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आईना: बच्चों की मौत… निरोगी राजस्थान में लापरवाही का रोग

दक्षिणी राजस्थान के सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में इन दिनों मौत का तांडव-सा मचा हुआ है। एक अदृश्य सन्नाटा पसरा है जो हर नई मौत के बाद थोड़ा और भारी, थोड़ा और घना होता जाता है।

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Apr 27, 2026

-विजय चौधरी

दक्षिणी राजस्थान के सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में इन दिनों मौत का तांडव-सा मचा हुआ है। एक अदृश्य सन्नाटा पसरा है जो हर नई मौत के बाद थोड़ा और भारी, थोड़ा और घना होता जाता है। बीती 31 मार्च को लालपुरा में दीपक और सीमा की मौत के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ, वह 24 अप्रेल को आशु और रुसिया तक आ पहुंचा। इन दो तारीखों के बीच कुल 15 मासूमों की जानें गईं। इधर, इन 25 दिनों में न बीमारी का नाम तय हुआ, न इलाज, न जवाबदेही। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे कड़वी सच्चाई है और सबसे बड़ा अपराध भी।

सवाल सीधा है… अगर कारण नहीं पता, तो इलाज कैसे होगा? और इलाज नहीं, तो मौतें रुकेंगी कैसे? इसके बावजूद हर बार वही रटा-रटाया वाक्य, ‘जांच चल रही है, शासन-प्रशासन गांववालों के साथ है।’ गंभीर पहलू यह है कि आठ गांवों में 15 बच्चों की मौत के बावजूद एक भी पोस्टमार्टम नहीं हुआ। पोस्टमार्टम होता, तो कारण दर्ज होता। कारण दर्ज होता, तो जिम्मेदारी तय होती। और जिम्मेदारी तय होती, तो जवाब देना पड़ता। शायद इसी जवाब से बचने के लिए सच को दस्तावेज बनने से पहले ही दफना दिया गया।

और इसी के साथ सामने आती है सिस्टम की वह बेफिक्री, जो सबसे ज्यादा चुभती है। दो मौतों के बाद जो तत्परता दिखनी चाहिए थी, वह पंद्रह मौतों के बाद भी नहीं आई। हर बार प्रशासन ‘हरकत’ में आता है लेकिन सिर्फ हरकत में। टीमें जाती हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, सर्वे होते हैं, बयान आते हैं और फिर सब कुछ वैसा ही रह जाता है। यह शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता नहीं, एक सुगठित अभिनय है, जिसका कोई परिणाम नहीं आता।

और जब कोई मां अपने बच्चे को बचाने के लिए झाड़-फूंक का सहारा लेती है, तो वह अंधविश्वासी नहीं होती…वह उस आखिरी दरवाजे पर दस्तक दे रही होती है जहां उसे लगता है कि शायद कोई सुन ले। उसका स्वास्थ्य केंद्र बंद है, डॉक्टर नहीं है, एम्बुलेंस देर से आती है और निजी इलाज उसकी पहुंच से बाहर है। ऐसे में उसे ‘अंधविश्वासी’ कहना दरअसल अपनी विफलता पर पर्दा डालना है और यह पर्दा जितना पतला है, उतना ही बेशर्म भी।

अगर 31 मार्च को ही सख्त और ठोस कार्रवाई होती… अगर तब गांव में डॉक्टर होता, अगर तब पोस्टमार्टम होता तो शायद आशु और रुसिया आज जीवित होतीं। लेकिन यहां हर मौत जैसे अगली मौत के लिए रास्ता बना रही है और सिस्टम के कारिंदे हर बार उसी रास्ते पर सहयात्री बन जाते हैं।

‘निरोगी राजस्थान’ के दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक सलूंबर-प्रतापगढ़ के गांवों में एक बच्चे की जान की कीमत एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी कम बनी रहेगी। यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, भरोसे का संकट भी है और भरोसा एक बार टूट जाए, तो कोई योजना, कोई दौरा उसे वापस नहीं लाता।

सलूंबर-प्रतापगढ़ जिलों के वे 15 बच्चे अब नहीं रहे, लेकिन उनकी मौत का हिसाब बाकी है और वह हिसाब न किसी कैंप से चुकेगा, न किसी बयान से, न किसी जांच टीम से। वह हिसाब तब चुकेगा जब कोई अधिकारी, कोई मंत्री, कोई जवाबदेह आगे आए और कहे कि हां, हम जिम्मेदार हैं और इसकी कीमत हम चुकाएंगे। जब तक वह दिन नहीं आता, यह सन्नाटा और डराता रहेगा।

Published on:
27 Apr 2026 06:08 pm
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