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आईना: भय बिनु होई न प्रीत

देश का सबसे बड़ा परीक्षा तंत्र फिर ध्वस्त हो गया। लाखों युवाओं की मेहनत, परिवारों की जमा-पूंजी और वर्षों के सपनों पर एक बार फिर दलालों, अफसरों और संगठित माफिया ने डाका डाल दिया।

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NEET 2026 Paper Leak

फोटो: पत्रिका

देश का सबसे बड़ा परीक्षा तंत्र फिर ध्वस्त हो गया। लाखों युवाओं की मेहनत, परिवारों की जमा-पूंजी और वर्षों के सपनों पर एक बार फिर दलालों, अफसरों और संगठित माफिया ने डाका डाल दिया। नीट परीक्षा रद्द हो गई। इसका स्वागत है, मगर क्या केवल परीक्षा रद्द कर देने से अपराध धुल जाता है? सच्चाई यह है कि पर्चा लीक अब उद्योग बन चुका है। ऐसा उद्योग, जिसमें जोखिम कम है, मुनाफा बेहिसाब है और सजा लगभग शून्य। जांचें होती हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस सजती हैं, चेहरे टीवी पर चमकते हैं… मगर मिलती है …. तारीख पर तारीख, जमानत और अगला पर्चा लीक।

इस बार नीट पेपर लीक की कहानी रहस्य नहीं रही। कहां छपा, कहां से निकला, किसने बेचा, किसने खरीदा, कौन दलाल था, कौन संरक्षक…परतें खुलती जाएंगी। कई नाम सामने आएंगे। कई गिरफ्तारियां होंगी। मगर असली सवाल वही रहेगा कि क्या इस बार कुछ बदलेगा?

राजस्थान इस बीमारी का पुराना मरीज है। रीट-2021, पुलिस कांस्टेबल भर्ती, एसआइ भर्ती, पटवारी, वनरक्षक… सूची इतनी लंबी हो चुकी है कि अब लोगों को भर्ती परीक्षाओं के नाम भी याद नहीं। हर सरकार ने कार्रवाई का दावा किया। हर दल ने विपक्ष में रहते हुए सड़कों पर प्रदर्शन किए। मगर सत्ता में आते ही ढिलाई, समझौते और मौन।

पांच वर्षों में एसओजी ने 700 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन सजा? लगभग शून्य। गिरफ्तारी हुई, प्रेस नोट जारी हुए, फिर जमानत मिली और फाइलें अदालतों की धूल फांकने लगीं। इधर युवा उम्र गंवाते रहे, उधर माफिया अपना नेटवर्क मजबूत करता रहा।


यही इस पूरे खेल का सबसे भयावह सच है कि व्यवस्था अपराध को रोक नहीं रही, धीरे-धीरे उसे संरक्षण दे रही है। जब जांच वर्षों तक लटकती है तो न्याय का दम घुट जाता है और व्यवस्था भी सड़ांध मारने लगती है। जांच एजेंसियां खुद सौदेबाजी, दबाव और कथित ब्लैकमेङ्क्षलग के आरोपों में घिर जाती हैं। बड़े नाम बचाने की कोशिश होती है और उसी आड़ में पूरा गिरोह बच निकलता है। हर अधूरी जांच माफिया को नया साहस देती है। हर लंबित मुकदमा उसे नया ग्राहक देता है। हर बरी हुआ आरोपी व्यवस्था की तरफ देखकर मुस्कुराता है और अगली भर्ती की तैयारी शुरू कर देता है।

'भय बिनु होई न प्रीत', यह राम चरित मानस का मात्र दोहा नहीं, बल्कि शासन का मूल सिद्धांत है। जिस व्यवस्था में अपराधी को सजा का भय न हो, वहां कानून किताबों में रह जाता है और अपराध बाजार में उतर आता है।

आज पर्चा माफिया उसी निर्भयता के साथ काम कर रहा है। उसे पता है कि पकड़े भी गए तो वर्षों तक कुछ नहीं होगा। मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले को याद कीजिए। मेडिकल प्रवेश का वह महाघोटाला, जिसने पूरे देश को हिला दिया था। रहस्यमय मौतें हुईं, लंबी जांच चली, मगर अंत में मगरमच्छ निकल गए और जाल में फंसी रहीं केवल छोटी मछलियां…जिनके पास न रसूख था, न पहुंच, न ताकत। राजस्थान में भी वही खेल खेला जा रहा है। बस चेहरे और तरीके बदले हैं। व्यापमं से देश ने कुछ नहीं सीखा। नीट उसी भूली हुई चेतावनी की नई कीमत है।

सरकारों को यह समझना होगा कि पर्चा लीक रोकना उनका दायित्व है, घोटाले के बाद कैमरों के सामने कठोर बयान देना नहीं। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर वितरण तक हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। केवल दलालों पर नहीं, उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई करनी होगी, जिनकी मिलीभगत या लापरवाही से यह जहर फैलता है…चाहे वे आइएएस हों, आइपीएस हों या विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों के बड़े अधिकारी। एसआइ भर्ती में प्रति अभ्यर्थी पचास लाख रुपए तक वसूले गए। यह युवाओं के भविष्य की खुली नीलामी है।

लाखों युवा रात-रात भर जागकर, उम्मीदों का बोझ उठाकर परीक्षाएं देते हैं। उनके साथ यह धोखा पूरे सामाजिक विश्वास का कत्ल है। सच यही है…पर्चा लीक का धंधा प्रश्नपत्रों से नहीं, सजा के अभाव से चलता है। जिस दिन दंड निश्चित और त्वरित होगा, उसी दिन यह बाजार ढहने लगेगा। अब समय निर्णायक कार्रवाई का है। फास्ट ट्रैक अदालतें बनें। समयबद्ध सुनवाई हो। दोषसिद्धि सुनिश्चित हो। और सजा इतनी त्वरित और कठोर हो कि अगली बार कोई दलाल पर्चा हाथ में लेने से पहले कांप जाए।