
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो- पत्रिका
जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के आलेख ‘नाम ब्रह्म का-प्रपंच माया के’ को पाठकों ने भारतीय दर्शन, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चेतना की गहन व्याख्या करने वाला बताया है। पाठकों का कहना है कि लेख में ब्रह्म और माया के संबंध, मनुष्य की चंचल प्रवृत्ति तथा भौतिक आकर्षणों के प्रभाव को अत्यंत सरल, सहज और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। विशेष रूप से आत्मज्ञान, ईश्वर भक्ति, संयम और विवेक के माध्यम से माया से मुक्ति के मार्ग को जिस प्रकार समझाया गया है, वह वर्तमान भौतिकवादी दौर में लोगों को आत्ममंथन और आंतरिक शांति की ओर प्रेरित करता है। पाठकों के अनुसार लेख यह संदेश देता है कि जीवन का वास्तविक सत्य बाहरी आकर्षणों में नहीं, बल्कि आत्मबोध और चेतना की पहचान में निहित है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से—
माया मनुष्य को भौतिक सुख, मोह और अहंकार में बांधकर उसके वास्तविक स्वरूप से दूर कर देती है। मन की चंचलता ही भटकाव का कारण बनती है, जिससे व्यक्ति सत्य और असत्य में अंतर नहीं कर पाता। सांसारिक आकर्षण क्षणिक हैं और आत्मज्ञान ही माया से मुक्ति का मार्ग है। हमें मोह, क्रोध और लोभ से दूर रहकर संयम, विवेक और ईश्वर भक्ति का पालन करना चाहिए, तभी जीवन में शांति और सच्चे आनंद की प्राप्ति संभव है।
- रामनारायण शुक्ला, पंडित, बैतूल
गुलाब कोठारी जी के लेख ‘नाम ब्रह्म का-प्रपंच माया के’ में भारतीय दर्शन की उस गूढ़ अनुभूति को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है, जिसमें मनुष्य के जीवन, उसकी पहचान और संसार की वास्तविकता पर गंभीर चिंतन दिखाई देता है। लेख में स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म सत्य, शाश्वत और अखंड तत्व है, जबकि माया उस सत्य पर पड़ा हुआ आवरण है, जो मनुष्य को बाहरी आकर्षणों और भ्रमों में उलझाए रखता है। कोठारी जी ने ‘नाम’ को केवल पहचान का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे चेतना और अस्तित्व से जोड़कर देखा है। आज के भौतिकवादी दौर में, जहां व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा और बाहरी उपलब्धियों को ही जीवन का सार समझ बैठा है, वहां यह लेख आत्मबोध और अंतर्मंथन की प्रेरणा देता है।
- डॉ. बी.के. शर्मा, पूर्व कुलपति, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
माया के कारण मन ईश्वर से भी दूर हो जाता है। माया ने अपने जनक ब्रह्म को भी ठग लिया है, फिर मानव की माया के आगे क्या बिसात है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि मोह-माया आत्मा के पतन का कारण होती है। माया के फेर में मनुष्य पूरी तरह से बंध चुका है। योग और आत्मचिंतन के माध्यम से ही मोह-माया से बचा जा सकता है।
यह आलेख माया और ब्रह्म के अंतर्संबंधों को बेहद सरल और गहरे रूपकों के साथ प्रस्तुत करता है, जहां संसार को गोल्फ के मैदान और इच्छाओं को उसके गड्ढों के रूप में बताया गया है। लेखक ने गीता के श्लोकों के माध्यम से सटीक ढंग से समझाया है कि मन की चंचलता और भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह ही सभी दुखों और भटकाव की मूल वजह है। यह रचना आज के दौर में मनुष्य को अपनी अंधी दौड़ रोककर आत्म-अवलोकन करने और वास्तविक ज्ञान को पहचानने की प्रेरणा देती है। संक्षेप में कहें तो यह आलेख दार्शनिक गूढ़ता को व्यावहारिक जीवन की कसौटी पर कसने वाली अत्यंत विचारणीय और उत्कृष्ट प्रस्तुति है।
- प्रोफेसर महेंद्र नायक, छतरपुर
माया के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है। माया की मृगमरीचिका रेगिस्तान में पानी की उम्मीद दिखाती है और मनुष्य प्यासे हिरण की तरह उसके पीछे भागता रहता है, लेकिन अंत में उसे निराशा ही हाथ लगती है। माया के वशीकरण से बाहर निकलने के लिए वास्तविक ज्ञान की आवश्यकता होती है। हमारे शास्त्रों और धर्मगुरुओं ने अनादिकाल से यही संदेश दिया है। इसके बावजूद मनुष्य माया-जाल से निकलने के बजाय उसके पीछे भागता जा रहा है। ऐसे आलेखों के माध्यम से व्यक्ति अपनी वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास कर सकता है।
माया के कारण मन चंचल और अस्थिर हो जाता है। मन जब वस्तुओं और इच्छाओं से प्रभावित होता है, तब वास्तविकता का ज्ञान छिप जाता है और जीवन भ्रम में उलझ जाता है। माया ब्रह्म की शक्ति है, जो जगत की रचना और संचालन करती है। जीवन की विविध परिस्थितियों, इच्छाओं और भावनाओं में माया व्यक्ति को बंधन में रखती है। यदि मन वस्तुस्थिति और वास्तविक ज्ञान को समझ ले, तो माया से पार पाया जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से माया और ब्रह्म का संबंध समझाया गया है और आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
गुलाब कोठारी जी का यह लेख आध्यात्मिक चिंतन से परिपूर्ण है। इसमें बहुत सरल शब्दों में बताया गया है कि मनुष्य का चंचल मन ही माया का मुख्य कारण है। जब तक व्यक्ति विषय-विकारों में उलझा रहता है, तब तक वह वास्तविक सत्य को नहीं पहचान पाता। लेख में गीता के श्लोकों और उदाहरणों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि आत्मज्ञान और ईश्वर भक्ति ही जीवन को सही दिशा दे सकती है। वर्तमान भौतिकवादी युग में यह लेख लोगों को आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करता है। ऐसे लेख समाज में सकारात्मक सोच और मानसिक शांति का संदेश देते हैं।
Updated on:
23 May 2026, 6:12 PM IST
Published on:
23 May 2026, 6:12 PM IST
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