सामयिक: भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना का प्रस्ताव है ‘मिग-47’
अजीत रानाडे
लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं
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मिग विमानों का अधिग्रहण और उनका संचालन भारत-रूस संबंधों के बहुत से आधारों में से एक महत्त्वपूर्ण आधार है। मिग-21 विमान 1960 के प्रारंभिक वर्षों से ही भारतीय वायु सेना का मेरूदंड बन चुका है और यह सोवियत संघ द्वारा भेजा जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण विमान था। 1971 के भारत-पाक युद्ध में मिग-21, तो 1999 के करगिल युद्ध में मिग-27 की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण रही। मिग विमानों के संचालन और रखरखाव का अनुभव भारत के स्वदेशी विमान कार्यक्रम में काम आया। हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का तेजस इसी विकास का परिणाम है। अब मिग-29 पर काम चल रहा है जो उत्कृष्ट वैमानिकी, राडार और हथियार प्रणाली से लैस है। हालांकि मिग-47 को लेकर कोई योजना नहीं है और कुछ लोग सुखोई-47 को मिग-47 समझ बैठते हैं। इसके अलावा भारत तेजस और रफाल विमान पर फोकस कर रहा है।
हम यहां बात करेंगे महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘मिग-47’ (मेक इंडिया ग्रेट बाइ 2047) के प्रस्ताव की, जो 2047 तक भारत को महान शक्ति संपन्न राष्ट्र बना सकता है। यह पीएम नरेंद्र मोदी की विकसित भारत 2047 की संकल्पना से मेल खाता है। मिग-47 हमारे देश का गौरव बढ़ाने की दिशा में आगे बढऩे के बारे में है। इससे पहले एक मूलभूत प्रश्न - क्या राष्ट्रवाद का चलन खत्म हो रहा है या फिर इसका पुनरुत्थान हो रहा है? भौगोलिक स्थितियों से जुड़े राष्ट्रों की अवधारणा संभवत: केवल तीन शताब्दियों पुरानी है, इसलिए राष्ट्र राज्य अपेक्षाकृत नई अवधारणा है। राष्ट्रवाद का प्रभाव कम होने के अनेक कारक हो सकते हैं, जैसे वैश्वीकरण, प्रौद्योगिकी व बहुराष्ट्रीय संघों का अस्तित्व जैसे यूरोपीय संघ, सीमा शुल्क संघ, सैन्य गठबंधन, व्यापार ब्लॉक आदि। राष्ट्रवादी भावनाएं अंतरराष्ट्रीय व बहु-सांस्कृतिक प्रभावों के बीच कम प्रभावी हो सकती हैं। यूके में हाल ही आए चुनाव परिणाम हो सकता है ब्रेग्जिट को पुन: निष्प्रभावी करने के लिए पड़े वोट का नतीजा हों। शरणार्थियों की आवाजाही व बड़ी संख्या में प्रवासियों की मौजूदगी भी राष्ट्रवाद को प्रभावित करती हैं, तो कुछ जगह शरणार्थी व आव्रजक विरोधी रवैया अपना कर भी राष्ट्रवाद का प्रदर्शन किया जाता है।
बेरोजगारी भी चिंता का विषय है, जिसकी वजह बाहरी लोगों को माना जाता है (जैसे भारत में बांग्लादेशी घुसपैठिए)। याद कीजिए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक अभियान चलाया था कि कैसे बफैलो से बेंगलूरु तक नौकरियां चुराई जा रही हैं? या चीन द्वारा चुराई जा रही हैं? इसके अलावा भू-राजनीति, सीमा पर संघर्ष, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा व युद्ध भड़काने जैसी बयानबाजी भी राष्ट्रवादी भावनाओं को आहत करती हैं। सोशल मीडिया इसमें अतिरिक्त भूमिका निभाता है। कुल मिलाकर अभी यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रवाद का चलन खत्म हो जाएगा या यह और भी अधिक मजबूत हो जाएगा। इसलिए पुन: ‘मिग-47’ पर लौटते हैं। इसके कुछ आर्थिक आयाम भी हैं। इनमें से एक है भारत की प्रति व्यक्ति आय को 20,000 डॉलर प्रति व्यक्ति तक पहुंचाना। इसके लिए अगले 25 वर्षों में राष्ट्रीय आय दस गुना हो जानी चाहिए। यानी प्रति वर्ष 9.6 प्रतिशत की वृद्धि दर (डॉलर में)। चूंकि रुपया एक मुद्रा के नाते स्थायी रह सकता है और मुद्रास्फीति के नियंत्रण में रहते मजबूत भी हो सकता है, यह वृद्धि दर असंभव नहीं है।
‘मिग-47’ का एक आयाम है ‘ईज ऑफ लिविंग’ यानी ‘सुगम जीवन’। इसका संबंध सुरक्षित व पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्धता, पर्यावरण अनुकूल संसाधनों से मकान निर्माण, शहरों में सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण वायु से है। चूंकि आय वृद्धि ऊर्जा से प्रेरित होगी, इसलिए यह अनिवार्य हो जाता है कि नवीकरण ऊर्जा विकास दो गुनी या तीन गुनी तेजी से हो। भारत सौर सहयोग का वैश्विक नेतृत्वकर्ता देश है। हमें लाखों छोटी ऑटोमोटिव रिचार्जेबल बैटरियों का उपयोग कर सौर ऊर्जा के रात्रि में संग्रहण की योजना बनानी चाहिए। इस तरह हम कार और स्कूटर बैटरियों की भूमिका को उलट सकते हैं। रात में उनसे घर की ऊर्जा जरूरतें पूरी हों और दिन में उन्हें सौर ऊर्जा से रिचार्ज किया जाए। हवा की गुणवत्ता मोटर व भवन निर्माण क्षेत्र में स्थायी रणनीति अपना कर सुधारी जा सकती है। भवन निर्माण क्षेत्र में सीमेंट का उपयोग होता है, जो कैल्शियम कार्बोनेट से बनती है। यह कार्बन डाइ ऑक्साइड का बड़ा स्रोत है। इसलिए भवन निर्माण क्षेत्र को कार्बन फुटप्रिंट कम करने की दिशा में काम करना होगा।
‘मिग-47’ का तीसरा आयाम है—शिक्षा, कौशल व प्रशिक्षण से मानव पूंजी का निर्माण तथा उत्पादकता एवं नवाचार क्षमताएं बढ़ाना। शिक्षा एवं कृषि क्षेत्र सुधारों से अछूते हैं। हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस दिशा में उठाया गया उचित कदम है। यहां एक प्रयोग किया जा सकता है। कैसा रहे, यदि वरिष्ठ प्रशासनिक कर्मियों के लिए अपने बच्चों को पांचवीं कक्षा तक की शिक्षा पंचायत या नगरपालिका के स्कूलों में दिलवाना अनिवार्य कर दिया जाए, क्यों न हर सरकारी स्कूल में शिक्षक-अभिभावक संघ सालाना शिक्षकों की कार्यकुशलता का जायजा ले। चौथा आयाम है—सत्ता का अनवरत विकेंद्रीकरण, सरकार के तीसरे टियर तक। यही वह स्तर है जो लोगों के सबसे नजदीक है। पर निर्णय लेने की स्वायत्तता, फंडिंग व कार्यान्वयन मामले में इसके पास सबसे कम शक्ति होती है। सत्ता जितनी केन्द्रीकृत होती है, उतने ही हम राजनीति में उलझने लगते हैं। इसलिए प्रशासन व सत्ता का विकेंद्रीकरण ही एकमात्र दीर्घगामी मार्ग है। पांचवां आयाम सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक है। हमारे देश को हर दृष्टि से अकल्पनीय विविधता का वरदान मिला है, और फिर भी हम दुनिया में सद्भाव और विविधता में एकता के प्रतीक हैं। यही ‘समन्वय’ भारत का दुनिया को सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश है।
(द बिलियन प्रेस)