
इस गर्मी में महज कुछ ही हफ्तों के अंतराल में यूरोप का सबसे बड़ा लड़ाकू विमान कार्यक्रम ढह गया, जबकि परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के क्षेत्र में फ्रांस और जर्मनी का सहयोग एक नए उच्च स्तर पर पहुंच गया। इन दोनों घटनाओं का विरोधाभास बताता है कि यूरोप में रक्षा सहयोग वास्तव में किस तरह काम करता है। 8 जून को जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संयुक्त रूप से विकसित किए जाने वाले लड़ाकू विमान की योजना को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया। यह विमान फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम का हिस्सा था। फ्रांस, जर्मनी और स्पेन की यह परियोजना कई वर्षों से चल रही थी। इसकी कुल लागत करीब 100 अरब यूरो आंकी गई थी। लेकिन इसमें शामिल कंपनियों के बीच मतभेद इतना बढ़ गया कि परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। लेकिन इसके ठीक पांच सप्ताह बाद, 16 जुलाई को फ्रांस का परमाणु क्षमता से लैस एक राफेल लड़ाकू विमान दोनों देशों के इतिहास में पहली बार जर्मनी के एक सैन्य हवाई अड्डे पर उतरा। इसके एक दिन पहले ही उसने जर्मनी के यूरोफाइटर विमानों के साथ हवा में ईंधन भरने का अभ्यास किया था। यानी दोनों घटनाओं में वही दो सरकारें थीं। फिर भी एक साझेदारी टूट गई, जबकि दूसरी और मजबूत हो गई। लड़ाकू विमान परियोजना क्यों विफल हुई?
दरअसल यह परियोजना एक विवाद के कारण संकट में फंस गई। फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी डसॉल्ट एविएशन कार्यक्रम में नेतृत्व की भूमिका चाहती थी। वह लड़ाकू विमान में फ्रांस की जरूरतों के अनुसार कुछ विशेष क्षमताएं भी चाहती थी। दूसरी ओर, जर्मनी की साझेदार कंपनी एयरबस चाहती थी कि काम, तकनीक और उत्पादन का बंटवारा अधिक संतुलित हो। दोनों पक्षों में से कोई भी दूसरे की शर्तें स्वीकार करने को तैयार नहीं था। कई महीनों तक विवाद सुलझाने की कोशिश हुई, लेकिन अंतत: पेरिस और बर्लिन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि दोनों कंपनियों के बीच गतिरोध खत्म नहीं किया जा सकता। असल विवाद केवल कंपनियों के बीच काम के बंटवारे का नहीं था। इसके पीछे एक बड़ा सवाल यह था कि फ्रांस अपनी उस सैन्य क्षमता पर कितना राष्ट्रीय नियंत्रण छोडऩे को तैयार है, जिसे वह अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है? यह पहली बार नहीं था, जब फ्रांस इसी तरह के कारणों से किसी यूरोपीय लड़ाकू विमान परियोजना से बाहर हुआ हो। 1985 में भी फ्रांस उस बहुराष्ट्रीय कार्यक्रम से अलग हो गया था, जिसने बाद में यूरोफाइटर को जन्म दिया।
उस समय भी विवाद विमान की अलग-अलग सैन्य जरूरतों, औद्योगिक हितों और इस सवाल को लेकर था कि विमान के विकास का नेतृत्व किसके हाथ में होगा। फ्रांस ऐसा विमान चाहता था, जिसे विमानवाहक पोत से भी संचालित किया जा सके और जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हो। कार्यक्रम से अलग होने के बाद फ्रांस ने अपना राफेल विमान विकसित किया। यही वह विमान है जो इस साल जुलाई में जर्मनी पहुंचा था। 41 साल बाद फ्रांस ने एक बार फिर अपनी महत्वपूर्ण सैन्य क्षमता पर राष्ट्रीय नियंत्रण को प्राथमिकता दी। हालांकि इस बार तकनीकी जरूरतें बदल चुकी थीं और साझेदार भी अलग थे, लेकिन फ्रांस का मूल रुख नहीं बदला था। परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के मामले में फ्रांस के सामने ऐसी दुविधा नहीं है। इसलिए दोनों देशों के बीच सहयोग आगे बढ़ सकता है। मार्च में जब राष्ट्रपति मैक्रों ने जर्मनी के साथ परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पर नए रणनीतिक संवाद की घोषणा की, तो उन्होंने साफ कर दिया था कि फ्रांस की परमाणु रणनीति पर अंतिम नियंत्रण फ्रांस का ही रहेगा। जर्मनी के साथ बातचीत हो सकती है, एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का दौरा हो सकता है, संयुक्त सैन्य अभ्यास हो सकते हैं लेकिन फ्रांस के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का अंतिम फैसला कौन करेगा? इसका साफ जवाब है-फ्रांस। मैक्रों के पूर्व वरिष्ठ सैन्य सलाहकार बर्नार्ड रोजेल ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, 'मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के लिए हमारे पास 27 अलग-अलग 'बटन' हों।' विश्वसनीयता के लिहाज से ऐसी व्यवस्था काम नहीं कर सकती। यही वजह है कि परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के क्षेत्र में सहयोग आगे बढ़ सकता है, जबकि लड़ाकू विमान की परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि जर्मनी चुपचाप लड़ाकू विमान परियोजना की विफलता को स्वीकार करके बैठने वाला नहीं है। वह अब बर्लिन ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम में शामिल होने पर विचार कर रहा है। यह ब्रिटेन, इटली और जापान की संयुक्त लड़ाकू विमान परियोजना है। इसे आधिकारिक रूप से 2022 में शुरू किया गया था। इसमें एक दिलचस्प बात है कि यह ऐसा कार्यक्रम है जो ब्रिटेन को उसके यूरोपीय और एशियाई साझेदारों के साथ जोड़ता है, अब जर्मनी को फिर ब्रिटेन के साथ ला सकता है। यह प्रोग्राम रक्षा सहयोग का अलग मॉडल प्रस्तुत करता है। शुरुआत से ही तीनों देशों ने बराबरी की साझेदारी पर सहमति बनाई थी और नेतृत्व की जिम्मेदारियां भी उसी हिसाब से बांटी गईं। इस कार्यक्रम की संयुक्त सरकारी संस्था का मुख्यालय ब्रिटेन में है, लेकिन उसके पहले प्रमुख जापान से हैं। वहीं औद्योगिक स्तर पर बने संयुक्त उपक्रम का शुरुआती नेतृत्व इटली के पास है। लड़ाकू विमान परियोजना में जो सवाल विवाद का कारण बना, पूरे सिस्टम के विकास का नेतृत्व किसके हाथ में होगा? उसे ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम में शुरू से ही अलग तरीके से व्यवस्थित किया गया है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि फ्रांस और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग पूरी तरह विफल हो जाएगा। लड़ाकू विमान परियोजना के अंत से यह निष्कर्ष निकालना न केवल जल्दबाजी होगी, बल्कि गलत भी होगा कि दोनों देश साथ मिलकर काम नहीं कर सकते। परमाणु प्रतिरोधक क्षमता, वायु रक्षा और कई छोटी रक्षा परियोजनाओं में दोनों देश सहयोग कर रहे हैं। इन परियोजनाओं में राष्ट्रीय संप्रभुता का सवाल दांव पर नहीं है। लेकिन ग्रीष्मकाल की घटनाओं ने दोनों देशों के बीच सहयोग की असल सीमा को जरूर साफ कर दिया है। यूरोप महाद्वीप की ये दो बड़ी सैन्य शक्तियां एक साझा रणनीति बना सकती हैं। वे एक-दूसरे के हवाई अड्डों और रनवे का इस्तेमाल कर सकती हैं। परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लड़ाकू विमान को एक-दूसरे के क्षेत्र के ऊपर उड़ाने के मार्ग पर भी सहमत हो सकती हैं। वे संयुक्त रूप से सैन्य क्षमताएं विकसित कर सकती हैं और औद्योगिक जिम्मेदारियां भी साझा कर सकती हैं। लेकिन अब तक वे उस अंतिम निर्णय को साझा नहीं कर पाई हैं, जिसे कोई देश अपनी सैन्य संप्रभुता का हिस्सा मानता है। यही वह सीमा है, जहां यूरोपीय रक्षा सहयोग की वास्तविक परीक्षा होती है।