
trump and jinping
के.एस. तोमर, (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)- अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की 14 मई को चीन यात्रा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली शिखर वार्ता वर्ष 2026 की सबसे महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में गिनी जा रही है। यह ऐसे समय हो रही है जब दुनिया तेजी से बदलते शक्ति-संतुलन, व्यापारिक तनाव, सैन्य प्रतिस्पर्धा और बदलते वैश्विक गठबंधनों के दौर से गुजर रही है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह शिखर वार्ता इस वास्तविकता को दर्शाती है कि वाशिंगटन अब चीन के साथ अनियंत्रित टकराव का जोखिम नहीं उठा सकता। ट्रंप की चीन के प्रति नई रणनीति उनके पहले कार्यकाल से अलग दिखाई दे रही है। 2017 में जहां व्यापार युद्ध और टैरिफ टकराव अमरीका-चीन संबंधों पर हावी थे, वहीं अब ट्रंप का दृष्टिकोण व्यावहारिक और सामरिक यथार्थवाद पर आधारित दिखता है। जनवरी 2025 में सत्ता में लौटने के तुरंत बाद ट्रंप ने शी जिनपिंग से सीधे संपर्क स्थापित किया। यह कदम इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना गया क्योंकि ट्रंप ने अपने पुराने राजनीतिक अभियान में चीन विरोधी आर्थिक राष्ट्रवाद को प्रमुख मुद्दा बनाया था। लेकिन आज की वैश्विक परिस्थितियां अलग हैं।
अमरीका रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, ईरान संकट, घरेलू आर्थिक दबाव और यूरोपीय गठबंधन की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। दूसरी ओर चीन, धीमी आर्थिक वृद्धि के बावजूद अमरीका का सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन अब यह समझता दिख रहा है कि चीन के साथ सीमित सहयोग और संवाद बनाए रखना अमरीकी हित में है। बीजिंग शिखर वार्ता पर हाल के प्रतिबंध विवादों का भी असर दिखाई देगा। कुछ दिन पहले अमरीका ने ईरानी तेल प्रोसेस करने के आरोप में कई चीनी रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके जवाब में चीन ने अपने एंटी-सेक्शन कानूनों का हवाला देते हुए अमरीकी प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया। इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक तनाव बढ़ा है, लेकिन यही संकट दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर भी ला रहा है।
वार्ता में व्यापार और टैरिफ सबसे प्रमुख मुद्दे रहेंगे। ट्रंप संरक्षणवादी आर्थिक सोच से पूरी तरह पीछे नहीं हटे हैं, लेकिन वे यह भी समझते हैं कि व्यापारिक अनिश्चितता अमरीकी उद्योगों और वित्तीय बाजारों को नुकसान पहुंचा रही है। वहीं चीन तकनीकी प्रतिबंधों में राहत और वैश्विक बाजारों तक अधिक पहुंच चाहता है। ताइवान का मुद्दा भी बैठक में प्रमुख रहेगा। बीजिंग अमरीका से ताइवान को मिलने वाले सैन्य समर्थन पर संयम की मांग कर सकता है, जबकि वाशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी सैन्य गतिविधियों को लेकर आश्वासन चाहेगा। भारत के लिए यह शिखर वार्ता विशेष महत्त्व रखती है। पिछले एक दशक में नई दिल्ली ने अमरीका-चीन प्रतिस्पर्धा से सामरिक लाभ उठाया है। अमरीका ने भारत को चीन के संतुलनकारी साझेदार के रूप में देखा, जबकि चीन भी भारत को पूरी तरह अमरीकी खेमे में जाने से रोकने के लिए समय-समय पर कूटनीतिक पहल करता रहा। इससे भारत को रणनीतिक लचीलापन मिला। लेकिन यदि ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच व्यापक सामरिक समझ बनती है तो भारत की स्थिति बदल सकती है। ऐसी स्थिति में अमरीका, भारत पर व्यापार, रूसी तेल खरीद और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर अधिक दबाव बना सकता है।
दूसरी ओर चीन, वास्तविक नियंत्रण रेखा और दक्षिण एशिया में अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है। हालांकि शिखर वार्ता की पूरी विफलता भी भारत के लिए लाभकारी नहीं होगी। यदि अमरीका-चीन टकराव बढ़ता है तो नई दिल्ली को तकनीक, बैंकिंग, ऊर्जा और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर कठिन रणनीतिक विकल्प चुनने पड़ सकते हैं। इसी कारण भारत के हित में न तो अमरीका-चीन की पूर्ण मित्रता है और न ही खुला टकराव। भारत के लिए सबसे उपयुक्तस्थिति वही होगी जिसमें दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा जारी रहे, लेकिन वह प्रत्यक्ष संघर्ष में न बदले। इससे भारत की सामरिक प्रासंगिकता और कूटनीतिक स्वतंत्रता बनी रह सकती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक निकटता और अधिक स्पष्ट हुई है। बीजिंग अब इस्लामाबाद को अपने सैन्य और तकनीकी समर्थन को खुलकर स्वीकार कर रहा है। यदि ट्रंप प्रशासन भी पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के साथ संबंध सुधारता है तो भारत के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। यदि अमरीका-चीन तनाव कम होता है तो चीन दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक पहुंच और तेजी से बढ़ा सकता है। ईरान भी इस वार्ता के परिणामों पर करीबी नजर रखेगा। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच चीन तेहरान का बड़ा आर्थिक सहारा बन चुका है। यदि दोनों महाशक्तियों के बीच ईरानी तेल और प्रतिबंधों को लेकर कोई सीमित समझ बनती है तो ईरान को राहत मिल सकती है।
यूरोप सुरक्षा के लिए नाटो के माध्यम से अमरीका पर निर्भर है, लेकिन वह वैश्विक अर्थव्यवस्था के अत्यधिक विभाजन से भी चिंतित है। यूरोपीय देशों को उम्मीद है कि अमरीका-चीन तनाव कम होने से वैश्विक बाजारों में स्थिरता आएगी। अंतत: ट्रंप-शी शिखर वार्ता केवल एक औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं है, यह उस नई वैश्विक राजनीति का संकेत है जिसमें वैचारिक टकराव की जगह अब बड़े देशों के बीच व्यावहारिक शक्ति-प्रबंधन ले रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ा संदेश स्पष्ट है- नई दिल्ली अब केवल अमरीका-चीन प्रतिद्वंद्विता के आधार पर अपनी चीन नीति नहीं बना सकती। उसे अपनी आर्थिक क्षमता, सैन्य तैयारी, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करना होगा ताकि बदलती वैश्विक राजनीति में वह स्वतंत्र व प्रभावी भूमिका निभा सके।
Published on:
13 May 2026 12:29 pm
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