ओपिनियन

हर जिले को ‘विकास का इंजन’ बनाना जरूरी

कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए एक समर्पित विभाग होना चाहिए। इसी तरह बड़े, मध्यम और लघु उद्योगों सहित वाणिज्य के विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यवसाय एवं उद्योग विभाग हो।
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Sep 02, 2026
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इसी साल नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिला स्तर पर जीडीपी का अनुमान तैयार करने का आह्वान किया था। इसका उद्देश्य आर्थिक उपलब्धियां मापने की मौजूदा ऊपर से नीचे की ओर आने वाली व्यवस्था को बदलकर विकेंद्रीकृत और जमीनी स्तर के आकलन की ओर ले जाना है। प्रत्येक जिले के आर्थिक प्रदर्शन अलग-अलग मापने का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय असमानताओं को उजागर करना और आर्थिक समृद्धि को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। लेकिन असली सवाल यह है कि इसे कौन और कैसे अंजाम दे?पारंपरिक रूप से जिला प्रशासन का ध्यान कानून-व्यवस्था, राजस्व संग्रह, कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, आपदा प्रबंधन और सरकारी विभागों के समन्वय पर रहा है और लोगों की आर्थिक आकांक्षाएं कभी जिला प्रशासन के कामकाज के केंद्र में नहीं रही है। एडम स्मिथ ने कहा था, 'गरीबी की वास्तविक समस्या वितरण की नहीं, बल्कि उत्पादन की है।' हमारा मौजूदा प्रशासनिक ढांचा इस असली समस्या से कोसों दूर है। यही कारण है कि कई जिलों से आजीविका की तलाश में पलायन जारी है और इसके लिए जिला प्रशासन को कभी जवाबदेह नहीं ठहराया जाता।

अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन का ध्यान रणनीतिक योजना, संसाधन जुटाने और उनके प्रभावी आवंटन के माध्यम से आर्थिक विकास और समृद्धि पर केंद्रित हो। उत्पादकता बढ़ाना, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करना, कौशल निर्माण, रोजगार सृजन तथा लोगों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना इसके प्रमुख दायित्व होने चाहिए और इसके लिए जिला-स्तरीय प्रशासनिक संगठन का पुनर्गठन आवश्यक है। यह कायाकल्प नामकरण से ही शुरू होना चाहिए। जिला प्रशासन जिला आर्थिक प्रबंधन कहलाए और जिला कलेक्टरों की भूमिका आर्थिक प्रबंधक की होनी चाहिए। पदनाम से ही उस पद और कार्यालय की वास्तविक भूमिका स्पष्ट हो जाए। निर्णय प्रक्रिया में विविधता, लोकतंत्र और स्थानीय आकांक्षाओं को शामिल करने तथा इसे नौकरशाही का गढ़ बनने से रोकने के लिए जिला प्रमुख को विभिन्न विभाग प्रमुखों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र के नागरिकों की एक परिषद द्वारा सहायता मिलनी चाहिए, ताकि यह व्यवस्था विकास की एक गतिशील शक्ति के रूप में कार्य कर सके।

इस नए संगठनात्मक ढांचे में अनेक विभाग होने चाहिए। इनमें पहला योजना, संसाधन संग्रह और आवंटन से संबंधित हो। डेटा और तकनीक से लैस यह विभाग जिला प्रशासन के भीतर एक थिंक टैंक की तरह होगा, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था की योजना विकसित करने के लिए जिले के राजनीतिक प्रतिनिधियों, अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के सुझावों को शामिल करेगा। इस परिषद को सभी विभागों के वास्तविक प्रदर्शन पर व्यापक सामाजिक प्रतिक्रिया को शामिल करते हुए अपनी त्रैमासिक रिपोर्ट की समीक्षा करने और बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने का जिम्मा खुद उठाना चाहिए। कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए एक समर्पित विभाग होना चाहिए। इसी तरह बड़े, मध्यम और लघु उद्योगों सहित वाणिज्य के विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यवसाय एवं उद्योग विभाग हो। शिक्षा और मानव संसाधन भी जिला आर्थिक प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। इसका दायित्व शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास को मजबूत करना हो। इसी तरह औषधालयों और अस्पतालों की आधारभूत संरचना तथा कार्यक्षमता पर ध्यान देने वाला एक विभाग होना चाहिए।

इसके अलावा, बुनियादी ढांचा विभाग होना चाहिए, जिसके दो हिस्से हों। पहला, बेहतर जीवन और प्रभावी नागरिक प्रबंधन के लिए स्वच्छता, पानी और आवास सहित सामाजिक बुनियादी ढांचे का निर्माण और रखरखाव करे, जबकि दूसरा सड़कें, रेलवे और विमानन जैसे बुनियादी ढांचे का निर्माण, प्रबंधन और रखरखाव करे। इस पूरे पुनर्गठन में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि नया ढांचा भी नागरिकों के लिए कष्टकारी नौकरशाही के उस जाल में न फंस जाए, जो अक्सर सरकारी विभागों की प्रवृत्ति होती है। इसका सबसे प्रभावी उपाय प्रदर्शन के पैमाने हैं। हर विभाग और अधिकारी के काम का मूल्यांकन हासिल परिणामों के आधार पर किया जाए। जिम्मेदारी और जवाबदेही का यह ढांचा विभाग प्रमुखों और उनके अधीनस्थों को जिले की आर्थिक समृद्धि के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध रखेगा।

पुनर्गठित जिला प्रशासन को एक सूत्रधार, समन्वयक, उत्प्रेरक और समस्या-निवारक की भूमिका निभानी होगी। उसे जिले में उद्यमशील दृष्टि विकसित करने और उसे जमीन पर उतारने की क्षमता भी पैदा करनी होगी। अब ऊपर से थोपे गए विकास को टिकाऊ विकास मानने का दौर नहीं रहा। यदि भारत को सच्चे अर्थों में विकसित होना है और निरंतर विकास को गति देनी है, तो उसे स्थानीय आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा।

कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के अनुसार समृद्ध राज्य के पास 'विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से युक्त उत्पादक अर्थव्यवस्था होनी चाहिए।' यह 'विभिन्न प्रकार' हमारे लिए एक आह्वान है- दूर-दराज के जिलों में रहने वाले आम लोगों के लिए विविधतापूर्ण, समावेशी और जमीनी समाधान विकसित करने का। ये जिले अपार संभावनाओं और विकास की क्षमता से भरपूर हैं तथा भारत के विकास का इंजन बनने की कुव्वत रखते हैं। यह दृष्टिकोण कोई मामूली बदलाव नहीं, बल्कि संपूर्ण पुनर्विचार का खाका है, जो विकास को गति देने के साथ लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। यह उस देश के लिए आदर्श संयोजन है, जो दोनों की आकांक्षा रखता है और जिन्हें हासिल करने के लिए वह लंबे समय से संघर्ष करता रहा है।

Updated on:
02 Sept 2026 04:47 pm
Published on:
02 Sept 2026 04:47 pm