
पूर्व कुलपति,(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा)
भारत के सांस्कृतिक जीवन में श्रीकृष्ण अद्भुत रूप से समावेशी चरितनायक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जो विराट होने के साथ ही सब किसी के साथ विलक्षण रूप से समरस भी हैं। अतिसूक्ष्म से अतिविराट के बीच फैली उनकी लीलाएं और उन लीलाओं के प्रत्येक दृश्य बच्चे, बड़े सबको अपने आकर्षण में बांध रखते हैं। श्रीकृष्ण का पूरा जीवन आमजन, भक्तों, कवियों और विचारकों के लिए रोचक उत्सुकता का विषय बना हुआ है और हर किसी को पाथेय के रूप में उससे कुछ-न-कुछ जरूर मिलता है पर पूरी तृप्ति नहीं होती है। हो भी कैसे! सरल, तरल, और साधारण से साधारण जन को सहज भाव से अपनाने वाले कृष्ण कन्हैया जैसा कोई और देवी देवता भी तो नहीं दिखता।
वस्तुत: श्रीकृष्ण पूर्णता को तलाशती भारत की मनीषा के ऐसे महास्वप्न हैं, जिनके साथ जुड़कर यथार्थ की धरती पर टिक कर भक्ति, ज्ञान और कर्म का ताना-बाना बुना जाता है और जीवन को गति मिलती रहती है। कर्मठ श्रीकृष्ण कोरे श्रमजीवी भी नहीं हैं। वे अखंड माधुर्य के विग्रह भी हैं जिनकी आह्लादकारी अनुभूति और स्मृति अपनी रसधार में भिगो कर भारतीय मानस को निरंतर ऊर्जा और शक्ति देती आ रही है। उनसे जुड़े मथुरा, ब्रज, नंदगांव, बरसाने, वृंदावन, श्रीनाथजी, बि_लजी, द्वारिका, खाटूश्याम आदि अनेक तीर्थ स्थल भक्तों के लिए सजीव बने हुए हैं। वहां नित्यप्रति कोई न कोई उत्सव चलता ही रहता है और रस के उद्रेक के साथ कृष्ण-रस चखने के लिए लोग आतुर बने आते रहते हैं। वेदव्यास, जयदेव, चैतन्य महाप्रभु, बल्लभाचार्य, मधुसूदन सरस्वती, सूरदास, मीरा, रसखान जैसे आचार्यों, संतों, भक्तों और कवियों ने कृष्ण को केंद्र में भक्ति के शास्त्र ही नहीं, गीत-संगीत, काव्य, चित्रकला आदि को समेटते हुए लोक-जीवन के स्पंदन का अनिवार्य हिस्सा बना दिया है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों के नृत्य रूप कृष्ण की महिमा बिखेरते हैं। उत्तर भारत का कथक और रास-लीला, मणिपुर की मणिपुरी, ओडिशा की ओडिसी, आंध्र की कुचिपुड़ी, छत्तीसगढ़ का पंडवानी, असम का सत्रिया, पश्चिम बंगाल का पुरुलिया छऊ, महाराष्ट्र और गोवा का दशावतार और बिठोवा से जुड़े वारकरी नृत्य, फुगडी और डिंडी नृत्य श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों और लीलाओं को आकार देते हुए कृष्ण के अनुभव का प्रत्यक्ष कराते हैं। सच कहें तो श्रीकृष्ण परिपूर्णता की प्रतिमूर्ति हैं और पूर्ण होने की शर्त ही है कि वह रचना अपने में सबको साथ लेकर और समेट कर चले।आखिर सर्वसमावेशी होकर ही तो कोई पूर्ण होने का दावा कर सकता है! पूर्ण रचना में विविध प्रकार के तत्व होंगे यहां तक कि जो एक दूसरे से भिन्न या विपरीत भी हों। पूर्णावतार श्रीकृष्ण सब कुछ के बीच अटल और अच्युत रहते हैं। वे बड़े ही गतिशील और उदार हैं पर मर्यादाओं का निर्वाह भी करते हैं। यदि प्रचलित मर्यादाएं लोक-संग्रह के विपरीत हैं तो उनको तोडऩे में भी देर नहीं लगाते। वे नई मर्यादा बनाते हैं और फिर जरूरत पडऩे पर उसका भी अतिक्रमण करने से नहीं चूकते। यह सब करते हुए सत्यान्वेषी श्रीकृष्ण को विश्राम का अवसर नहीं है। वे जीवन भर कहीं ज्यादा समय टिके नहीं दिखते।
चरैवेति-चरैवेति ही उनका जीवन-सत्य है। अविराम चलते रहना उनकी नियति है। अपने व्यवहार और विचार से कर्म की दुनिया को मथ कर वे क्रांति ले आने की चेष्टा करते हैं। जीवन की रक्षा और सवर्धन ही उनके धर्म हैं। धर्ममूलक चेतना समय से संवाद करती चलती है। श्रीकृष्ण अपने नेतृत्व में संस्कृति की स्थापना के लिए नवाचारों के प्रतिमान उपस्थित करते हैं।श्रीकृष्ण अपने अहं का विसर्जन करते हैं। वे योगीश्वर के रूप में जीवनमुक्त हैं और निर्लिप्त और परम ज्ञानी के रूप में गीता का गान करते हैं। वे जाने कितनों से जुड़े पर निस्संग भाव से। माता-पिता, घर-बार, प्रेमी (भक्त) हर कहीं उनकी साझेदारी है। वे सबके हैं पर उनको एकल प्रभुत्व प्रिय नहीं है। वे हर दीन, दुखी और त्रस्त प्राणी को सुखी देखना चाहते हैं। आखिर पूर्णता तभी आ सकेगी जब हम अंदर से खाली हों और सबको अपनाने की सदिच्छा हो। श्रीकृष्ण अपने आचरण द्वारा दया, दान, दक्षता, विद्या, विनय, क्षमा, धैर्य, संतोष, मैत्री, निरहंकारिता और परदु:खकातरता जैसे मानवीय गुणों का प्रतिमान स्थापित करते हैं। वीरता, साहस के साथ उन्होंने आततायियों के अपमान, मद, मिथ्यारोप व अहंकार को नष्ट करने में कोई देर नहीं की। लोक में रमते हुए भी श्रीकृष्ण लोकातीत हैं। श्रीकृष्ण भागवत धर्म के ऐसे उपदेष्टा हैं जिनके भक्त मोक्ष पाने की जगह सदा भक्त ही रहना चाहते हैं।