
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी - फोटो पत्रिका नेटवर्क
जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के आलेख 'गर्भकाल के दो हृदय' को पाठकों ने मातृत्व, गर्भसंस्कार और भावी पीढ़ी के निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक और चिंतनशील विमर्श बताया है। पाठकों का मानना है कि आलेख गर्भावस्था को केवल शारीरिक प्रक्रिया न मानकर मां और गर्भस्थ शिशु के बीच भावनात्मक, मानसिक और संस्कारगत जुड़ाव के रूप में देखने की दृष्टि देता है।
मां के आहार-विहार, विचार, भावनाओं, व्यवहार और पारिवारिक वातावरण का गर्भस्थ शिशु पर पडऩे वाले प्रभाव को आलेख में प्रभावी ढंग से सामने रखा गया है। पाठकों ने भारतीय परंपरा में वर्णित गर्भसंस्कार, ‘दो हृदय’ की अवधारणा और सकारात्मक वातावरण के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से-
गर्भावस्था केवल शिशु के जन्म की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व और संस्कारों की नींव रखने का महत्वपूर्ण समय है। आलेख में मां के विचारों, भावनाओं, खान-पान और व्यवहार का गर्भस्थ शिशु पर पडऩे वाले प्रभाव को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। आज के समय में गर्भवती महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। सकारात्मक वातावरण, अच्छे विचार और संतुलित आहार आने वाली पीढ़ी को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह आलेख समाज के लिए विचारणीय संदेश देता है।
-डॉ. वीके त्रिपाठी, सामाजिक कार्यकर्ता, दतिया
गर्भधारण के दौरान महिलाओं के आहार-विहार के साथ विचारों का भी बेहद महत्व है। प्राचीनकाल से परिवारों में महिलाओं का इस अवस्था में विशेष ध्यान रखा जाता था, लेकिन वर्तमान में सभी इसके महत्व को भूल रहे हैं। गुलाब कोठारी जी ने इस आलेख के माध्यम से इस महत्वपूर्ण विषय को समाज के सामने रखा है। आपने यह बताया है कि कैसे गर्भस्थ शिशु और मां का हृदय आपस में जुड़ा होता है। मां की इस दौरान की भूमिका को उल्लेखित करके विचारों के महत्व को भी बताया है। निश्चित ही यह आलेख समाज में चेतना का प्रसार करेगा।
-नीलेश पांडे, धार
गर्भावस्था को केवल शारीरिक प्रक्रिया न मानकर संस्कार, भावनात्मक जुड़ाव और मानसिक शांति से जोडऩे का सकारात्मक प्रयास करता है। मां की सोच, व्यवहार, संगीत, संवाद और शांत वातावरण का गर्भस्थ शिशु पर पडऩे वाले प्रभाव की बात निश्चित तौर पर भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता को बताती है। आलेख में धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक तथ्यों को बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यह आलेख मातृत्व, गर्भकालीन मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मक पारिवारिक वातावरण के महत्व पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।
-डॉ. नारायण सिंह, आयुक्त, सहायक जनजाति, खंडवा
गुलाब कोठारी जी ने ‘गर्भकाल के दो हृदय’ नामक लेख में गर्भधारण को एक पवित्र यज्ञ बताया है। साथ ही यह भी बताया है कि स्त्री और पुरुष दोनों की समान भागीदारी होती है, लेकिन सृजन का मुख्य दायित्व स्त्री का होता है। आलेख का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और दार्शनिक पहलू दौहद (दो हृदय) की अवस्था है। चौथे महीने में जब शिशु का हृदय मां से जुड़ता है, तब मां की इच्छाएं और भावनाएं सीधे शिशु के संस्कारों को गढ़ती हैं। चरक संहिता और याज्ञवल्क्य स्मृति के हवाले से यह स्पष्ट किया गया है कि गर्भवती स्त्री की इच्छाओं को दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे शिशु के विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। आलेख यह भी संदेश देता है कि माता-पिता के सात्विक संकल्प, विचार और सकारात्मक वातावरण के जरिए ही एक उत्तम, संस्कारी और मानसिक रूप से मजबूत संतान का जन्म संभव है।
-राधेश्याम गर्ग, सेवानिवृत्त शिक्षक, पन्ना
आलेख गर्भकाल के उस महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है, जिसे अक्सर सामान्य स्वास्थ्य तक सीमित समझ लिया जाता है। मां का खान-पान, व्यवहार, विचार और मानसिक स्थिति गर्भस्थ शिशु के विकास पर प्रभाव डालते हैं। इसलिए गर्भावस्था केवल शारीरिक बदलाव का दौर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के व्यक्तित्व और संस्कारों की नींव रखने का समय भी है। गुलाब कोठारी जी के आलेख का संदेश स्पष्ट है कि स्वस्थ और संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भ से ही होती है।
-अतुल पटवारी, साहित्यकार, सीधी
गर्भाधान एक पवित्र यज्ञ है, जहां पुरुष का बीज और स्त्री का गर्भ उसे मानव बनाता है। मां ही जीव को मानव में रूपांतरित कर आत्मा का अंश बनकर अपने जैसा बनाती है। गर्भ प्रवेश के साथ माता के स्वभाव, व्यवहार और स्वप्न-सुषुप्ति में बड़ा परिवर्तन आता है। इस काल में मां के दो हृदय हो जाते हैं। मां की इच्छा और सोच दोनों शरीरों में रहती है। मां अपने सात्विक संकल्प, आहार-विहार और मानसिकता से शिशु को संस्कार दे सकती है और तामसिक-राजसिक इच्छा को सात्विक भाव में बदल सकती है। गर्भ-संवाद, वैदिक मंत्र और भावनात्मक सुरक्षा से शिशु का शारीरिक-मानसिक विकास होता है। शिशु पूर्वजन्म के गुण लाता है, पर माता का आचरण उसे दिशा देता है।
-डॉ. हुकुमचंद जैन, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर
आलेख भारतीय संस्कृति और गर्भसंस्कार के उस शाश्वत सत्य को रेखांकित करता है, जिसमें एक मां की मानसिक स्थिति, आहार-विहार और उसके संकल्प गर्भस्थ शिशु के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं। प्रस्तुत पंक्तियां इस बात का प्रबल प्रमाण हैं कि मातृत्व केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक और सृजनात्मक साधना है। गर्भकाल के दौरान माता का प्रभाव केवल शारीरिक पोषण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह शिशु के व्यक्तित्व, संस्कारों और आंतरिक चेतना की नींव रखता है। इसमें बहुत सुंदर ढंग से बताया गया है कि कैसे एक मां अपने सात्विक संकल्पों और संयमित जीवनशैली के माध्यम से अपनी तामसिक या राजसिक इच्छाओं को भी सात्विक भाव में बदल सकती है। यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध सत्य है कि गर्भावस्था में मां की भावनाएं और मानसिक तनाव या प्रसन्नता सीधे तौर पर बच्चे के विकास को दिशा देते हैं।
-सारिका मरावी, समाजसेवी, जबलपुर
गुलाब कोठारी जी का आलेख ‘गर्भकाल के दो हृदय’ अत्यंत सारगर्भित, चिंतनशील और प्रेरणादायक है। यह आलेख हमें भारतीय परंपरा में वर्णित गर्भसंस्कारों के वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक महत्व को सरलता से समझाता है। आलेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि परिवार का स्नेह, सहयोग और आत्मीय वातावरण भावी पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे विचारोत्तेजक आलेख न केवल भारतीय संस्कारों की महत्ता को पुन: स्थापित करते हैं, बल्कि स्वस्थ, संवेदनशील और संस्कारित पीढ़ी के निर्माण की दिशा में समाज को सकारात्मक प्रेरणा भी देते हैं।
-पं. नितिन अवसरकर, भोपाल
‘गर्भकाल के दो हृदय’ आलेख मातृत्व की संवेदनशीलता और गर्भस्थ शिशु के विकास के बीच संबंध को दर्शाता है। मां शरीर से ही नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से शिशु के निर्माण में सहभागी होती है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान तनाव, नकारात्मकता और अशांत वातावरण से बचना तथा प्रेम, विश्वास, संगीत, प्रार्थना और सकारात्मक संवाद को अपनाना उपयोगी हो सकता है। इस लेख के जरिए गर्भसंस्कार को किसी धार्मिक परंपरा तक सीमित न रखकर, अच्छे संस्कार, स्वस्थ व्यवहार और सकारात्मक वातावरण के रूप में समझाया गया है, जो अत्यंत प्रेरणादायक है। इस पर अमल करना चाहिए।
-पद्मश्री शुक्ला, भोपाल
आलेख ‘गर्भकाल के दो हृदय’ गर्भावस्था को केवल जैविक प्रक्रिया न मानकर भावनात्मक, मानसिक और संस्कारगत यात्रा के रूप में देखने की सार्थक दृष्टि देता है। यह विचार विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि मां का आहार ही नहीं, उसकी मन:स्थिति, विचार और परिवेश भी गर्भस्थ शिशु के विकास से जुड़े होते हैं। आधुनिक विज्ञान भी मातृ तनाव, पोषण और स्वास्थ्य को भ्रूण के विकास के लिए महत्वपूर्ण मानता है। आलेख की विशेषता यह है कि इसमें भारतीय गर्भ-संस्कार परंपरा, पौराणिक प्रसंग और आधुनिक दृष्टि को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया गया है। आज जब गर्भावस्था की चिकित्सा-सुविधाओं पर तो ध्यान बढ़ा है, तब मां के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक सहयोग और सकारात्मक वातावरण पर भी उतना ही ध्यान आवश्यक है। वास्तव में स्वस्थ मातृत्व ही स्वस्थ भावी पीढ़ी की आधारशिला है।
-डॉ. लोकेन्द्र सिंह कोट, रतलाम
Updated on:
29 Aug 2026 06:11 pm
Published on:
29 Aug 2026 06:11 pm
