चालान पेश किए बिना जेल में कैद बंदियों की संख्या भी अच्छी खासी है। देश के विभिन्न कारागारों में बंद साढ़े पांच लाख बंदियों में 70 से 80 प्रतिशत संख्या इन्हीं श्रेणियों के कैदियों की है। बिहार में यह संख्या सर्वाधिक 87 प्रतिशत है, जबकि उत्तरप्रदेश में 77 फीसदी कैदी इन्हीं श्रेणियों के हैं।
देश की जेलों में कैदियों की क्षमता से अधिक संख्या का मुद्दा हमेशा से ज्वलंत रहा है। सामान्य तौर पर इसका अर्थ यह लिया जाता है कि अपराधों की संख्या बढऩे के कारण ऐसा हो रहा है। लेकिन, यह वस्तुस्थिति नहीं है। कैदियों की भरमार की वजह यह है कि जेलों में ऐसे लोगों को भी कैदी बनाया जा रहा है, जिन्हें कानूनी और न्यायिक तौर पर बंदी बनाने की जरूरत नहीं है। इनके खिलाफ जमानती अपराध दर्ज हैं। उन्हें जेल भेजे बिना जमानत दी जा सकती है। इसके बावजूद ये जेल में हैं तो इसका अर्थ है कि ट्रायल कोर्ट ने उनकी जमानत मंजूर नहीं की।
समस्या यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे बंदी लंबे समय तक जेलों में कैद रहते हैं और कई-कई बार सुनवाई के बावजूद उनकी जमानत नहीं होती, जबकि देश की पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 और नई न्याय संहिता बीएनएसएस की धारा 478 उन्हें तत्काल रिहाई का अधिकार देती है। लगातार कैद उनके नागरिक अधिकार का हनन और उनके साथ घोर नाइंसाफी है। यह हनन उनके साथ भी हो रहा है, जो विचाराधीन कैदी हैं और उनके साथ भी जिनके खिलाफ ट्रायल तक शुरू नहीं हुआ है। चालान पेश किए बिना जेल में कैद बंदियों की संख्या भी अच्छी खासी है। देश के विभिन्न कारागारों में बंद साढ़े पांच लाख बंदियों में 70 से 80 प्रतिशत संख्या इन्हीं श्रेणियों के कैदियों की है। बिहार में यह संख्या सर्वाधिक 87 प्रतिशत है, जबकि उत्तरप्रदेश में 77 फीसदी कैदी इन्हीं श्रेणियों के हैं। यह मुद्दा एक बार चर्चा में इसलिए आया है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्ज्ल भुइयां ने इस पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के हाल ही हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने अदालतों में मुकदमों के अंबार और छोटी-छोटी बातों पर मुकदमा दर्ज करने के साथ ही आरोपियों को जमानत नहीं देने की प्रवृत्ति पर जो कटाक्ष किया है, उस पर गौर करना जरूरी है।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीश विभिन्न मंचों पर यह बोल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो इसकी व्यवस्था भी दी हुई है तथा निचली अदालतों को निर्देश जारी किए हुए हैं कि वे खुद को सर्वोपरि मानते हुए न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करें। जो मामले उनके स्तर पर निपट सकते हैं, उन्हें उच्च अदालतों के निर्णय के लिए नहीं छोड़ें। इससे उच्च अदालतों में मामले बढ़ जाते हैं। इसका समूचा असर पूरी न्याय व्यवस्था पर आ जाता है, जो विलंबित होती जाती है। नागरिक इसका खमियाजा उठाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों को उनके अधिकार और सहज न्याय सुलभ करवाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट, विधिक सहायता समितियों के गठन सहित कई कदम उठाए हैं, लेकिन यह भी सच है कि इसके बावजूद कुछ कमी निरंतर महसूस की जा रही है। न्याय व्यवस्था में आमजन का भरोसा कायम रखने के लिए इस कमी को दूर करने का सुचारू तंत्र बनाने की जरूरत है।