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संपादकीय: डिजिटल जासूसी के ‘नेत्र’ बंद करने की सार्थक पहल

घरों में भी जब सीसीटीवी कैमरा इंटरनेट से जुड़ा है, तो वह केवल हमें ही नहीं देख रहा होता, बल्कि उसे बनाने वाली कंपनी और उस देश की सरकार तक भी हमारी गतिविधि पहुंचने का डर रहता है। हालिया वैश्विक घटनाओं ने इस डर को सच साबित किया है।
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Updated: 1 Apr 2026, 2:01 PM IST
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लंबे समय से यह आशंका जताई जा रही है कि विदेशी तकनीकी उपकरणों के माध्यम से संवेदनशील सूचनाओं की जासूसी हो सकती है। चीन में बने बिना कड़े सर्टिफिकेशन वाले सीसीटीवी कैमरों की खरीद-बिक्री पर भारत सरकार का रोक लगाने का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम कहा जाएगा। कैमरे जैसे उपकरण सीधे निगरानी और डेटा संग्रहण से जुड़े होते हैं, इसलिए इनकी विश्वसनीयता और स्रोत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार का यह फैसला इस मंशा से जुड़ा है कि देश की निगरानी प्रणाली के 'नेत्र' किसी बाहरी दुश्मन के हाथ का खिलौना न बनें।

हालिया रिपोर्टों ने यह खौफनाक खुलासा किया कि भारतीय रेलवे स्टेशनों पर लगे कैमरों की लाइव फीड पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ तक पहुंच रही थी। चिंता इस बात की भी है कि अब तक कितनी गुप्त जानकारी और कितनी व्यक्तिगत बातें इन उपकरणों के जरिए अवांछित हाथों तक पहुंंच चुकी होंगी। घरों में भी जब सीसीटीवी कैमरा इंटरनेट से जुड़ा है, तो वह केवल हमें ही नहीं देख रहा होता, बल्कि उसे बनाने वाली कंपनी और उस देश की सरकार तक भी हमारी गतिविधि पहुंचने का डर रहता है। हालिया वैश्विक घटनाओं ने इस डर को सच साबित किया है।

ईरान-इजरायल संघर्ष में देखा गया कि कैसे इंटरनेट से जुड़े कैमरों को हैक करसाइबर हमले हुए। पेजर विस्फोट जैसी घटनाओं ने भी यह स्पष्ट किया कि संचार और निगरानी के लिए उपयोग किए जाने वाले हार्डवेयर में पहले से ही ट्रोजन हॉर्स यानी छिपे हुए खतरे फिट किए जा सकते हैं। यह स्थिति तब और खतरनाक हो जाती है जब कोई उपकरण विदेशी होता है। क्योंकि, उसका सॉफ्टवेयर और बैकएंड सर्वर हमारे नियंत्रण में नहीं होता। विडंबना यह है कि पिछले कुछ दशकों में अपनी सुरक्षा के लिए हम उन सस्ते उपकरणों पर निर्भर हो गए जो धीरे-धीरे खतरे में बदल गए।

हमने अनजाने में अपने बेडरूम, बोर्ड मीटिंग्स और रणनीतिक ठिकानों तक की चाबी उन कंपनियों को सौंप दी, जिनके सर्वर विदेशी धरती पर हैं। ऐसे में सवाल तो यही है कि इन खतरों को समझने में इतनी देरी आखिर क्यों हुई? किसी बड़े डेटा ब्रीच या सुरक्षा चूक सामने आने का इंतजार आखिर क्यों? देर से ही सही सरकार का फैसला सराहनीय है। नए नियमों के तहत अब केवल वही कैमरे बेचे जा सकेंगे, जो कड़े सुरक्षा परीक्षणों और डेटा एन्क्रिप्शन के मानकों पर खरे उतरेंगे। सुरक्षा ऑडिट को अनिवार्य करना डिजिटल जासूसी के जाल से बचाएगा। बहरहाल, डिजिटल जासूसी से बचाव केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, हमें भी अब सतर्क होना होगा। डिजिटल जासूसी से बचना है तो विदेशी स्मार्ट उपकरणों का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना होगा। निजता को सुरक्षित रखने का यह सही तरीका है।

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1 Apr 2026, 2:01 PM IST
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