‘बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।’ कहने को तो यह कहावत बचत का संदेश देने वाली है। लेकिन पेट्रोल पम्प संचालकों ने शायद इसे ‘बूंद-बूंद से पेट भरता है’ समझ लिया है। दो दिन पहले ही जयपुर जिले के पेट्रोल पम्पों की जांच के दौरान वाहनों में तय माप से कम ईंधन देने की कारगुजारी चौंकाने वाली है।
हरीश पाराशर
‘बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।’ कहने को तो यह कहावत बचत का संदेश देने वाली है। लेकिन पेट्रोल पम्प संचालकों ने शायद इसे ‘बूंद-बूंद से पेट भरता है’ समझ लिया है। दो दिन पहले ही जयपुर जिले के पेट्रोल पम्पों की जांच के दौरान वाहनों में तय माप से कम ईंधन देने की कारगुजारी चौंकाने वाली है। मीटर पर जीरो देखकर ही संतुष्ट हो जाने वाले उपभोक्ताओं को यह भान तक नहीं हो पाता कि उसे माप से कम पेट्रोल-डीजल दिया जा रहा है। इस पर भी तुर्रा यह कि उपभोक्ताओं को नसीहत दी जा रही है कि वे दो लीटर से कम पेट्रोल-डीजल न लें। मशीन इससे कम मात्रा लेने पर यह बता ही नहीं पाएगी कि पूरे पैसे लेकर भी उसे कितना कम पेट्रोल-डीजल दिया गया है।
जिन पेट्रोल पम्पों पर यह गड़बड़ी पकड़ी गई वह तो जयपुर जिले के महज एक दर्जन से कुछ ज्यादा पेट्रोल पम्पों की औचक जांच के दौरान सामने आई है। इस तरह की गड़बड़ी प्रदेश भर में कितनी हो रही होगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। हैरत की बात यह है कि यह जांच अभियान भी सरकारी निर्देश पर तब चलाया गया जब उसके पास कम पेट्रोल-डीजल देने की शिकायतें पहुंची। यह घोटाला न जाने कब से हो रहा है और न जाने अब तक कितनी चपत लगा चुके होंगे।
जांच दल का अपना गणित है। उसे भी सही मानें तो निरीक्षण के दौरान नींदड़ के एक ही पेट्रोल पम्प पर रोज 45 लीटर डीजल ग्राहकों को कम दिया जा रहा था। इसे एक माह का औसत भी आंके तो करीब एक लाख रुपए के डीजल की रकम पेट्रोल पम्प संचालकों की जेब में जा रही थी। उपभोक्ताओं को एक बार में प्रति लीटर कहीं तीस तो कहीं चालीस मिलीलीटर कम पेट्रोल-डीजल दिया जा रहा था।
इतनी बारीकी से की जा रही इस लूट को लेकर उपभोक्ता मामले का विभाग अब जाकर हरकत में आया है। अब कहा जा रहा है कि समूचे राजस्थान में पेट्रोल पम्पों की नियमित जांच की जाएगी। दोषी पाए जाने पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। यह ‘कठोर’ कार्रवाई कैसी होती है इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि कम पेट्रोल-डीजल देने वाले जिन तीन पेट्रोल पम्पों पर सिर्फ नोजल सील करने और मामूली जुर्माने की खानापूर्ति कर दी गई।
क्या इस फौरी कार्रवाई से पेट्रोल पम्पों पर गड़बडिय़ां थम जाएंगी? क्या पेट्रोल पम्प संचालक इसे अपने कर्मचारियों की गड़बड़ी बताकर बचने का प्रयास नहीं करते? और सवाल यह भी कि जिन उपभोक्ताओं से बरसों से ऐसी लूट की जा रही हो उनके नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
जांच चाहे मिलावट की हो या कम माप देने की। मामला चाहे दूध-पनीर, मिठाइयों का हो या मसालों का। या फिर पेट्रोल-डीजल का। सब जगह जिम्मेदारों ने ऐसी गलियां छोड़ रखी है कि अव्वल तो दोष साबित ही नहीं होता। और हो भी जाए तो जुर्माना या प्रतिष्ठान कुछ समय के लिए सीज करने जैसी मामूली कार्रवाई से घालमेल करने की फिर छूट मिल जाती है।
पेट्रोल पम्पों पर कम माप देने का घपला दरअसल जनता की जेब पर खुलेआम डाका है। यह सुनियोजित अपराध है जिसमें पम्प संचालक तकनीकी हेरफेर और कर्मचारियों की मिलीभगत से उपभोक्ताओं को ठगते हैं। मशीनों में चिप लगाकर माप में फेरबदल कर देना, नोजल को जल्दी बंद कर देना या मीटर को शून्य से शुरू न करना तो उस संगठित लूट का हिस्सा है जिसके जरिए हर माह लाखों रुपए डकारने का काम होता है।
सजा के प्रावधान सख्त होने चाहिए। ऐसी गड़बड़ी पाए जाने पर स्थायी रूप से पेट्रोल पम्पों का लाइसेंस रद्द होना जरूरी है। जिन पेट्रोल पम्पों पर गड़बडिय़ां पकड़ी जाती है उनकी जानकारी भी सार्वजनिक रूप से चस्पा होनी चाहिए ताकि उपभोक्ता सचेत रहें। मिलावट के मामलों में भी ऐसा ही करना होगा। सबसे ज्यादा जरूरी यह कि यदि सरकारी महकमों और तेल कंपनियों से जुड़े कार्मिक-अफसर इस घालमेल में लिप्त मिलें तो उन्हें भी नहीं बख्शा जाए।
एक बात और, उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा। वाहनों में पेट्रोल-डीजल भरवाते समय ध्यान रखें कि मीटर शून्य से शुरू हो, रसीद अवश्य लें। यदि धोखाधड़ी दिखे तो तुरंत शिकायत दर्ज करें ।