
डॉ. अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)
कल्पना कीजिए कि आप अपनी जिंदगी की सबसे बेहतरीन 22-29 वर्ष की उम्र एक प्रतीक्षा कक्ष में बिता रहे हैं। आप शिक्षित, महत्वाकांक्षी और योग्य हैं, लेकिन जिस नौकरी का आप इंतजार कर रहे हैं, उसकी संभावना किसी लॉटरी से भी कम है। इसलिए आप और अधिक मेहनत के साथ फिर से प्रयास करते हैं और फिर इंतजार करते हैं। इस बीच आपके हमउम्र कमाने और पैसा बचाने लगे हैं, वे कॅरियर में आगे बढ़ रहे हैं, शादी कर रहे हैं और घर बसा रहे हैं, लेकिन आप इसकी बजाय बस अगली परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। आज भारत में लगभग 1.1 करोड़ युवा स्नातकों की जिंदगी की यही कड़वी हकीकत है।
इस महीने प्रकाशित अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया' रिपोर्ट का पांचवां संस्करण चौंकाता है- रिपोर्ट के अनुसार 20-29 वर्ष के बेरोजगार युवाओं में 67 प्रतिशत स्नातक हैं। वर्ष 2004 में यह आंकड़ा केवल 32 फीसदी था। पिछले दो दशकों में युवा आबादी में स्नातकों की हिस्सेदारी दस से बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई, लेकिन रोजगार वहीं ठिठका रहा। 2004 से 2023 के बीच भारत में हर साल लगभग 50 लाख स्नातक निकले, लेकिन हर साल केवल 28 लाख को ही कोई रोजगार मिला और मात्र 17 लाख को वेतनभोगी नौकरी मिली। यह राष्ट्रीय संसाधनों की भयावह बर्बादी है। इस आयु वर्ग के स्नातकों में बेरोजगारी दर लगभग 33 प्रतिशत है, पर तीस की उम्र के बाद यही दर चार प्रतिशत से नीचे आ जाती है।
यह गिरावट नौकरी मिलने में सफलता के कारण नहीं, बल्कि हताशा में नौकरी की आस ही त्याग देने से आती है। युवा पुरुष आर्थिक दबाव, शादी की बाध्यता या पारिवारिक जिम्मेदारियों के आगे घुटने टेककर जो भी काम मिलता है उसे कर लेते हैं, जबकि कई युवा महिलाएं निराश होकर अवैतनिक घरेलू जिम्मेदारियां संभाल लेती हैं। तो आखिर लाखों स्नातक अपने जीवन के महत्वपूर्ण साल अनिश्चितता की इस स्थिति में क्यों बिताते हैं? इसका कारण एक तार्किक, लेकिन सामाजिक रूप से विनाशकारी गणना है। निजी क्षेत्र में शुरुआती वेतन पिछले दो दशकों में लगभग स्थिर रहा है या घटा है। 2011 में एक युवा स्नातक की मासिक आय लगभग 21800 रुपए थी, जो 2023 में घटकर 19573 रह गई।
महंगाई के हिसाब से यह गिरावट किसी आपदा जैसी है। इसलिए शिक्षित युवा निजी क्षेत्र की शुरुआती नौकरियों से कतराते हैं। इसके विपरीत, सरकारी नौकरियां अधिक सुरक्षित और प्रतिष्ठापूर्ण हैं। एक सरकारी ड्राइवर भी निजी क्षेत्र के अपने समकक्ष से चार गुना अधिक कमा सकता है। सरकारी क्लर्क को स्वास्थ्य सुविधा, पेंशन, नौकरी का स्थायित्व और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए युवा लंबे इंतजार का जोखिम उठाते हैं। यह इंतजार सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की अंतहीन तैयारी का रूप ले लेता है। वर्ष 2018-19 में तमिलनाडु लोक सेवा आयोग की एक भर्ती में 1.37 करोड़ आवेदन आए। उस समय राज्य के लगभग 80 फीसदी बेरोजगार लोग किसी न किसी सरकारी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। यह प्रवृत्ति पूरे भारत में पाई जाती है- सरकारी परीक्षा एक महाप्रतीक्षालय बन चुकी है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप काम कर रहे हैं। लगभग आधे लोग ऐसे कामों में हैं जिनमें डिग्री की तो जरूरत है, पर कौशल विकास या कॅरियर उन्नति की कोई गुंजाइश नहीं। साल 2012-19 के बीच जीडीपी 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी, पर रोजगार वृद्धि मात्र 0.1 प्रतिशत रही। वर्ष 2021-24 के बीच सृजित 8.3 करोड़ नए रोजगारों में से लगभग आधे कृषि क्षेत्र में थे। श्रम कानूनों ने भी श्रमिकों की सुरक्षा करने के बजाय नियोक्ताओं को स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर आकस्मिक और अनुबंध आधारित श्रमिक रखने का बढ़ावा दिया। महिलाओं की स्थिति और गंभीर है। युवा महिलाएं काम करना चाहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीस साल की उम्र के शुरुआती वर्षों में शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी दर काफी ऊंची है, पर 29 साल की उम्र बीतते-बीतते वे रोजगार पाने के बजाय शादी-घरेलू जिम्मेदारियों के कारण श्रम बाजार से बाहर हो जाती हैं।
बेरोजगार स्नातकों के लिए सरकारें कैश ट्रांसफर और कोचिंग के लिए सब्सिडी मुहैया कराती हैं। इससे बजट पर दबाव बढ़ता और सरकारी भर्तियां घटती हैं। 2014-22 के बीच केंद्र सरकार में खाली पदों की संख्या 4.21 लाख से बढ़कर 9.64 लाख हो गई। सब्सिडी 'लॉटरी संस्कृति' को बढ़ावा देती है, जबकि भर्तियों पर रोक इसके मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है। जरूरत स्पष्ट नीतिगत बदलाव की है। बेहतर रोजगार सूचना प्रणाली, नियोक्ताओं की जरूरत के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण में सुधार, निजी नौकरियों में निश्चित अवधि के अनुबंध और व्यापक स्टाफिंग संरचना के जरिए सरकारी नौकरियों के प्रति अत्यधिक आकर्षण को कम करना और महिला कार्यबल की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। आज 1.1 करोड़ शिक्षित युवा जिंदगी के सबसे उत्पादक साल ऐसी 'लॉटरी' में गंवा रहे हैं, जिसमें उनके जीतने की संभावना कम है। यह न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन की बर्बादी है, बल्कि शिक्षा में किए सार्वजनिक निवेश की भी हानि है।
Published on:
02 Apr 2026 01:52 pm
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