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पुरानी सांस्कृतिक बाधाओं से उभरती आधुनिक मुस्लिम महिला

अल्लाह तआला का फरमान है: 'जो भी नेक अमल करेगा, चाहे वह पुरुष हो या महिला, बशर्ते कि वह मोमिन हो, तो हम उसे पाकीजा (शुद्ध) जीवन प्रदान करेंगे।'

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फिरदौस जाकिर मिंडा, (विधि विशेषज्ञ राजस्थान हाईकोर्ट)- इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो न्याय, समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित है। इतिहास के हर दौर में मुस्लिम महिलाओं ने ज्ञान, राजनीति और समाज कल्याण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में मुस्लिम समाज की समग्र प्रगति के लिए महिलाओं का सक्रिय होना अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।

कुरान और सुन्नत की रोशनी में मानवीय गरिमा और पुण्य (अजर-ओ-सवाब) के मामले में पुरुष और महिला के बीच कोई भेदभाव नहीं है। अल्लाह तआला का फरमान है: 'जो भी नेक अमल करेगा, चाहे वह पुरुष हो या महिला, बशर्ते कि वह मोमिन हो, तो हम उसे पाकीजा (शुद्ध) जीवन प्रदान करेंगे।' स्वस्थ और विकसित मुस्लिम समाज के निर्माण के लिए महिलाओं का शिक्षित और सशक्त होना आवश्यक है। हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं, तो इसका अर्थ उन्हें उनके शरीयत सम्मत अधिकार प्रदान करना और सामाजिक बाधाओं को दूर करना है।

समाज की आधी आबादी को घरों तक सीमित रखना, प्रगति के पहिए को रोकने के समान है। शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक के क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी समाज को स्थिरता प्रदान करती है, जिससे उनके भीतर आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना पैदा होती है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि इस्लाम में लैंगिक समानता का अभाव है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। कुरान-ए-करीम ने स्पष्ट रूप से वर्णन किया है कि मानवीय श्रेष्ठता का मानक 'लिंग' नहीं बल्कि 'तकवा' (ईश्वर का भय/परहेजगारी) है। कुरानी दृष्टिकोण: अल्लाह तआला फरमाता है 'बेशक अल्लाह के नजदीक तुम में सबसे अधिक सम्मान वाला वह है, जो सबसे अधिक परहेजगार है' (अल-हुजरात- 13) यह आयत समानता का वह चार्टर है जो किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव को नकारती है।

हज का उदाहरण ही ले लें। एहराम की स्थिति में पुरुष और महिला दोनों एक ही जैसे नियमों के पाबंद होते हैं। तवाफ-ए-काबा हो या अराफात के मैदान में की जाने वाली इबादत, अल्लाह के सामने पुरुष और महिला दोनों बराबर माने जाते हैं। हज में की जाने वाली 'सई' हजरत हाजरा (अ.स.) के धैर्य, विश्वास और संघर्ष की याद दिलाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि इस्लाम में महिलाओं के योगदान और त्याग को भी इबादत माना जाता है। वैसे भी समाज की प्रगति इस बात से तय होती है कि वहां महिलाओं को कितना सम्मान मिलता है। मुस्लिम समाज में महिलाओं के सशक्तीकरण के तीन पहलू हैं:शैक्षिक स्वायत्तता: इस्लाम ने ज्ञान प्राप्त करना हर पुरुष और महिला के लिए अनिवार्य किया है। शिक्षित महिला पूरी पीढ़ी को प्रभावित करती है। वर्तमान में मुस्लिम महिलाएं चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून और तकनीक में नाम कमाकर अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रही हैं।आर्थिक स्थिरता: महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना समाज की गरीबी को कम करने और परिवार में संतुलन लाने के लिए आवश्यक है।

निर्णय लेने में भागीदारी:महिलाओं की राय को सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर महत्त्व देना सुन्नत-ए-नबवी है। सुलह-ए-हुदैबिया में हजरत उम्मे सलमा की सलाह पर अमल करके संकट टाला गया, जो महिला अंतर्दृष्टि की महत्ता दिखाता है।अक्सर मुस्लिम समाज में 'संस्कृति' को 'धर्म' समझ लिया जाता है। शिक्षा की पाबंदी, विरासत से वंचित करना या जबरन निकाह जैसी बुराइयां पितृसत्तात्मक सोच हैं, जिनका इस्लाम से कोई संबंध नहीं। हज इस्लाम का पांचवां स्तंभ है, जो उम्मत-ए-मुस्लिमा की एकता, तकवा और बलिदान का वैश्विक प्रदर्शन भी है।


मक्का मुअज्जमा की पवित्र भूमि पर 'फरजंदान-ए-तौहीद' का जमावड़ा गवाही है कि अल्लाह के दरबार में सब बराबर हैं। इस साल का हज सीजन महिलाओं की स्वायत्तता में नया अध्याय जोड़ रहा है, जहां हजारों महिलाएं अपने संकल्प और ईमान से इस पवित्र कर्तव्य को पूरा कर रही हैं। सऊदी अरब द्वारा बिना महरम हज की अनुमति देना महिलाओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा का संतुलित उदाहरण है। अकेले यात्रा करने वाली महिलाओं की संख्या बढऩा इस बात का प्रतीक है कि मुस्लिम महिलाएं अपने निर्णय स्वयं ले सकती हैं।