
जब वीरता, शौर्य और बलिदान की बात की जाती है तो हमेशा भारतीय सेना की बातें होती हैं लेकिन हमारे अर्धसैनिक बल भी किसी से कम नहीं हैं। उन्होंने बहादुरी के एक से बढकऱ एक उदाहरण पेश किए और वक्त-वक्त पर अपना बलिदान दिया। चाहे कश्मीर हो या नॉर्थ ईस्ट या फिर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, हर ओर जहां आंतरिक सुरक्षा का मामला उठता है वहां-वहां सीआरपीएफ ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और अपनी वीरता दिखाई है। यह सीआरपीएफ जवानों और अफसरों की वीरता, शौर्य और बलिदान का परिणाम है कि देश के बड़े हिस्से से लाल आतंक का खात्मा हो गया है।
अदृश्य उग्रवादियों से लिया लोहा
हाल में झारखंड में सीआरपीएफ के कोबरा ग्रुप के वीर जवानों ने नक्सलवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी। कई दशकों से चल रहे उग्रवाद और आंतकवाद पर एक रोक लगा दी है। हाल में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन-209 ने भाकपा (माओवादी) के एक करोड़ रुपए के इनामी केंद्रीय कमेटी सदस्य मिसिर बेसरा को गिरफ्तार कर लिया है। उसके साथ दो अन्य कुख्यात माओवादी मोछू और गौरव हांसदा को भी दबोच लिया गया है। उनके पास से अत्याधुनिक हथियार भी बरामद किए गए और इसके साथ ही राज्य में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी। मिसिर बेसरा पोलित ब्यूरो का आखिरी सदस्य था और उस पर कुल 2.20 करोड़ रुपए का संयुक्त इनाम था। उस पर झारखंड, बंगाल और उड़ीसा में 175 से भी अधिक मामले थे। कई सौ अभियानों में सीआरपीएफ के सैकड़ों जवानों ने अपना बलिदान दिया। ठीक भारतीय सेना के वीर जवानों की तरह वे भी लड़े और विजयी हुए। आज झारखंड ही नहीं, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र में नक्सलवाद अतीत का दुस्वप्न बनकर रह गया है और वहां के स्थानीय निवासी शांति से रह रहे हैं। अपने घर से सैकड़ों मील दूर घने जंगलों में जहां पानी की एक बूंद भी आसानी से मयस्सर नहीं है, कठिन से कठिन परिस्थितियों में रहते हुए लगभग अदृश्य उग्रवादियों से उन्होंने लोहा लिया और अंतत: सफल हुए।
सीआरपीएफ स्थापना के 88 साल हुए पूरे
इस साल जुलाई में सीआरपीएफ स्थापना के 88 साल पूरे हो गए। इन सालों में जब भी इसकी आवश्यकता पड़ी है, इसने अपना शौर्य दिखाया है और बलिदान भी दिया है। इस अवसर पर प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने इस बल की नक्सलवाद उन्मूलन में कामयाबी की तारीफ की। इन जाबांज जवानों और अधिकारियों के बल-बूते ही गृहमंत्री ने यह घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र नक्सल आंदोलन समाप्त हो जाएगा और यह संभव भी हुआ। नक्सलवादियों की कमर भी तोड़ दी गई। सीआरपीएफ ने अपने जीवन काल में एक से बढकऱ एक अभियान किए और सफलता पाई। उसके जाबांजों ने भारत के हर उस हिस्से में अपना अभियान चलाया जहां देश को आंतरिक खतरा था। हाल के वर्षों में इसने और भी चुस्ती-फुर्ती दिखाई और बड़े ऑपरेशन किए। गृह मंत्री ने शाह ने नक्सल विरोधी अभियान के लिए इस बल का सशक्तीकरण किया और इसे आधुनिकतम हथियार दिलाए, निगरानी के उपकरण जैसे ड्रोन वगैरह दिलाए, समुचित इंटेलिजेंस की व्यवस्था करवाई तथा संबद्ध राज्यों के पुलिस बलों के साथ तालमेल करवाया। उन्हें हर तरह से प्रोत्साहित किया।
कई ऐतिहासिक ऑपरेशन दिए अंजाम
सीआरपीएफ के कोबरा बटालियनों ने कई ऐतिहासिक ऑपरेशनों को अंजाम दिया जैसे ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस, ऑपरेशन डबल बुल और ऑपरेशन चक्रबंधा जिनसे माओवादियों की शक्ति लगातार क्षीण होती गई। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट तो नक्सलियों का काल बनकर उतरा। इस खतरनाक अभियान में 27 खूंखार माओवादी मारे गए जबकि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी को अपने उन अड्डों छोडकऱ भागना पड़ा जहां वे वर्षों से जमे बैठे थे। सीआरपीएफ जवान अपनी वीरता दिखाते हुए और जान पर खेलते हुए दुर्गम इलाकों जैसे बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, बरमसिया, चक्रबंधा, कारेगुट्टालु और अबूझमाड़ पर फिर से कब्जा कर लिया। इन इलाकों में दशकों से नक्सलियों का कब्जा था और वहां तक पहुंचना दुष्कर था। इसके लिए उन्हें जान पर खेलना पड़ा लेकिन वे डिगे नहीं और बड़े-बड़े माओवादियों का सफाया कर दिया। इनमें उनका सबसे बड़ा कमांडर नंबाल्ला केशव राज उर्फ बसवराजू भी था जो सीपीआइ (माओवादी) का महासचिव था और उस पर 1.5 करोड़ रुपए का इनाम था। उसके अलावा सीआरपीएफ ने कई और शीर्ष कमांडर मार गिराए, जिनमें पातिराम मांझी, गणेश उल्के और मिलिंद वगैरह थे। इनके मारे जाने से माओवादियों में नेतृत्व का संकट खड़ा हो गया और बड़े पैमाने पर उनके काडर ने छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में आत्म समर्पण कर दिया जिससे यह सशस्त्र आंदोलन ध्वस्त हो गया।
सरकार ने पुनर्वास के लिए उठाए कदम
इस महती अभियान को सफल बनाने के लिए गृह मंत्रालय ने बढ़-चढकऱ काम किया। 2014 के बाद इन इलाकों में 594 पुलिस स्टेशन, बनाए गए, 408 सुरक्षा कैंप खड़े किए गए और 12,211 किलोमीटर सडक़ों का निर्माण किया ताकि आवागमन सहज हो। इसके पहले माओवादी सडक़ें बनने नहीं देते थे ताकि सुरक्षा बल आ जा नहीं सकें। इसके अलावा संचार तंत्र को मजबूत किया गया ताकि संपर्क बना रहे और माओवादियों की गतिविधियों पर पल-पल की खबर ली जा सके। दूसरी ओर कल्याणकारी कार्यों के अलावा विकास के भी बहुत सारे कार्य किए गए। गांवों में कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं जैसे स्कूल, पोस्ट ऑफिस, नजदीक में बैंक, आइटीआइ वगैरह। इससे ग्रामीणों में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा और वे माओवादियों से दूर होने लगे। दूसरी ओर आत्मसमर्पण किए हुए काडर ने भी इन सुविधाओं का लाभ उठाना शुरू कर दिया जिससे व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास बढ़ा। सरकार ने उनके पुनर्वास के लिए कई तरह के कदम उठाए ताकि वे मुख्य धारा में समाहित हो जाएं। गृह मंत्री शाह ने सिर्फ संघर्ष की रणनीति नहीं अपनाई बल्कि प्रभावित इलाकों में विकास की नीति पर जोर दिया जिससे लोगों तथा माओवादियों की सोच में बदालाव हो।
गृह मंत्रालय ने बनाईं कई योजनाएं
गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ के जवानों और अधिकारियों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाईं। इनके तहत उन्हें आयुष्मान सीएपीएफ, ई-आवास पोर्टल. सीएपीएफ पुनर्वास तथा कल्याण और पुनर्वास बोर्ड की सुविधा दी गई। इसके अलावा उनके तथा उनके परिवार के सदस्यों के लिए स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं दी जा रही हैं। उन्हें वित्तीय रूप से मजबूत बनाने के लिए योजनाएं बनाई गई हैं और ये सुचारू रूप से चल रही हैं। सीआरपीएफ तथा असम रायफल्स के वीर जवानों के शौर्य को सम्मानित करने के लिए सरकार ने सशस्त्र बलों के लिए मानद रैंक की घोषणा की है। भारतीय सेना की तरह ही उन्हें सशस्त्र अभियानों में हताहत होने पर सम्मानित करने तथा परिवार या उन्हें ही आर्थिक लाभ देने की व्यवस्था की गई है। जवानों के हौसलों को बढ़ाने और उनके परिवार को कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित करने के दोतरफा कदमों से उनमें एक विश्वास जगा है। सीआरपीएफ ने भारत की सुरक्षा के स्तंभ के रूप में अपने को दृढ़ता से स्थापित किया है, इसमें दो राय नहीं है।