अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान या बांग्लादेश के सैनिक से सीधी आंखें बीएसएफ का जवान मिलाता है। सामान्यत: भारतीय सेना कई किलोमीटर पीछे तैनात रहती है। सीमा की बाड़ पर, ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में, माइनस 45 डिग्री सेल्सियस बर्फ में, 50 डिग्री के रेगिस्तान में खड़ा होता है, सीएपीएफ का जवान।
रजत मिश्रा, स्वतंत्र लेखक, उद्यमी एवं स्तंभकार
जब संसद पर गोलियां चलीं, ये आगे थे। पुलवामा में खून इनका बहा था। जब माओवादियों ने जंगल को अपना किला बनाया, इन्होंने तोड़ा। इन्होंने हिमालय में आंखें दिखाते चीन को घूरकर खदेड़ा। बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी को प्रशिक्षित किया। करगिल में सेना से पहले दुश्मन पहचाने और हमला किया। ऑपरेशन सिंदूर के वक्त पहली गोली खाई और पहले बम दागे। ये भारत के अर्धसैनिक बलों की गौरवशाली दास्तान है जिनके खुद के अफसरों को शायद नेतृत्व का हक भी न मिले। मान लीजिए एक ही साल तीन दोस्त तीन अलग-अलग सेवाएं जॉइन करते हैं। हो सकता है 15-17 वर्षों बाद सेना और पुलिस सेवा में चार प्रमोशन हो चुके हों और अर्धसैनिक बल का वह अफसर दोस्त उसी रैंक पर मिले, जिसमें उसने सेवा जॉइन की थी।
यह कोई कल्पना नहीं है। यह भारत के केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों- बीएसएफ, सीआइएसएफ, सीआरपीएफ, आइटीबीपी, एसएसबी के हजारों अधिकारियों की असली जिंदगी है। वही जो, सच मायनों में, भारत की पहली रक्षा पंक्ति हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान या बांग्लादेश के सैनिक से सीधी आंखें बीएसएफ का जवान मिलाता है। सामान्यत: भारतीय सेना कई किलोमीटर पीछे तैनात रहती है। सीमा की बाड़ पर, ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में, माइनस 45 डिग्री सेल्सियस बर्फ में, 50 डिग्री के रेगिस्तान में खड़ा होता है, सीएपीएफ का जवान। वह बीएसएफ का सिपाही, वह आइटीबीपी का अफसर। जहां राज्य पुलिस अकेले जाने से डरती है, वहां हर चुनाव में सीएपीएफ लोकतंत्र की रक्षा करता है।
टेलीविजन पर नजर नहीं आते, लेकिन दुश्मन को सबसे पहले इन्हीं की आंखें देखती हैं। ये सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं, खुफिया जानकारी भी इकट्ठा करते हैं, आपदा प्रबंधन करते हैं और साथ ही भारत की सॉफ्ट पावर तथा लोकतंत्र के भी परिचायक हैं। महिला जवान और अफसर भी इन्हीं जगहों और परिस्थितियों में वही ड्यूटी निभाती हैं। इनकी तैनाती की विविधता दुनिया में शायद ही कहीं मिले। एक अधिकारी छत्तीसगढ़ के जंगलों में माओवादियों से लोहा लेता है, फिर बंगाल की दलदली जमीन पर चुनाव करवाता है और अचानक कश्मीर की बर्फीली घाटियों में तैनात हो जाता है।
राज्यसभा डेटा के अनुसार तीन सालों (2019 से 2021) में दो हजार से अधिक सीएपीएफ जवान कर्तव्य की बलिवेदी पर शहीद हुए। किसी एक युद्ध में नहीं। आतंकवाद-रोधी अभियानों में कमान कोई दफ्तरी काम नहीं है। नेतृत्व या तो सामने से होगा या फिर होगा ही नहीं। सेना यह जानती है, इसलिए कर्नल जवान होते हैं। भारतीय सेना में एक अधिकारी 15 साल में कर्नल बन जाता है, अपनी बटालियन का कमांडिंग अफसर। सीएपीएफ में यही काम 52 वर्ष की आयु में सीओ बना अधिकारी 14,000 फुट की ऊंचाई पर कैसे करेगा? ये सीएपीएफ अफसर भी बलिदान में आगे हैं। 12000 की संख्या वाले अफसरों में 150 अब तक शहीद हो चुके हैं।
एक तथ्य जो ज्यादातर भारतीयों को चौंका देता है, सीएपीएफ अधिकारियों का चयन सीधे पीएससी करती है। वही पीएससी जो, आइएएस और आइपीएस चुनती है। देश की सबसे कठिन परीक्षा में सिद्ध हुए, सबसे तेज दिमाग। उसके बाद भी आपको नहीं लगता कि ये नेतृत्व के लायक हैं? सर्वोच्च न्यायालय ने यह समझा और मई 2025 के ऐतिहासिक फैसले में सीएपीएफ में आइजी और डीआइजी स्तर पर कैडर अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति में 'क्रमिक बढ़ोतरी' का आदेश दिया और सीएपीएफ कैडर को 'संगठित समूह-ए सेवा' की मान्यता दी। अक्टूबर 2025 में पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद, सरकार सीएपीएफ सामान्य प्रशासन और विनियमन विधेयक 2026 लेकर आई है जो कोर्ट के आदेश को उलट देगा।
यह इन अर्धसैनिक बलों के राजनीतिकरण और अफसरों के मनोबल तथा संगठनों की प्रभावशीलता में कमी का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। मनोबल कोई अमूर्त भावना नहीं है। यही वह अदृश्य शक्ति है जो एक जवान अफसर को माओवादी अड्डे पर धावा बोलने या बर्फानी तूफान में बॉर्डर पोस्ट थामे रखने की ताकत देती है। भारत ने हमेशा अपने अर्धसैनिक योद्धाओं से सब कुछ मांगा है- परिवार, सेहत, जवानी और जान तक। एक कृतज्ञ राष्ट्र का सबसे न्यूनतम फर्ज है, उन्हें नेतृत्व का अधिकार देना।