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संपादकीय : जवाबदेही से नहीं बच सकतीं ई-कॉमर्स कंपनियां

मेटा और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों पर लगाया गया जुर्माना एक संदेश है- 'डिजिटल इंडिया' का अर्थ व्यापार का सरलीकरण ही नहीं, बल्कि नियमों का अनुपालन भी है।

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केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) का ई-कॉमर्स कंपनियों पर गलत तरीके से वॉकी-टॉकी बेचने का आरोप पहली नजर में सामान्य प्रक्रियात्मक उल्लंघन लग सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल गवर्नेंस की दृष्टि से इसके निहितार्थ गहरे हैं। सीसीपीए ने चार ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर 10-10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है, जिनमें 'फ्लिपकार्ट', 'अमेजन', 'फेसबुक मार्केट प्लेस' और भारतीय कंपनी 'मीशो' शामिल हैं। कम वॉकी-टॉकी बेचने वाले तीन प्लेटफॉर्म पर एक-एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है। पांच अन्य की जांच की जा रही है।

इन कंपनियों पर इंडियन टेलीग्राफ एक्ट व इंडियन वायरलेस टेलीग्राफी एक्ट का उल्लंघन कर 'इक्विपमेंट टाइप अपू्रवल' और लाइसेंस के बिना ही हाई फ्रीक्वेंसी वाले वॉकी-टॉकी बेचने का आरोप है। भारतीय डिजिटल बाजार में सुरक्षा मानकों और तकनीकी जवाबदेही के संदर्भ में यह चेतावनी भी है। भारत में वायरलेस उपकरणों की बिक्री और संचालन कड़े नियमों के अधीन हैं। इसका मुख्य कारण 'स्पेक्ट्रम' का प्रबंधन है। वॉकी-टॉकी जैसे उपकरण रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं। यदि ये उपकरण मानक नियमों और अधिकृत फ्रीक्वेंसी के बाहर काम करते हैं तो इससे सुरक्षा एजेंसियों, विमानन सेवाओं और आपातकालीन संचार प्रणालियों में हस्तक्षेप हो सकता है। हाल में जब संचार प्रणाली की कथित तकनीकी खामी के कारण भारतीय विमान सेवाएं लगभग ठप हो गई थीं तब भी किसी बाहरी हस्तक्षेप की आशंका जताई गई थी। सीमावर्ती क्षेत्रों या घनी आबादी वाले शहरों में अनाधिकृत वायरलेस संचार राष्ट्र-विरोधी तत्त्वों के लिए औजार बन सकता है। यहां सबसे बड़ा सवाल 'मध्यस्थ उत्तरदायित्व' का है। वर्षों से बड़ी टेक कंपनियां यह तर्क देकर अपनी जिम्मेदारी से बचती रही हैं कि वे केवल एक 'मंच' प्रदान करती हैं और वहां क्या बिक रहा है या क्या विज्ञापन दिया जा रहा है, इसके लिए विक्रेता सीधे तौर पर जिम्मेदार है, पर नए नियमों में यह तर्क अब स्वीकार्य नहीं है। मेटा और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों पर लगाया गया जुर्माना एक संदेश है- 'डिजिटल इंडिया' का अर्थ व्यापार का सरलीकरण ही नहीं, बल्कि नियमों का अनुपालन भी है।

ई-कॉमर्स कंपनियों को यह समझना होगा कि वे एक दुकान ही नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी कड़ी भी हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों से सीधे जुड़ी हैं। विक्रेताओं की पृष्ठभूमि की जांच और उत्पादों के तकनीकी प्रमाणन की पुष्टि करना उनकी जिम्मेदारी होनी चाहिए। अरबों डॉलर वाली कंपनियों को भारतीय कानून का पालन सुनिश्चित कराने के लिए महज 10 लाख का जुर्माना ही काफी नहीं। ऐसे मामलों में ज्यादा कड़ा दंड मिलना चाहिए। ताकि कंपनियां सुरक्षा के साथ समझौता करने को मुनाफे के गणित का हिस्सा न बना सकें। एक सुरक्षित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तभी बन सकता है जब तकनीक, व्यापार और कानून के बीच समन्वय हो।