डॉ. आंबेडकर को भारत के संविधान निर्माता के रूप में ही नहीं, बल्कि मजदूरों व शोषितों के मसीहा के रूप में भी जाना जाता है।
हेमंत सिंह, उप निदेशक, सूचना एवं जनसम्पर्क
भारतीय संविधान के निर्माता, शोषितों के मसीहा, नारी जाति के उद्धारक, युगदृष्टा, राष्ट्रभक्त, अद्भुत मेधा के धनी, समाज का भला करने की उत्कट इच्छा रखने वाले, स्वभाव से जुझारू, भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रेल, 1891 को महू मध्य प्रदेश में हुआ था।
इनका बचपन बहुत कष्टमय, छुआछूत व विपन्नता से परिपूर्ण था। श्रमिक वर्ग के अधिकारों की वकालत करना व उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना एवं विपरीत परिस्थितियों में सतत् संर्घषरत रहना उनकी नस-नस में रचा बसा था। डॉ. आंबेडकर को भारत के संविधान निर्माता के रूप में ही नहीं, बल्कि मजदूरों व शोषितों के मसीहा के रूप में भी जाना जाता है। ऐसे कालखंड में जब भारत में मजदूर आंदोलन कुछ महत्वपूर्ण दौर में था, उस समय बाबासाहेब ने श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए सतत् संघर्ष किया। 1920 के दशक में भारत में कम्युनिस्ट मजदूर संगठनों का प्रभाव था। इन संगठनों ने बंबई के कपड़ा मिल मजदूरों का 1924, 1925, 1928 एवं 1929 में मिलों में हड़ताल के लिए आह्वान किया। 43 कपड़ा मिलों के लगभग 75,000 कर्मचारियों ने हड़ताल में हिस्सा लिया। इसके बाद दूसरे बड़े आंदोलन के तहत श्रमिकों ने अप्रेल 1934 में कपड़ा मिलों में हड़ताल की। डॉ. आंबेडकर ने अपने ’बहिष्कृत भारत’ तथा ’जनता’ पत्रों के माध्यम से श्रमिकों को इन हड़तालों से दूरी बनाए रखने को कहा। क्योंकि यह राजनीति से प्रेरित थीं एवं श्रमिकों की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे इन हड़तालों पर जाएं क्योंकि इससे उन्हें तुरंत भुखमरी का सामना करना पड़ता था। ’सो, कम्युनिस्टों ने डॉ. आंबेडकर को मजदूरों का शत्रु घोषित कर दिया गया।
स्वतंत्र मजदूर दल : 1937 के प्रारंभ में भारत सरकार के 1935 के कानून के अनुसार प्रांतों को स्वायत्तता मिलने और नया राज्य शासन शुरू होने की संभावना से हर दल चुनाव लड़ने की तैयारी में था। डॉ. आंबेडकर ने भी सहयोगियों से विचार कर अगस्त 1936 में स्वतंत्र मजदूर दल स्थापित किया। उन्होंने उसका घोषणा पत्र भी जारी किया जिसमें आश्वासन दिया गया कि श्रमिकों के लिए कानून बनाना, नौकरियां देना, पदच्युत करना, कारखानों में भर्ती देना, काम के अधिकतम घंटे व वेतन श्रेणी अर्जित छुट्टी देना, सस्ते और आरोग्यदायी आवासों की व्यवस्था इत्यादि के बारे में कानून बनाए जाएंगे।
रेलवे मजदूरों का संगठन : 12 फरवरी, 1938 को मनमाड में अस्पृश्य रेलवे मजदूरों की एक परिषद् में 20,000 मजदूरों की उपस्थिति में बाबासाहेब ने कहा- किशोरावस्था में मैंने अपने रिश्तेदारों को खाने के डिब्बे पहुंचाने का काम किया था, मजदूरों की समस्या के बारे में मुझे सूक्ष्म जानकारी है। उन्होंने कहा कि आजतक हम अस्पृश्य या दलित के रूप में इकट्ठे होते थे। लेकिन आज हम मजदूर के रूप में इकट्ठा हुए हैं। कहा जाता है कि मैं मजदूरों का दुश्मन हूं। वास्तव में ब्राह्मणशाही और पूंजीवाद ही मजदूरों का दुश्मन हैं।
अस्पृश्य मजदूरों की समस्या : डॉ. साहेब कहते हैं कि ऐसी अनेक नौकरियां होती हैं जहां अस्पृश्यता के कारण अस्पृश्य मजदूरों को उनसे अलग किया जाता है। कपड़ा मिलों में कुछ विभागों में अस्पृश्य मजदूर नहीं लिए जाते। रेलवे में तो गैंग-मैन की नौकरी में ही सड़ते रहना उनकी तकदीर है। इतना ही नहीं उन्हें कुली भी नियुक्त नहीं किया जाता। अस्पृश्य मजदूरों को सबसे कम मजदूरी पर रखा जाता है, कोई उन्नति नहीं होती। किन्तु जैसे ही मंदी आती है, उनको सबसे पहले निकाला जाता है और जब मांग बढ़ती है तब सबसे अंत में रोजगार मिलता है।
कार्लमार्क्स का सिद्धांत भारत में अनुपयुक्त : बाबासाहेब बताते हैं कि जिस प्रकार कार्लमार्क्स ने समाज को मालिक तथा मजदूर के नाम से दो वर्गों में बांटा था, भारतीय परिस्थितियों में यह नितांत गलत है। इस तरह का विभाजन भारत में नहीं हो सकता। सभी मजदूरों को मिला कर एक वर्ग समूह बन जाता है, वह यहां संभव नहीं है। हम सभी मजदूरों का मिलाकर एक संगठित समूह यहां कैसे बना सकते हैं? मजदूरों के अंदर एक सामूहिक एकता लाने के लिए उनको यह समझाना होगा कि उनके आपस की जो सामाजिक दूरियां और अशुद्ध भेदभाव हैं, वे दूर होने चाहिए। मैंने किसी भी श्रमिक नेता को इस सामाजिक भेदभाव के विरोध में बोलते हुए नहीं देखा। कम्युनिस्टों द्वारा चलाए गए मजदूर आंदोलन के बारे में उन्होंने कहा कि मेरा कम्युनिस्टों से संबंध रखना बिल्कुल संभव नहीं है। मैं कम्युनिस्टों का कट्टर दुश्मन हूं। उनका ठोस मत था कि कम्युनिस्ट राजनीतिक ध्येय सिद्धि के लिए मजदूरों का शोषण करते हैं।
कांग्रेस के साथ मत भिन्नता : 16 मई, 1938 को चिपलूण की सभा में उन्होंने कहा कि “गांधी की मोहिनी विद्या मुझ पर प्रभाव नहीं डाल सकी। जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस गांधी की शरण में गये लेकिन मैं गांधी की शरण में कभी नहीं जाऊंगा। अगर किसी समय कांग्रेस में गया तो खुद की गुणवत्ता से वहां भी प्रभाव डालूंगा।“
पिछले दस मास से मेरा खोती उन्मूलन विधेयक कांग्रेस ने जान-बूझकर पीछे छोड़ रखा है। इसी दरम्यान मध्य प्रांत के कांग्रेस के बड़े नेताओं में डॉ. ना. भा. खरे को जबरदस्ती उपद्रवी ठहराकर खारिज कर दिया गया। डॉ. खरे को एक हरिजन मंत्री के बतौर लेने के संदर्भ में गांधीजी का विरोध था। जबकि गांधीजी ने डॉ. खरे के साथ मध्य प्रांत में हरिजन कार्य के लिए दौरा किया फिर भी गांधीजी ने डॉ. खरे को हरिजन मंत्री के रूप में लेने का कड़ा विरोध किया। सर्वेट ऑफ इंडिया सोसायटी में आयोजित सभा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. खरे ने कहा कि बहुमत के कारण राज्य शासन चलाने वाला दल भ्रष्ट बनता है। अपरिमित बहुमत से यह पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इस राजनीतिक सुक्ति की उन्होंने सभी को याद दिलाई।
औद्योगिक कलह विधेयक 1938 : 15 सितंबर, 1938 को बंबई विधानसभा में यह विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसका विरोध करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि यह नया कानून मजदूरों द्वारा की जाने वाली हड़तालों को गैर कानूनी बताकर प्रतिबंध लगा देगा, यह उचित तरीका नहीं होगा। यह विधेयक श्रमिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करेगा और यह असंवैधानिक है। डॉ. आंबेडकर ने उस समय की अन्य मजदूर यूनियनों के साथ मिलकर संघर्ष कर हड़ताल की और सफलता प्राप्त की। इस कार्य के लिए उन्होंने कम्युनिस्टों की शक्ति को भी साथ लेकर मजदूरों का हड़ताल के लिए आह्वान किया। लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल ने ठान लिया था कि यह विधेयक किसी भी हालत में मंजूर करा लेना है, और उन्होंने विधानसभा से उसे मंजूर करा ही लिया। कांग्रेस की इस दुराग्रही वृति का मजदूर संघों ने ’काला कानून’ कहकर विरोध किया। 7 नवंबर, 1938 को स्वतंत्र मजदूर दल और मिल मजदूर यूनियन एवं अन्य 60 विभिन्न मजदूर संघों ने मिलकर हड़ताल का शंखनाद किया। हड़ताल के एक दिन पहले सायंकाल लगभग 80,000 मजदूरों की एक प्रचंड सभा मजदूर मैदान, बंबई में हुई। उसकी नियंत्रण समिति में जमनादास अध्यक्ष व डॉ. आंबेडकर, डांगे, निमकर मिरजकर और प्रधान इस समिति के सदस्य चुने गए। 90 प्रतिशत स्वयंसेवक आंबेडकर के स्वतंत्र मजदूर दल के ही थे। 7 नवंबर की हड़ताल का महत्व इतना बढ़ गया कि संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के विख्यात किसान नेता स्वामी सहजानंद डॉ. आंबेडकर से बंबई में उनके निवास स्थान पर मिलने आए। उन्होंने उनसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एकता के लिए कांग्रेस के साथ मिलने का आग्रह किया। डॉ. आंबेडकर ने कहा कि कांग्रेस ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध पुकारा होता, तो मैं उस दल से मिल जाता, लेकिन यथार्थ में ऐसा नहीं है। कांग्रेस दल अपने हाथ में आए संविधानात्मक शासनतंत्र को पूंजीवादी और निरंतर स्वार्थ में लिप्त लोगों के कल्याण के लिए ही कार्यान्वित कर रही है। उसने किसान और मजदूर के कल्याण की बलि दे दी है। इस तरह के संगठनों में, मैं शामिल नहीं हो सकता। संविधान निर्माता के पूर्व श्रम मंत्री : बाबासाहेब आंबेडकर 1942-1946 के काल में वायसराय की काउंसिल में श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते रहे। इस सीमित कालखंड में बाबासाहेब ने दलित श्रमिक वर्ग के कल्याण के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने मजदूर तथा मालिकों को मिलाकर औद्योगिक क्षेत्र के लिए नई-नई नीतियां स्थापित की।