
केरल के स्कूलों में शुरू किया गया लिपस्टिक फ्री अभियान केवल एक शैक्षणिक पहल नहीं, बल्कि समय की एक गंभीर सामाजिक चुनौती का उत्तर है। इस अभियान के पीछे चिंता यह है कि आज स्कूल जाने वाले बच्चे भी आइलाइनर, फेस क्रीम, ब्लशर, लिपस्टिक और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए भी चिंता का विषय है। यह अभियान बच्चों को कॉस्मेटिक उत्पादों से दूर रखने के लिए चलाया जा रहा है।
वस्तुत: बचपन जीवन का वह दौर होता है जब व्यक्ति अपनी स्वाभाविक पहचान विकसित करता है। सोशल मीडिया, विज्ञापनों और मनोरंजन उद्योग ने सौंदर्य के ऐसे मानदंड स्थापित कर दिए हैं जिनके दबाव में बच्चे भी आ गए हैं। इस चमक-दमक ने यह धारणा पैदा कर दी है कि आकर्षक दिखना ही सफलता और स्वीकार्यता का आधार है। स्कूल और समाज में शरीर की बनावट और रंग को लेकर चर्चा होने लगी है। बच्चे भी अपनी वास्तविक पहचान से अधिक बाहरी रूप-रंग को महत्त्व देने लगे हैं। चिंता का दूसरा पक्ष स्वास्थ्य से जुड़ा है। अधिकांश कॉस्मेटिक उत्पादों में ऐसे रासायनिक तत्व पाए जाते हैं जो बच्चों की संवेदनशील त्वचा और शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। कम उम्र में इन उत्पादों का नियमित उपयोग एलर्जी, त्वचा रोग और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। हालांकि केवल कॉस्मेटिक उत्पादों पर रोक लगा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके पीछे समाज में बढ़ती बॉडी शेमिंग और रूप-रंग आधारित भेदभाव की प्रवृत्ति भी जिम्मेदार है। हाल में प्रकाशित एक शोध में यह तथ्य सामने आया कि किशोरावस्था में जिन्हें कम आकर्षक माना जाता है, उन्हें जीवन में अधिक तनाव का सामना करना पड़ता है। जाहिर है कि समाज आज भी व्यक्ति के बाहरी स्वरूप को महत्त्व देता है। कथित सौंदर्य की होड़ से बचाने के लिए बच्चों को यह समझाना होगा कि सुंदरता कोई पैमाना नहीं होता। दरअसल यह विषयपरक नहीं बल्कि वस्तुपरक बात है जो इस पर निर्भर नहीं करती कि किसे देखा जा रहा है बल्कि इस पर निर्भर है कि कौन देख रहा है? हर व्यक्ति की प्रतिभा, व्यवहार, संवेदनशीलता, मेहनत और चरित्र ही उनकी वास्तविक पहचान हैं।
भारतीय परंपरा भी संदेश देती है कि व्यक्ति का मूल्य उसके संस्कारों और कर्मों से तय होता है। आधुनिकता को अपनाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन इससे बचपन ही दिखावे की संस्कृति का शिकार बनने लगे, तो यह चिंताजनक है। केरल का यह अभियान एक सकारात्मक संदेश है। आवश्यकता केवल लिपस्टिक मुक्त स्कूलों की नहीं, बल्कि ऐसे वातावरण की है जहां बच्चों को यह विश्वास मिले कि वे जैसे हैं, वैसे ही सुंदर हैं।