आज का यक्ष प्रश्न यह है कि क्या ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया को एक उम्र विशेष तक प्रतिबंधित किया जाना एक समाधान हो सकता है? हाल में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में सोलह वर्ष से कम आयु वर्ग के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग प्रतिबंधित किया गया है। ऑस्ट्रेलिया में भी सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित है। स्पेन, ब्रिटेन, यूनान आदि देश इस दिशा में कानून बनाने की तैयारी में हैं।
डॉ. गौरव बिस्सा - जीवन प्रबंधन प्रशिक्षक,
अति भौतिकवादी युग में परिवारों में परस्पर सम्बन्ध दरकते से नजर आ रहे हैं। अहंकार, परिवारों में सत्ता के केंद्र का बदलाव, सोशल मीडिया का अनुचित दखल, अत्यंत व्यस्त जीवन शैली, जबरदस्त उपभोक्तावाद और पैसे कमाने की अंधी दौड़ के चलते परिवार विघटित हो रहे हैं। वर्तमान समय में परिवारों में टूटन के बड़े कारणों में से एक है सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताना और परस्पर मेलजोल व वार्तालाप की कमी। आज का यक्ष प्रश्न यह है कि क्या ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया को एक उम्र विशेष तक प्रतिबंधित किया जाना एक समाधान हो सकता है? हाल में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में सोलह वर्ष से कम आयु वर्ग के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग प्रतिबंधित किया गया है।
ऑस्ट्रेलिया में भी सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित है। स्पेन, ब्रिटेन, यूनान आदि देश इस दिशा में कानून बनाने की तैयारी में हैं। विश्व के एआइ इम्पैक्ट समिट में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया के प्रति कठोरता के संकेत दिए हैं। ऐसा लगता है कि ये प्रतिबंध कुछ हद तक जरूरी भी है। सोशल मीडिया पर अत्यधिक जुड़ाव के कारण व्यक्ति हर काम में दूसरों की स्वीकारोक्ति चाहने लगा है। दूसरे व्यक्ति समर्थन करें, क्या यह आवश्यक है? सोशल मीडिया पर हर बात लिखकर व्यक्ति अपनी सराहना और दूसरों से स्वीकारोक्ति के भ्रम को ही जीवन मान बैठा है।
क्या व्यक्ति अपनी खुद की नजर में इतना अशक्त और निर्बल है कि जब तक दूसरे लोग उसके कृत्यों को अच्छा नहीं कह दें या स्वीकार नहीं कर लें, तब तक उसे यह विश्वास ही नहीं हो रहा कि उसने कुछ अच्छा किया है। युवा मन रील्स को रीयल मानकर इसी में उलझ- सा गया है। युवा व्यक्ति के फोटोज या एक्टिविटीज पर सोशल मीडिया पर आने वाले कमेंट्स, उसे उसके प्रारंभिक लक्ष्य से दूर कर रहे हैं, जो उम्र पढ़कर, अपनी आजीविका का रास्ता चुनकर परिवार का नाम गौरवान्वित करने की है, उस उम्र में ही वह बच्चा पढ़ाई से अधिक महत्व सोशल मीडिया के कमेंट्स को दे रहा है।
इससे पढ़ाई खराब हो रही है। बच्चे के स्क्रीन टाइम में बेरहमी से कटौती की जानी जरूरी है। ऐसा न किया तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य भी बिगडऩा तय है। एक मोबाइल हैंडसेट निर्माता कंपनी की ओर से किए गए शोध के अनुसार 84 फीसदी लोग सुबह उठते ही 15 मिनट मोबाइल देखते हैं। शोध यह स्पष्ट करता है कि भारतीय युवा प्रतिदिन लगभग साढ़े सात घंटे अपने मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है। एक घंटे में पांच बार मोबाइल लॉक खोला जा रहा है, यह गंभीर विषय है।
समाज इस समय ऐसे वातावरण से गुजर रहा है जहां स्वाध्याय करने की प्रवृत्ति अर्थात रीडिंग हैबिट तो लुप्त-सी हो चुकी है। कुछ पढ़कर आनंदित होना अब पुरानी बात है। अब मनोरंजन के नाम पर टीवी सीरियल्स हैं, जिसमें अधिकांश सीरियल्स अपराध या निम्न स्तरीय षड्यंत्रों के अलावा कुछ और नहीं परोसते। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। अध्ययनशील व्यक्ति खुद को सफल और आनंदित महसूस करता है। एक क्लिक पर दुनिया होने की अवधारणा मानने वाले युवाओं की स्मृति और विश्लेषण क्षमता कम हो रही है। खुद के जीवन को नई दिशा देने के लिए कागज की किताब का अध्ययन आवश्यक है।
शोध यही कहता है कि बिना पढ़े, व्यक्ति बुलंदियों को छू नहीं सकता। माता पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान के आगे पुस्तकें, अखबार और पत्र पत्रिकाएं पढ़ें। यदि उन्हें पढऩे का शौक नहीं है तो पढऩे का अभिनय ही करें ताकि बच्चे को ये संदेश मिले कि पढऩा भी एक अच्छी आदत है। माता पिता की ओर से किया गया यह काम, युवाओं को सोशल मीडिया के मायाजाल से निकालने में सहायक सिद्ध होगा। सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण झूठे दिखावे की प्रवृत्ति में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। परिवार में कलह है लेकिन दिखावे के लिए परिवार का हंसता हुआ फोटो सोशल मीडिया स्टेटस अपडेट करने के लिए खिंचवाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर अधिकाधिक लाइक्स और शेयर को शाश्वत सत्य माना जा रहा है। व्यक्ति आज में न जीकर भविष्य के लिए यादें संजोना चाहता है। शोध के अनुसार, 78 फीसदी युवाओं ने झूठे दिखावे या आभासी दुनिया को ही सत्य मान लिया है। यह चिंताजनक है। सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट के प्रति दीवानगी, वीडियो बनाने की आतुरता व आभासी दुनिया में जीने की ललक व्यक्ति को अपनों से दूर कर रही है। सोशल मीडिया के ओवर कम्युनिकेशन यानी हद से ज्यादा बातचीत का नकारात्मक असर युवाओं के दाम्पत्य जीवन पर पड़ा है। सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है, जिसका इस्तेमाल संयत रूप से न किया गया तो यह परिवार और समाज में विघटन का कारण बन जाएगा। इसका पूर्ण प्रतिबंध तो तर्कसंगत नहीं, लेकिन उम्र विशेष के लिए कुछ प्रतिबंध लगना और एक समय विशेष में इसका बंद रहना, तर्कसंगत है।