महाराणा प्रताप ने जो श्रेष्ठ आदर्श स्थापित किए, वे न केवल इतिहास में अमर हैं, बल्कि आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वर्तमान परिस्थितियों में देश की नई पीढ़ी को महाराणा प्रताप के शौर्य, वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता एवं राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए मर मिटने और उनके आदर्शों को आत्मसात करने की शिक्षा और प्रेरणा लेनी चाहिए।

वासुदेव देवनानी
अध्यक्ष, राजस्थान विधानसभा
महाराणा प्रताप मेवाड़ के 13वें राणा और भारत के सबसे सम्मानित राजपूत शासकों में से एक थे। उनका जन्म अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 9 मई 1540 को मेवाड़-मारवाड़ की सीमा पर स्थित राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह द्वितीय के घर हुआ था लेकिन हिंदु कैलेंडर के अनुसार, महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम सम्वत 1597 में ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को माना जाता है, इसके अनुसार इस वर्ष 17 जून को महाराणा की 489 वीं जयंती के साथ ही हल्दीघाटी युद्ध की 450 वीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही है।
हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप
भारतीय इतिहास में कुछ युद्ध ऐसे हैं जिनका महत्त्व केवल उनकी सैन्य सफलता या असफलता से नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित आदर्शों और मूल्यों से निर्धारित होता है। 18 जून 1576 को मेवाड़ की धरती पर लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध ऐसा ही एक ऐतिहासिक संघर्ष था। कई इतिहासकार इस युद्ध को अनिर्णायक बताते हैं, क्योंकि युद्ध के बाद कोई स्पष्ट राजनीतिक या सैन्य परिणाम सामने नहीं आया। किंतु यदि इस युद्ध के उद्देश्य, उसके परिणाम और उसके दूरगामी प्रभावों का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप ही थे। महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच संघर्ष केवल दो शासकों का युद्ध नहीं था। यह स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद, स्वाभिमान और अधीनता, राष्ट्रधर्म और सत्ता विस्तार के बीच का संघर्ष था। अकबर ने राजपूताना के अधिकांश राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया था। आमेर सहित अनेक रियासतें मुगल सत्ता के अधीन आ चुकी थीं। केवल मेवाड़ ऐसा राज्य था, जिसने अपने गौरव और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। महाराणा प्रताप ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर दी थी कि वे किसी भी परिस्थिति में मेवाड़ की स्वतंत्रता का सौदा नहीं करेंगे। अकबर ने कई बार दूत भेजकर महाराणा प्रताप को समझाने का प्रयास किया। राजनयिक वार्ताएं हुईं, समझौते के प्रस्ताव आए, लेकिन महाराणा प्रताप अपने संकल्प पर अडिग रहे। अंतत: अकबर ने सैन्य शक्ति के माध्यम से मेवाड़ को झुकाने का निर्णय लिया। इसी का परिणाम था 18 जून 1576 को हुआ हल्दीघाटी का युद्ध।
वीरता का प्रतीक चेतक
इस युद्ध में हल्दीघाटी की संकरी घाटी में महाराणा प्रताप की सेना और मुगल सेना आमने-सामने हुईं। मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे। संख्या और संसाधनों की दृष्टि से मुगल सेना कहीं अधिक शक्तिशाली थी, जबकि महाराणा प्रताप के पास सीमित सैनिक और साधन थे। इसके बावजूद मेवाड़ की सेना ने असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया। युद्ध के प्रारंभिक चरण में राजपूतों और भील योद्धाओं ने मुगल सेना को भारी क्षति पहुंचाई। युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप का साहस अद्वितीय था। अपने प्रिय नीले-सफेद अश्व चेतक घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सीधे शत्रु सेना के केंद्र पर हाथी पर सवार मुगल सेनापति मानसिंह पर आक्रमण किया। चेतक का वह प्रसिद्ध पराक्रम, जिसमें उसने हाथी पर छलांग लगाकर अपने स्वामी को आक्रमण का अवसर प्रदान किया, आज भी भारतीय वीरता का प्रतीक माना जाता है। यद्यपि युद्ध के दौरान चेतक गंभीर रूप से घायल हो गया और एक 25 फीट चौड़े बरसाती नाले से छलांग लगा महाराणा प्रताप की जीवन रक्षा के बाद में उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसने प्रताप का पीछा कर रहे मुगल सैनिकों से अपने स्वामी का जीवन बचाकर निष्ठा और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। हल्दीघाटी के युद्ध में अनेक वीर सेना नायकों, राजपूत सरदारों, भील योद्धाओं और सहयोगी राजाओं का सामूहिक पराक्रम महाराणा प्रताप की ताकत बना। विशेष रूप उनके प्रिय चेतक घोड़े एवं झाला मान सिंह का बलिदान, भामाशाह का त्याग, हकीम खान सूर की वीरता, राणा पुंजा भील का समर्पण भारतीय इतिहास में पराक्रम, स्वामिभक्ति, त्याग, बलिदान और राष्ट्रनिष्ठा के अमर उदाहरण हैं।
‘मेवाड़ का मैराथन’ दिवेर युद्ध
हल्दीघाटी युद्ध के बारे में अक्सर कहा जाता है कि मुगल सेना युद्धभूमि पर बनी रही लेकिन इतिहास का गहन अध्ययन करने वाले इतिहासकारों के अनुसार हकीकत में मुगल सम्राट अकबर के सेनापति मानसिंह, महाराणा प्रताप के भीषण हमले से दहशत में आकर मैदान छोड़ भाग गए थे। किसी भी युद्ध की सफलता का मूल्यांकन उसके मूल उद्देश्य की प्राप्ति से किया जाता है। अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को बंदी बनाना, मेवाड़ को पूरी तरह अपने अधीन करना और प्रताप को मुगल सत्ता के सामने झुकाना था। इनमें से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। महाराणा प्रताप न तो बंदी बने, न उन्होंने आत्मसमर्पण किया और न ही मेवाड़ की स्वतंत्रता समाप्त हुई। इसके विपरीत महाराणा प्रताप युद्ध के बाद भी संघर्षरत रहे। यदि हल्दीघाटी में उनकी हार हुई होती तो वे युद्ध के बाद सक्रिय प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं होते। उन्होंने अरावली के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहकर संघर्ष जारी रखा। घास की रोटियां खाकर, जंगलों में जीवन व्यतीत करके और असंख्य कठिनाइयों का सामना करके भी उन्होंने स्वतंत्रता की ज्योति को बुझने नहीं दिया। महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने युद्ध के बाद अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया। भामाशाह जैसे राष्ट्रभक्त सहयोगियों ने उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की। राणा पुंजा के नेतृत्व में भील समुदाय ने उनका हर कदम पर साथ दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी सेना को पुन: संगठित किया और मुगल चौकियों पर आक्रमण आरंभ कर दिए। 1582 में दिवेर का युद्ध इस संघर्ष का महत्त्वपूर्ण पड़ाव बना। इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को पराजित कर मेवाड़ के अधिकांश भाग को पुन: मुक्त करा लिया। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है।
महाराणा प्रताप ने माना स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य
हल्दीघाटी के छह वर्ष बाद प्राप्त यह विजय सिद्ध करती है कि महाराणा प्रताप की शक्तिसमाप्त नहीं हुई थी, बल्कि वे और अधिक दृढ़ होकर उभरे थे। हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी मुगल सम्राट अकबर ने कई वर्षों तक मेवाड़ को पूरी तरह जीतने का प्रयास किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अकबर के जीवनकाल में चित्तौडग़ढ़ और मांडलगढ़ को छोडक़र मेवाड़ का अधिकांश क्षेत्र पुन: महाराणा प्रताप के नियंत्रण में आ गया था। यह तथ्य स्वयं सिद्ध करता है कि अंतत: सफलता किसे प्राप्त हुई। महाराणा प्रताप की विजय का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष नैतिक और वैचारिक विजय थी। उस समय जब अनेक शासक अपनी सत्ता और सुविधाओं के लिए मुगल दरबार की अधीनता स्वीकार कर चुके थे, तब महाराणा प्रताप ने स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य माना। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वाभिमान किसी भी साम्राज्य की शक्ति से बड़ा होता है। उनके लिए राज्य का वैभव और सुख -सुविधाएं भोगना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का सम्मान महत्त्वपूर्ण था। महाराणा प्रताप की इसी भावना ने उन्हें भारतीय जन मानस का अमर नायक बना दिया। यदि किसी युद्ध का विजेता केवल वह होता जो युद्धभूमि पर अंतिम क्षण तक खड़ा रहे, तो इतिहास में अनेक आक्रमणकारी महान कहलाते। लेकिन इतिहास उन लोगों को अधिक सम्मान देता है जिन्होंने अपने आदर्शों की रक्षा की। महाराणा प्रताप ने जीवन भर संघर्ष किया, किंतु कभी पराधीनता स्वीकार नहीं की। यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी। हल्दीघाटी में मौजूद शिलालेखों में भी यह उल्लेख मिलता है कि हल्दीघाटी युद्ध के असली विजेता महाराणा प्रताप ही थे।
‘पग पग भम्या पहाड,धरा छोड राख्यो धरम।’
‘महाराणा मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै॥’
महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युद्ध का वास्तविक विजेता मानने के पक्ष में मौटे रूप से 9 प्रमुख बिंदु गिनाए जा सकते है ।
अकबर का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हुआ- मुगल सम्राट अकबर का लक्ष्य महाराणा प्रताप को बंदी बनाना या उनकी अधीनता स्वीकार करवाना था। युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप स्वतंत्र रहे और मुगलों के हाथ नहीं आए।
महाराणा प्रताप ने आत्मसमर्पण नहीं किया- हल्दीघाटी के बाद भी महाराणा प्रताप ने कभी मुगल सत्ता के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। जीवन के अंतिम क्षण तक वे स्वतंत्र शासक बने रहे।
मेवाड़ का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ- यदि मुगलों की निर्णायक विजय होती तो मेवाड़ का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेवाड़ स्वतंत्र रहा और संघर्ष जारी रहा।
युद्ध के बाद प्रतिरोध जारी रहा- हारने वाला पक्ष सामान्यत: प्रतिरोध की क्षमता खो देता है, जबकि महाराणा प्रताप ने युद्ध के बाद भी मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा और अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया।
दिवेर युद्ध में निर्णायक सफलता- 1582 के दिवेर युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों को ध्वस्त कर मेवाड़ के बड़े भाग को पुन: मुक्त करा लिया। यह हल्दीघाटी के संघर्ष की दीर्घकालिक सफलता थी।
अधिकांश मेवाड़ पर पुन: अधिकार- अपने जीवनकाल में महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोडक़र मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर पुन: नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
अकबर को बार-बार अभियान चलाने पड़े- यदि हल्दीघाटी में मुगलों की पूर्ण विजय हुई होती तो अकबर को बार-बार मेवाड़ के विरुद्ध अभियान नहीं चलाने पड़ते। लगातार सैन्य प्रयासों के बावजूद वह महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका।
नैतिक और वैचारिक विजय- हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की नैतिक और वैचारिक विजय हुई। वे स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रगौरव के प्रतीक बनकर उभरे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि दृढ़ संकल्प के साथ सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मसम्मान की रक्षा की जा सकती है।
इतिहास और जनमानस ने प्रताप को विजेता माना- आज भारत में हल्दीघाटी का स्मरण होते ही वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में महाराणा प्रताप का नाम लिया जाता है, जबकि मुगलों की और से युद्ध का नेतृत्व करने वालों को वैसी लोक स्वीकृति नहीं मिली। जनमानस की स्मृति में प्रताप ही इस संघर्ष के नायक और विजेता हैं। हल्दीघाटी का युद्ध सैन्य दृष्टि से भले अनिर्णायक माना जाए, लेकिन अकबर का उद्देश्य विफल होना, महाराणा प्रताप का कभी अधीनता स्वीकार न करना, दिवेर की विजय, मेवाड़ की पुनप्र्राप्ति और स्वतंत्रता के आदर्श की रक्षा ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि महाराणा प्रताप ही हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक विजेता थे।
विजय, स्वतंत्रता और आत्म सम्मान के प्रतीक महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप की 489 वीं जयंती और हल्दीघाटी युद्ध की 450 वीं वर्षगांठ पर आज हर भारतीय के मन मानस में महाराणा प्रताप के साहस, त्याग, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की भावना जीवंत है और उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने सिद्धांतों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना ही सच्चा पुरुषार्थ है। हल्दीघाटी का युद्ध इसी अमर संदेश का प्रतीक है। अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हल्दीघाटी का युद्ध भले ही सैन्य दृष्टि से अनिर्णायक रहा हो, लेकिन उसके वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप ही थे। यही कारण है कि चार शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी महाराणा प्रताप भारतीय जनमानस में विजय, स्वतंत्रता और आत्म सम्मान के सबसे उज्ज्वल प्रतीक बने हुए हैं। हल्दीघाटी जाने वाले श्रद्धालु और पर्यटक यहां की पीले रंग की मिट्टी को अपने मस्तिक पर लगाते है और साथ ले जाकर अपने पूजा घरों में उसकी पूजा करते है।
हमारे प्रधानमंत्री नरंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सैनिकों को संबोधित अपने भाषण में महाराणा प्रताप के बहादुर घोड़े चेतक की गति और सटीक वार से आधुनिक भारतीय हथियारों से दिलचस्प तुलना की और कहा कि ‘कौशल दिखलाया चालों में, उड़ गया भयानक भालों मेंज्राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था’ ये बात आज के आधुनिक भारतीय हथियारों पर सटीक बैठती हैं।
‘महाराणा प्रताप’ के स्थान पर ‘अकबर महान’ के पाठ होने से होती थी पीड़ा
मुझे प्रारंभ से ही स्कूली पुस्तकों में ‘महाराणा प्रताप’ के स्थान पर ‘अकबर महान’के पाठ होने से बहुत पीड़ा होती थी। मुझे जब राजस्थान का शिक्षा मंत्री बनने का सौभाग्य मिला तो मैंने सर्वप्रथम राजस्थान के स्कूल पाठ्यक्रम में ‘अकबर महान’ के स्थान पर ‘महाराणा प्रताप महान’ सहित 200 महापुरुषों के अध्याय शामिल कराए। राजस्थान की नई पुस्तकों में ‘अकबर महान’ शीर्षक को हटाने और ‘महाराणा प्रताप’ को प्रमुख राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत करने का यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था। कई समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों ने उस समय इसे ‘अकबर नहीं, महाराणा प्रताप महान’के रूप में प्रकाशित और प्रसारित किया था।
महाराणा प्रताप का जीवनकाल भले ही सोलहवीं सदी में सीमित रहा हो, लेकिन उनकी विरासत भारत के जन-मन में जीवित है और वे आज भी हमारी आन, बान और शान के प्रतीक हैं। उनका नाम मात्र सुनते ही शौर्य, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावना जाग जाती है।
‘माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राणा प्रताप।’
‘अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै सांप॥’
महाराणा प्रताप ने जो श्रेष्ठ आदर्श स्थापित किए, वे न केवल इतिहास में अमर हैं, बल्कि आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वर्तमान परिस्थितियों में देश की नई पीढ़ी को महाराणा प्रताप के शौर्य, वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता एवं राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए मर मिटने और उनके आदर्शों को आत्मसात करने की शिक्षा और प्रेरणा लेनी चाहिए। आज जब हम राष्ट्र और समाज के निर्माण और विकास में जुटे हैं, तब महाराणा प्रताप की तरह निडर, आत्म सम्मानी और न्यायप्रिय बनना ही उनके प्रति हम सभी की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।