काश, यही खामोश सैलाब महिला के जीवन को संवारने, उनकी शिक्षा, हुनर उनके अधिकारों के समर्थन में पुरुषों का होता।
- नजमा खातून, स्वतंत्र टिप्पणीकार
हाल ही में राजस्थान की राजधानी जयपुर में तीन तलाक बिल के विरोध में मुस्लिम महिलाओं का दो किलोमीटर लम्बा मौन जुलूस सैलाब के रूप में उमड़ पड़ा। गौरतलब है कि तीन तलाक पर रोक के लिए वर्तमान में कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है। लेकिन बिना मुस्लिम समुदाय की राय लिए, कड़े प्रावधानों के फलस्वरूप मुस्लिम पुरुषों के लिए प्रदर्शन द्वारा असंतोष व्यक्त किया गया। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि इस बिल से सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था बिखर जाएगी, छिन्न-भिन्न हो जाएगी। सबके हितों को ध्यान में रख कर ये बिल पारित हो।
बहरहाल महिलाओं की खामोश जुबां बड़ी ही खूबसूरती से परिवार और समाज के प्रति अपने प्रेम व समर्पण को बयां कर गई। मासूमियत इतनी कि जहां परिवार के पुरुष व अन्य सदस्यों पर जरा सी आंच या अहित नजर आया तो स्वयं के हितों को नजरअंदाज कर उनकी वकील बन सहजता से उनके साथ हो ली। यही पारिवारिक व्यवस्था यदि शरीयत के अनुसार चलती और मानसिक विकृति वाले पुरुष तलाक का दुरुपयोग न करते तो मामला इतना पेचीदा ना होता। कुछ लोगों की गलती से मुस्लिम समुदाय के निष्ठावान पुरुष वर्ग पर प्रश्नचिन्ह ना लगता, उन्हें शर्मिन्दगी का सामना ना करना पड़ता।
पुरुष स्वभाव की विसंगति तो देखिये कि खुद पर शिकंजा कसता देख पूरा समुदाय होश में आ गया। परन्तु यही होश तलाक की शिकार महिला, उसके बच्चों, उसके माता-पिता का जीवन नरक बनते देख क्यों नहीं आता? काश कि यही खामोश सैलाब महिला के जीवन को संवारने, उनकी शिक्षा, हुनर उनके अधिकारों के समर्थन में पुरुषों का होता। पर उसकी लक्ष्मण रेखा तो इसी समाज ने निर्धारित कर दी है। सुखद पहलू यह रहा आखिरकार महिला शक्ति के अस्तित्व को स्वीकार कर उन्हें स्वयं का प्रतिनिधि बना विरोध प्रदर्शन किया।
महिला चाहे वो किसी भी समुदाय की हो परिवार के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित अपनी इचछाओं, सपनों और वजूद को खोकर जीवन भर सुलगती है। काश किपुरुष वर्ग भी इनके गुणों को पहचान इनकी नियति, इनकी स्थिति को सुधारने में अपनी हिस्सेदारी दिखाए। महिलाओं की तो आज भी वही दशा है- ‘कि हम भी जुबां रखते है काश कोई पूछे कि मुद्दा क्या है।’ नारी के जीवन में उसकी भीतरी दुनिया की कशमकश को सुलझाना और उसके अंधेरे को उजाले में तब्दील करना, क्या वर्तमान में महिलाएं भी पुरुष वर्ग से ये अपेक्षा रखे? वे भी महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए सैलाब के रूप में ना सही कम से कम एक शीतल धार के रूप में बहें।