
ग्रामीण परिवारों की आय को लेकर नाबार्ड के ताजा सर्वे के आंकड़े खासतौर से ग्रामीण भारत की सेहत को लेकर चिंता बढ़ाने वाले हैं। नाबार्ड का यह सर्वे २९ राज्यों के बीस हजार ग्रामीण परिवारों पर आधारित भले ही हो लेकिन ग्रामीण भारत की आर्थिक सेहत की चौंकाने वाली तस्वीर पेश करता है। सर्वे में कहा गया है कि ग्रामीण परिवारों की आय में सुधार की रफ्तार पिछले दो वर्षों के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढऩे की बात कहने वाले परिवारों की हिस्सेदारी महज २७.७ फीसदी ही है। चिंता इस बात की भी कि आय में गिरावट या यथास्थिति के बावजूद परिवारों का खर्च कम नहीं हो रहा। महंगाई से दोहरी मार पड़ी है। नतीजतन उधारी से काम चलाने की मजबूरी हो रही है।
यह उधारी भी अनौपचारिक कर्ज के रूप में है जो वित्तीय संस्थानों के बजाय दोस्तों व रिश्तेदारों से ली जा रही है। अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता रेकॉर्ड स्तर पर पहुंंचना ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का सूचक है। देखा जाए तो भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था मौजूदा दौर में दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक तरफ दक्षिण-पश्चिम मानसून के इस बार कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं वहीं दूसरी ओर वैश्विक युद्ध के परिदृश्य के कारण कृषि आदानों की लागत भी बढ़ रही है। मानसून समय पर नहीं पहुंचने से कृषि क्षेत्र पर सदैव दबाव बढ़ता है। चिंता इस बात की भी है कि यदि मानसून कमजोर रहा तो फसलों के उत्पादन पर भी इसका असर पडऩा तय है। सीधे-सीधे यह चक्र अंतत: किसानों की आय को ही प्रभावित करने वाला होगा। वहीं खाद्य वस्तुओं की पहले से ही बढ़ती कीमतों में और इजाफा हो सकता है।
महंगाई का असर ग्रामीण क्षेत्र में कृषि आधारित उत्पादों की मांग पर भी पड़ेगा। चिंता की बात यह है कि ग्रामीण परिवारों की अब आय नहीं बल्कि कर्ज बढ़ता जा रहा है। रोजगार के अवसर और आय समान रूप से बढ़े तो एक हद तक ठीक रहता है लेकिन आय में वृद्धि की रफ्तार कमजोर हो और रोजमर्रा का खर्च बढ़ता जाए तो निवेश की तो सोच संभव ही नहीं है। कृषि क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता भी आय के अवसरों में कमी लाने वाली रहती आई है। शहरी क्षेत्रों में भी महंगाई की वजह से फिर से ग्रामीण क्षेत्र में आने वालों की संख्या बढ़ती है तो कृषि पर ही निर्भरता रखना काफी नहीं होगा।
जाहिर है ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। आय बढऩे की रफ्तार इसी तरह से कम रही तो कर्ज का बोझ भी बढऩा तय है। सर्वे के तथ्य ग्रामीण उपभोग, बचत और निवेश पर दबाव डालने वाले नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर संकेत है। सच तो यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी तभी फलदायी होगा जब ग्रामीण परिवारों की आय को बढ़ाने के प्रयास किए जाएं। समय पर ध्यान नहीं दिया तो शहरी अर्थव्यवस्था भी चपेट में आ सकती है।