददाश्त चुनावी भाषणों से छोटी नहीं होती।
बड़े नेताओं का गांवों में पहुंचना ग्रामीण समस्याओं को प्रदेश की राजनीति में जगह दिला सकता है, लेकिन सवाल यह है कि उनकी दिलचस्पी गांवों के मुद्दों में भी है या चुनावी नतीजों तक सीमित है। चुनाव के वक्त चौपाल पर बैठना आसान है, असली कसौटी तब है, जब कोई ग्रामीण अपने काम के लिए प्रतिनिधि को ढूंढ रहा हो। दोनों दलों के सामने अब अपनी ताकत दिखाने के साथ जवाबदेही का सवाल भी है। क्या नेता अधूरे कामों और सरकारी योजनाओं की प्रगति का हिसाब रखेंगे? क्या उम्मीदवारों की पहचान उनके काम से होगी या बड़े चेहरों के समर्थन और जातीय समीकरणों से?
गांव का मतदाता मेहमाननवाजी करना जानता है, मगर अपने गांव की जरूरतें भी पहचानता है। वह चाय पिलाएगा, सम्मान देगा, लेकिन वोट का फैसला अपने हिसाब से करेगा। इसलिए चौपाल पर जाइए, हालचाल पूछिए और अपने काम गिनाइए। बस उन सवालों से बचकर मत निकल जाइए, जिनके जवाब गांव बरसों से तलाश रहा है।
-veejay.chaudhary@in.patrika.com
Updated on:
16 Oct 2026 01:31 pm
Published on:
16 Oct 2026 01:03 pm
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