
अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट बता रही है कि देश के बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान मजबूत हो रहे हैं, उनके फंसे हुए कर्ज (एनपीए) लगातार घट रहे हैं और बैलेंस शीट बेहतर हो रही है। लेकिन दूसरी ओर करोड़ों भारतीय परिवारों की आर्थिक हालत कमजोर होती जा रही है। यानी बैंक तो स्वस्थ हैं, लेकिन उनके ग्राहक धीरे-धीरे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। दिसंबर 2025 में भारत का घरेलू कर्ज जीडीपी के 47.8 प्रतिशत पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर यह आंकड़ा बहुत अधिक नहीं है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह कर्ज आखिर लिया किसलिए जा रहा है और उसे चुकाया कैसे जाएगा। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब अधिकांश लोग घर बनाने, कारोबार शुरू करने या शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों के लिए ऋण ले रहे हैं। मकान का ऋण एक संपत्ति खड़ी करता है, व्यापार का ऋण भविष्य में आय का जरिया बनता है और शिक्षा का ऋण रोजगार की संभावना बढ़ाता है। लेकिन लोग इनकी बजाय पुराने कर्ज की किस्त भरने के लिए नया ऋण ले रहे हैं।
आरबीआइ के अध्ययन से पता चलता है कि लगभग तीन-चौथाई नए खुदरा ऋण दस लाख रुपए से कम वार्षिक आय वाले परिवारों ने लिए हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि दिसंबर 2025 में जितने नए कर्ज डूबे, उनमें लगभग 78 प्रतिशत इन्हीं कम आय वाले परिवारों के थे। स्पष्ट है कि सबसे अधिक आर्थिक दबाव उसी वर्ग पर पड़ रहा है, जिसके पास संकट झेलने की क्षमता सबसे कम है। जबकि बड़े उद्योगों और कंपनियों के कर्ज पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित हो गए हैं। बैंक भी राहत में हैं कि उनका कुल एनपीए घट रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि असली जोखिम अब कॉर्पोरेट क्षेत्र से हटकर गरीब और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों पर आ गया है। पिछले दो वर्षों में माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र भी कठिन दौर से गुजरा। लगातार सात तिमाहियों तक माइक्रोफाइनेंस ऋण घटते रहे और लाखों लोग इस व्यवस्था से बाहर हो गए।
इसका कारण यह नहीं था कि गरीबों को ऋण की जरूरत नहीं रही। असल वजह यह थी कि कुछ वर्षों तक तेजी से ऋण बांटने, एक ही व्यक्ति द्वारा कई संस्थानों से कर्ज लेने और बढ़ती चूक के बाद नियम कड़े कर दिए गए। एक व्यक्ति को सीमित संख्या में संस्थानों से ही ऋण लेने की अनुमति दी गई और कुल असुरक्षित ऋण की सीमा भी तय कर दी गई। बैंकों ने भी इस क्षेत्र में अपने ऋण कम कर दिए। लेकिन गरीब परिवारों की जरूरतें तो खत्म नहीं हुईं। नतीजतन, वे सबसे आसान विकल्प की ओर चल पड़े- गोल्ड लोन यानी घर में रखे सोने को गिरवी रखना। मार्च 2024 के बाद से गोल्ड लोन की वृद्धि दर 42 प्रतिशत से अधिक रही है, जो अन्य खुदरा ऋणों की तुलना में लगभग दोगुनी है। सोना गिरवी रखने की व्यवस्था बैंकों के लिए सुरक्षित है। यदि कर्जदार कर्ज नहीं चुका पाए तो गहनों की नीलामी करके पैसा वसूला जा सकता है। लेकिन भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि मुश्किल समय में अंतिम आर्थिक सुरक्षा है। जब कोई परिवार बार-बार उसी सुरक्षा को गिरवी रखकर पुराने कर्ज चुका रहा हो तो यह समृद्धि नहीं, आर्थिक मजबूरी का संकेत है।
आरबीआइ ने छोटे गोल्ड लोन पर ऋण-से-मूल्य (एलटीवी) अनुपात 85 प्रतिशत तक रखने की अनुमति दी है ताकि गरीब लोगों को आसानी से ऋण मिल सके। लेकिन यदि भविष्य में सोने की कीमतों में और गिरावट आती है तो यह सुरक्षा भी कमजोर पड़ सकती है। इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू बचत है। ऋण परिवार की देनदारी होता है, जबकि बचत उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत। महामारी के बाद शुद्ध घरेलू बचत काफी गिर गई थी। अब इसमें कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन इसका बड़ा कारण यह है कि नए कर्ज की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है। फिर भी कम आय वाले परिवारों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वे नया ऋण लेकर पुराना ऋण चुकाने और रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए मजबूर हैं। इस स्थिति का व्यापक आर्थिक प्रभाव भी है। जब लोग कर्ज लेकर खर्च करते हैं तो बाजार में मांग तो बनी रहती है, लेकिन बाद में उसी ऋण की किस्तें उनकी आय का बड़ा हिस्सा खा जाती हैं। परिणामस्वरूप भविष्य में उपभोग घटने लगता है। साथ ही जब परिवार कम बचत करते हैं तो बैंकों में जमा राशि भी घटती है। इससे निवेश के लिए उपलब्ध घरेलू पूंजी कम होती है और सरकार के लिए भी वित्तीय संसाधन जुटाना कठिन हो सकता है।
इस समस्या का समाधान गरीब परिवारों को ऋण देना बंद करना नहीं है। जरूरत इस बात की है कि ऋण व्यवस्था अधिक जिम्मेदार बने। सभी प्रकार के ऋणों की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध हो, ऋण देने से पहले उधार लेने वाले की वास्तविक भुगतान क्षमता का आकलन किया जाए और बार-बार गोल्ड लोन लेकर पुराने कर्ज चुकाने की प्रवृत्ति पर रोक लगे। आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों को ऋण पुनर्गठन की सुविधा भी मिलनी चाहिए। हालांकि ये उपाय केवल तत्काल राहत दे सकते हैं। असली समाधान इससे कहीं बड़ा है। जब तक लोगों की आय नहीं बढ़ेगी, रोजगार अधिक सुरक्षित नहीं होंगे और अचानक आने वाले आर्थिक झटकों से परिवारों की सुरक्षा नहीं होगी, तब तक घरेलू कर्ज की समस्या बनी रहेगी। ऋण आय का स्थायी विकल्प नहीं है। उसे आय और खर्च के बीच की अस्थायी खाई भरने का माध्यम होना चाहिए। यदि कोई परिवार केवल इलाज कराने या पुराने ऋण की किस्त भरने के लिए बार-बार नया कर्ज ले तो समझ लेना चाहिए कि वित्तीय समावेशन की नीति अब वित्तीय असुरक्षा में बदल रही है।