
गृह मंत्री अमित शाह की ओर से देश की संसद में नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में अहम उपलब्धि है। यह केवल हमारे सुरक्षा अभियानों की सफलता नहीं, बल्कि नक्सलवाद के खिलाफ उस लंबे संघर्ष का परिणाम भी है जिसमें नीति, प्रशासन और जनभागीदारी तीनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दशकों से भारत के कई हिस्सों, विशेषकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में फैली यह समस्या शासन और विकास को चुनौतियों का प्रतीक रही है। नक्सलवाद की जड़ें वर्ष 1960 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से शुरू हुईं, जहां से यह विचारधारा देश के करीब 200 जिलों तक फैल गई। यह क्षेत्र 'लाल गलियारा' के नाम से जाना जाने लगा।
सामाजिक-आर्थिक असमानता, विकास की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा ने इस आंदोलन को पनपने का अवसर दिया। परिणामस्वरूप यह केवल वैचारिक संघर्ष नहीं रहा, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई। एक ओर जहां सुरक्षा बलों ने सुनियोजित अभियान चलाए, वहीं दूसरी ओर सरकार ने विकास और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों का विश्वास जीतने का प्रयास किया। सड़कों, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार उन इलाकों तक किया, जो वर्षों से उपेक्षित थे। इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय आबादी का रुझान लोकतंत्र की ओर बढ़ा।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नक्सलवाद के कमजोर पडऩे में सुरक्षा बलों की भूमिका जितनी अहम रही, उतनी ही महत्वपूर्ण सरकार की नीतियां भी रहीं। लोगों को महसूस हुआ कि सरकार उनकी जरूरतों को समझ रही है और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रतिबद्ध है, तो उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी को प्राथमिकता दी। हालांकि, नक्सलवाद की समस्या खत्म हो गई है, पर इस तरह की विचारधारा को पूर्ण रूप से खत्म करने के लिए आवश्यक है कि उन मूल कारणों को जड़ से समाप्त किया जाए, जिनसे ऐसी समस्याएं जन्म लेती हैं। आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व कौशल विकास को प्राथमिकता देना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
इसके साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाएं, तो असंतोष फिर से जन्म ले सकता है। नक्सलवाद के खात्मे को स्थायी सफलता में बदलने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। विकास की रोशनी उन आखिरी गांवों तक पहुंचानी होगी, जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि देश के मानचित्र पर लाल गलियारा जैसा कोई शब्द फिर कभी न उभरे और भारत एक समावेशी, सुरक्षित और सशक्त राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ता रहे।
Updated on:
02 Apr 2026 01:44 pm
Published on:
02 Apr 2026 01:42 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
